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विकीलीक्स का सही इस्तेमाल किया गया तो देश की राजनीति का बहुत भला होगा

शेष नारायण सिंह

[हम बस यहाँ इतना जोड़ना चाहेंगे कि विकीलीक्स के काम के पीछे अकेले जूलियन असांज ही नहीं, और भी बहुत से लोग हैं, सबसे महत्वपूर्ण तो वे जिन्होंने दस्तावेज़ उपलब्ध करवाए। विकीलीक्स से बाहर भी उनके बहुत से समर्थक हैं। एक समय तक तो मुख्यधारा का मीडिया भी उनकी सराहना ही कर रहा था और उनके द्वारा सार्वजनिक किए गए दस्तावेज़ों का बड़े ज़ोर-शोर से उपयोग कर रहा था। अमरीका का मीडिया भी। फिर विकीलीक्स ने कुछ ऐसा कर डाला कि 'अपनी टीम' और 'अपने लोगों' के विरोध में चला गया। ऐसा लगने लगा कि 'अपन' भी घेरे में आ जाएंगे। ऐसा होते ही 'न्यूयॉर्क टाइम्स' तो क्या 'द गार्जियन' तक का राग बदल गया और जूलियन असांज हीरो से विलन बन गए। लेकिन विकीलीक्स के दस्तावेज़ों का उपयोग अब भी हो रहा है और उनकी जीवनी पर पहले किताब और फिर किताब पर आधारित फिल्म से पैसा कमाने में उन्हीं लोगों को परहेज नहीं है। उधर जूलियन असांज एक तरह से नज़रबंद हैं आने वाले खतरे के इंतज़ार मेंऔर ब्रैडले मैंनिंग के ऊपर मृत्युदंड का खतरा मंडरा रहा है (उन्हें लगातार दी जा रही गैर-कानूनी यातना के अलावा)। शर्ली जैकसन के अंदाज़ में कहें तो अच्छी खेती (मानव) बलि मांग रही है। दूसरे ढंग से कहें तो शहीद बनाने का मौसम है। पर दस्तावेज़ों का इस्तेमाल हो रहा है, यह भी कम नहीं है। उम्मीद तो कर ही सकते हैं कि इससे कुछ अच्छा बदलाव आए। उम्मीद करने के लिए हाल-फिलहाल बहुत ज़्यादा चीज़ें हैं भी नहीं । फिर भी उस सवाल से नज़र बचाना मुश्किल होता जा रहा है जो उधर पीछे अटका हुआ है पर गायब होने का नाम नहीं ले रहा : "है कोई माई का लाल वीर पुरूष जो भ्रष्टाचार का पर्दाफ़ाश करने से आगे जाकर भारत का ब्रैडले मैंनिंग या डैनियल एल्सबर्ग बन सके?"। हम बड़ी कोशिश कर रहे हैं इसे नज़रअंदाज़ करने की, पर यह कैसे-न-कैसे दिख ही जाता है। - सं.]

सूचना क्रान्ति को इस्तेमाल करके जनपक्षधरता के एक बड़े पैरोकार के रूप में विकीलीक्स ने इतिहास में अपनी जगह बना ली है. विकीलीक्स के संस्थापक, जूलियन असांज के काम को पूरी दुनिया में सराहा जा रहा है. यह अलग बात है कि अब अमरीकी शासक वर्गों को उनका काम पसंद नहीं आ रहा है और उनके खिलाफ तरह तरह के मुक़दमे भी किये जा रहे हैं. अमरीकी कूटनीति की खासी दुर्दशा भी हो रही है. अमरीकी राजनीति की वे बातें भी पब्लिक डोमेन में आ रही हैं जो आम तौर पर गुप्त रखी जाती हैं. उन बातों को कहने के लिए कूटनीतिक भाषा का इस्तेमाल किया जाता है जिसका आम तौर पर कुछ् मतलब नहीं होता. एक ही बयान के तरह तरह के अर्थ निकाले जाते हैं और यह प्रक्रिया बहुत दिनों तक चलती रहती है. मनमोहन सिंह की सरकार में अमरीका परस्त मंत्रियों की तैनाती की सूचना को जिस कच्ची भाषा में भारत में तैनात अमरीकी राजदूत ने वाशिंगटन को दिया था, उसके चलते नई दिल्ली के कई मंत्रियों के चेहरे से नकाब उठ गया है. अब सबको पता है कि मुरली देवड़ा क्यों मंत्री बने थे और मणि शंकर ऐय्यर को क्यों पैदल किया गया था. दोनों का कारण एक ही था. सरकार के बनने में अमरीका की मर्जी चल रही थी.

कभी इस देश की राजनीति में अमरीका विरोधी होना स्टेटस सिम्बल माना जाता था. सत्ता में आने के बाद इंदिरा गाँधी ने अमरीका विरोध को अपनी विदेश नीति और राजनीति का स्थायी भाव बना दिया था. दो खेमों में बंटी दुनिया में अमरीका और रूस के बीच वर्चस्व की लड़ाई चलती रहती थी. इंदिरा गाँधी का दुर्भाग्य था कि उनके पास कुछ ऐसे मौक़ापरस्त और फैशनेबुल लोग इकठ्ठा हो गए थे जो कभी बायें बाजू की छात्र राजनीति में रह चुके थे. बाद में वे खिसक कर कांग्रेस में शामिल हो गए थे. जब इंदिरा गाँधी ने प्रधानमंत्री पद हासिल किया तो यह लोग उनके साथ लग लिए और रूस छाप कम्युनिज़्म के आधार पर राजनीतिक सलाह देने लगे. इसके बहुत सारे घाटे हुए लेकिन एक फ़ायदा भी हुआ. फायदा यह हुआ कि भारत की सरकार अमरीकी हित साधन का माध्यम नहीं बनीं.

यह राजनीति १९९१ तक चली लेकिन सोवियत रूस के ढहने के बाद जब पी वी नरसिम्हाराव देश के प्रधान मंत्री बने तो उन्होंने ऐलानिया अमरीका की पक्षधरता की कूटनीति की बुनियाद डाल दी. आर्थिक रूप से अपने मुल्क में पूरी तरह से अमरीकी हितों को आगे बढाने का काम शुरू हो गया. पी वी नरसिम्हाराव के वित्तमंत्री के रूप में डॉ मनमोहन सिंह ने अमरीकी हितों का पूरा ध्यान रखा और भारत के राष्ट्रीय हित को अमरीकी फायदों से जोड़ने में प्रमुख भूमिका निभाई. बाद में जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार बनी तो भारतीय विदेशनीति की छवि अमरीकी हुक्म के गुलाम की बन गयी.

अमरीकी विदेश विभाग के एक मझोले दर्जे के अफसर को पटाने के लिए भारत के विदेश मंत्री बिछ बिछ जाते थे. उसको लेकर अपने गाँव भी गए और हर तरह से राजपूताने की चापलूसी वाली परंपरा के हिसाब से उसका स्वागत सत्कार किया. हालांकि यह विदेश मंत्री महोदय दावा करते थे कि उनके पूर्वज महान थे और वे राजपूताने की गौरवशाली परंपरा के प्रतिनिधि थे लेकिन इन श्रीमान जी ने चापलूसी वाला रास्ता ही अपनाया. बाद में उस अफसर ने जब एक किताब लिखी तो भारतीय विदेश मंत्री की छवि की खासी छीछालेदर हुई. वाजपेयी जी के बाद डॉ मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने जिनकी अमरीका के प्रति मुहब्बत किसी से छुपी नहीं है. इस पृष्ठभूमि में नई दिल्ली में तैनात अमरीकी राजदूत के तार को देखने से तस्वीर साफ़ हो जाती है.

अमरीकी राजदूत का यह दावा कि मनमोहन सिंह की सरकार में अमरीका के कई दोस्तों को जगह दी गयी है, भारतीय राजनीति की दुखती रग पर हाथ रख देता है. साथ ही यह भी साफ़ हो जाता है कि अमरीका विरोध की राजनीति अब इतिहास की बात है, भारत में अमरीकापरस्ती पूरी तरह से घर बना चुकी है. इस तार के अलावा भी बहुत सारी सूचनाओं को सार्वजनिक करके विकीलीक्स ने पारदर्शिता का निज़ाम कायम करने की दिशा में पहला क़दम उठा दिया है. राष्ट्रीय अखबार "द हिन्दू " ने इन तारों को सिलसिलेवार छापकर भारतीय राजनीति के ऊपर बहुत उपकार किया है. एक तार में अमरीकी राजदूत ने सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी की कार्यशैली का विश्लेषण किया है. अगर कांग्रेस का आला नेतृत्व इस तार को ध्यान में रख कर आगे की रणनीति बनाए तो उसकी राजनीति को सही ढर्रे पर लाया जा सकता है. जो बात सारे देश को मालूम है वह अमरीकी राजदूत के तार में स्पष्ट तरीके से लिख दी गयी है. जनवरी २००६ के एक तार में अमरीकी राजदूत ने अपनी सरकार को सूचित किया है कि कांग्रेस की एलीट लीडरशिप हिन्दी बेल्ट के ग्रामीण इलाकों में जाकर आम आदमी से कोई भी संपर्क बनाने की कोशिश नहीं करती.

इस एलीट लीडरशिप में सोनिया गांधी और उनके बच्चे भी शामिल हैं. तार में लिखा है पूरी कांग्रेस राजनीति सोनिया गाँधी के करिज़्मा के आधार पर सत्ता में बने रहने की राजनीति को प्रमुखता देती है. सोनिया गांधी के आस पास जमी हुई कोटरी को भरोसा है कि अगर वे मैडम की नज़र में ठीक हैं तो किसी की भी इज़्ज़त उतारने का उन्हें लाइसेंस मिला हुआ है. पार्टी के नंबर एक परिवार के अलावा बाकी लोग एक दूसरे की टांग खिंचाई और निंदा अभियान में मशगूल रहते हैं. इसी तार में कांग्रेस के २२ जनवरी २००६ के हैदराबाद अधिवेशन का भी ज़िक्र है जब वहां जुटे करीब दस हज़ार कांग्रेसियों में से बहुत बड़ी संख्या में लोगों ने हल्ला मचाना शुरू कर दिया कि राहुल गांधी को मंच पर बैठाया जाए. ज़ाहिर है उन कांग्रेसियों के दिमाग में रहा होगा कि अगर राहुल गांधी की बात की जायेगी तो मैडम को खुशी होगी. इस तरह विकीलीक्स के दस्तावजों में बहुत सारी सूचना पब्लिक डोमेन में आई है अगर उसका सही इस्तेमाल किया गया तो देश की राजनीति का बहुत भला होगा.

 

[यह लेख यहाँ छापने और उसकी संपादकीय प्रस्तावना लिखने के बाद हमारे पास एक फ़ोन आता है, "सर, हम मल्टीपर्पज़ ज़ीरॉक्स मशीन प्रोवाइड कराते हैं ..."। ऐसी बातें हमें थोड़ी देर से समझ में आती हैं, नहीं तो कहते कि हमारी पहुँच तो टी वी तक भी नहीं है, गोपनीय दस्तावेज़ तो दूर की बात। पहुँच होती भी तो ज़ीरॉक्स मशीन को अब कौन पूछता है। पूछ होती भी तो अपनी वीर पुरुष बनने की हिम्मत कहाँ है।

ऐसा लगता है सह-संचार के सबसे 'डिवोटेड' पाठक इसी श्रेणी के लोग हैं, जो समय-समय पर अपनी प्रतिक्रियाएँ ऐसे ही तरीकों से हम तक पहुँचाते रहते हैं।

... यह टिप्पणी लिखना शुरू करते ही यह साइट ही कुछ समय के लिए चलनी बंद हो गई।

इसी बात पर यह लेख पढ़ डालें- Lessons from Anonymous on cyberwar - अलग-अलग तरह के वीर पुरुष होते हैं। - सं.]


(जंतर-मंतर से साभार)


लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)