Increase |  Decrease |  Normal

Current Size: 100%

Share this
Syndicate content

दिल लगाई और सताई - 10

हावर्ड ज़िन

[हावर्ड ज़िन रचित 'ए पीपुल्स हिस्टरी ऑफ़ द यूनाइटेड स्टेट्स' (संयुक्त राज्य का जनवादी इतिहास) के छठे अध्याय 'द इंटिमेटली आप्रेस्ड' के अनुवाद का दसवाँ भाग। अनुवादक: लाल्टू]

मैसाचुसेट्स राज्य के गार्डनर नगर में, जहाँ उसका भाई धर्मगुरू था, लूसी स्टोन ने नारी अधिकारों पर भाषण देना शुरू किया। वह कद की छोटी, करीब सौ पाउण्ड वज़न (छियालीस किलो) की थी और बहुत अच्छी वक्ता थी। दास-प्रथा विरोधी सोसायटी के लिए भाषण देने पर उस पर कई बार ठंडा पानी फेंका गया, किताबें उछाल कर चोट पहुँचाई गई, लोगों ने हमला किया।

जब हेनरी ब्लैकवेल के साथ उसकी शादी हुई, रस्म के दौरान उन्होंने परस्पर हाथ थामे और एक वक्तव्य पढ़ा -

"हालांकि सार्वजनिक रूप से पति-पत्नी का संबंध मानते हुए, हम परस्पर स्नेह को स्वीकार करते हैं ... यह घोषणा करना हम कर्तव्य मानते हैं कि ऐसा करते हुए हम न तो उन वैवाहिक नियमों को स्वीकार करते हैं, जिनमें पत्नी को स्वच्छंद, तार्किक व्यक्ति नहीं माना गया है, जबकि पति को अस्वाभाविक और क्षतिकर गुरुता दी गई है।"

अपना नाम बदलने से इंकार करने वाली पहली औरतों में एक वह थी। वह 'श्रीमती स्टोन' कहलाती थी। सरकार में अपना प्रतिनिधित्व न होने से जब उसने कर देने से इंकार किया, अधिकारियों ने उसके घर का सामान बदले में ले लिया, यहाँ तक कि बच्चे का झूला भी नहीं छोड़ा।

न्यूयॉर्क राज्य की एक महिला पोस्टमास्टर अमीलिया ब्लूमर ने जब 'ब्लूमर' नामक परिधान का विकास किया, नारी कार्यकर्ता पुराने स्टाइल की तिमि मछली की हड्डियों से बनी बाडीस, कोर्सेट और पेटीकोट छोड़कर ब्लूमर पहनने लगीं। उस ज़माने की नारीवादी आंदोलन की एक मुख्य नेता एलिज़ाबेथ केडी स्टैंटन ने अपनी एक रिश्ते की बहन के ब्लूमर पहनने के बारे में लिखा है :

"जब खुद मैं बिना किसी बोझ लिए लंबे-चौड़े कपड़ों में कठिनाई से ही ऊपर चढ़ पाती थी, अपनी बहन को एक हाथ में रोशनी का लैंप और दूसरे में बच्चा लिए आसानी से सीढ़ियों पर चढ़ते देख मुझे समझ में आ गया कि महिलाओं के परिधान में सुधार की बड़ी ज़रूरत है और मैंने जल्दी ही ऐसे कपड़े पहनने शुरू कर दिए।"

दास-प्रथा विरोधी, आत्म-नियंत्रण, परिधान के स्टाइल, जेल-व्यवस्था में सुधार आदि आंदोलनों में शरीक होने के बाद अनुभवी और साहसी औरतों ने अपनी परिस्थिति पर ध्यान देना शुरू किया। दास प्रथा विरोधी संगठन में सक्रिय और प्रखर वक्ता, एक दक्षिणी गोरी औरत, एंजेलीना ग्रिम्के ने इस आंदोलन के निरंतर विकास को इस तरह देखा -

"सबसे पहले हम दोनों लिंगों के करोड़ गुलामों को धूल से उठाकर इंसान का दर्जा दिलाने के लिए राष्ट्र को जगाएँ ... उसके बाद करोड़ औरतों को घुटनों पर झुके होने से उठाकर पैरों पर खड़ा करना, यानी उन्हें नन्हें बच्चों से औरतों में बदलना एक आसान काम होगा।"

नारीवादियों में मार्गरेट फुलर शायद सबसे अधिक प्रभावी बुद्धिजीवी थीं। अपनी पुस्तक 'वुमन इन द नाइंटीन्थ सेंचुरी' (उन्नीसवीं सदी की औरत) में उन्होंने इस समझ के साथ लिखना शुरू किया कि "मर्दों के दिमाग में औरतों के प्रति एक ऐसी ही भावना निहित है जैसी गुलामों के प्रति है ... ", हम हर किस्म के बेमतलब खड़े किए अवरोधों को उखाड़ फेंकेंगी।" और : "नारी की ज़रूरत नारी का प्रशासक या नियंत्रक होना नहीं, बल्कि स्वभाव की स्वच्छंदता, बुद्धि की प्रखरता और निर्बाध और स्वच्छंदजीवी आत्मा है।"

पार करने लिए अवरोध कई थे। उन्नीसवीं सदी के बीच के सालों के एक लोकप्रिय लेखक रेवरेंड जॉन टॉड (जिसकी एक लोकप्रिय पुस्तक में युवा मर्दों को हस्त-मैथुन के परिणामों पर बतलाया गया था - "मस्तिष्क बुरी तरह बिगड़ जाता है") ने नारीवादियों के कपड़े पहनने के तरीके पर टिप्पणी की :

"कुछ ब्लूमर ड्रेस पहनकर अर्ध-पुरुष बन रही हैं। एक शब्द में मैं आपको बदला दूँ कि ऐसा असंभव क्यों है : लंबे कपड़ों में सजी-बंधी औरत खूबसूरत होती है। उसकी चाल सुंदर होती है ... अगर वह दौड़ने की कोशिश करे, तो मज़ा ही गायब ... चोगे को उतार कर पैंट पहन टांगें दिखलाते ही, सौंदर्य और रहस्य उड़ जाते हैं।"

1830 के दशक में, मैसाचुसेट्स के धर्म गुरुओं के आम संघ में एक धार्मिक पत्र में औरतों के बोलने की मनाही का आदेश आया : ... "जब वह मर्द की जगह और आवाज़ अपना लेगी ... हमें अपने खिलाफ़ आत्मरक्षा की सोचनी होगी।"

एंजेलीना की बहन, सेरा ग्रिम्के ने इसके जवाब में 'औरतों की स्थिति और लिंगों की समानता' शीर्षक से आलेखों की एक शृंखला लिखी।

"जीवन की शुरुआत में मैं फैशन की दुनिया की तितलियों में खोई रही। इन औरतों के बारे में मैं यह कहने को मज़बूर हूँ कि उनमें शिक्षा का अभाव है। उन्हें यह सिखाया जाता है कि शादी ही उनकी एकमात्र ज़रूरत है शादी ही पहचान बनाने का रास्ता है ..."

उसने लिखा, "स्त्रीजाति के लिए मैं आभार नहीं मांग रही। मैं समानता की मांग में पीछे नहीं हटूंगी। अपने भाईयों से मैं इतना ही मांगती हूँ कि ... वे हमारी गर्दनों से अपने पैर हटाएँ, और ईश्वर की बनाई हुई ज़मीन पर हमें सीधी खड़ी होने दें ... मैं यह स्पष्ट तौर पर समझती हूँ कि जो कुछ भी नैतिक रूप से एक मर्द के लिए ठीक है, वह औरत के लिए भी ठीक है।"

 

दिल लगाई और सताई - 9

दिल लगाई और सताई - 8

दिल लगाई और सताई - 7

दिल लगाई और सताई - 6

दिल लगाई और सताई - 5

दिल लगाई और सताई - 4

दिल लगाई और सताई - 3

दिल लगाई और सताई - 2

दिल लगाई और सताई - 1


 


लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)