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संजय द्विवेदी

Sanjay Dwivedi

काले कारनामों की अंधेरी कोठरी से निकले सच

संजय द्विवेदी

सूचनाओं ने अपनी मुक्ति के रास्ते तलाश लिए हैं : इन दिनों हम सूचनाओं के एक ऐसे लोकतंत्र में हैं जहां आप उन्हें बांध नहीं सकते। वे आ रही हैं सुनाने हमारे काले कारनामों की कहानियां, उन लौह द्वारों को तोड़कर जो राजसत्ताओं ने बना रखे थे। विकिलीक्स को यूं ही न देखिए। उसकी सूचना की ताकत को देखिए और महसूसिए कि अगले क्षण कौन सी सूचना हमें हिलाकर रख देगी। दुनिया के इस्लामी जगत को तमाम सवालों पर कोसने वाले अमरीकी जनतंत्र के नायक इन खुलासों पर बौखलाए क्यों हैं। वे क्यों जूलियन असांजे के पीछे हाथ धोकर पड़ गए हैं। इसे सोचने की जरूरत है। सूचना व विचारों के जनतंत्र में अगर सलमान रश्दी और तस्लीमा को लेकर इस्लामी अधिनायकवाद गलत है तो अमेरिका की असांजे के मामले में बौखलाहट का आदर कैसे किया जा सकता है। जाहिर तौर पर सूचना एक ऐसे असरदायी हथियार में बदल गयी है कि राजसत्ताएं अपना स्वाभाविक जनतांत्रिक चरित्र भी कायम नहीं रख पा रही हैं।

सूचनाएं अब मुक्त हैं। वे उड़ रही हैं इंटरनेट के पंखों। कई बार वे असंपादित भी हैं, पाठकों को आजादी है कि वे सूचनाएं लेकर उसका संपादित पाठ स्वयं पढ़ें। सूचना की यह ताकत अब महसूस होने लगी है। विकिलीक्स के संस्थापक जूलियन असांजे अब अकेले नहीं हैं, दुनिया के तमाम देशों में सैकड़ों असांजे काम कर रहे हैं। इस आजादी ने सूचनाओं की दुनिया को बदल दिया है। सूचना एक तीक्ष्ण हथियार बन गयी है। क्योंकि वह उसी रूप में प्रस्तुत है, जिस रूप में उसे पाया गया है। ऐसी असंपादित और तीखी सूचनाएं एक असांजे के इंतजार में हैं। ये दरअसल किसी भी राजसत्ता और निजी शक्ति के मायाजाल को तोड़कर उसका कचूमर निकाल सकती हैं। क्योंकि एक असांजे बनने के लिए आपको अब एक लैपटाप और नेट कनेक्शन की जरूरत है। याद करें विकिलीक्स के संस्थापक असांजे भी एक यायावर जीवन जीते हैं। उनके पास प्रायः एक लैपटाप और दो पिठ्ठू बैग ही रहते हैं।

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)