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विनीत कुमार

लाइव इंडिया का रावण चैनल हेड सुधीर चौधरी

विनीत कुमार

कल हमने आपसे अपील की थी कि मैंने तो स्टार न्यूज के भीतर रावण और चैनल के रावण मानसिकता से ड्राइव होने की बात लिख दी है। आप भी पहल करें,अच्छा रहेगा। ठीक उसी रात मीडिया फोकस साइट मीडियाखबर डॉट कॉम ने एक सीरिज शुरु की- न्यूज चैनलों के नौ रावण और उनलोगों की पूरी एक लिस्ट जारी है जो वाकई अलग-अलग खौपनाक कारनामे से मीडिया इन्डस्ट्री के रावण हैं। लिहाजा हम वहां से वो पोस्ट उधार लेकर आपसे साझा कर रहे हैं। ये बहुत ही मौजूं दौर है,जहां आकर मीडिया जिसे की लोकतंत्र का चौथा स्तंभ और बदलाव का नायक करार देते रहे,उसकी शक्ल एक विलेन के तौर पर बन गयी है। पहले पीपली लाइव और अब नॉक आउट देखकर हम इसे आसानी से समझ सकते हैं।

अब फिल्‍मों के जरिये देंगे झांसा, जनता का भरोसा बटोरेंगे

विनीत कुमार

कनाट प्लेस के ओडियन में जब हम नो वन किल्ड जेसिका देखने घुसे तो जेसिका लाल को न्याय दिलाने में मीडिया की क्या भूमिका रही थी, उस याद से कहीं ज्यादा नीरा राडिया टेप प्रकरण में किन-किन मीडियाकर्मियों के नाम सामने आये, ये बातें ज्यादा याद आ रही थीं। हमें लग रहा था कि NDTV 24X7 पर 30 नवंबर के बरखा दत्त कॉनफेशन के बाद, उसका दूसरा हिस्सा देखने आ गये हैं। मामला ताजा है, इसलिए मीडिया शब्द के साथ राडिया अपने आप से ही याद हो आता है। पी चिदंबरम ने प्रेस कानफ्रेंस में पत्रकारों से मजाक क्या कर दिया कि ऑर यू फ्रॉम मीडिया ऑर राडिया कि अब मीडिया के भीतर ये न केवल मुहावरा बल्कि मीडिया के बारे में सोचने का प्रस्थान बिन्दु बन गया है। बहरहाल, राडिया-मीडिया प्रकरण के बाद मैं पहली फिल्म देख रहा था जिसका कि बड़ा हिस्सा मीडिया से जुड़ता है। मीडिया क्रिटिक सेवंती निनन ने राडिया टेप को मीडिया स्टूडेंट और पीआर प्रैक्टिशनरों के लिए टेक्सट मटीरियल करार दिया है। मैं नो वन किल्ड जेसिका फिल्म को हाउ टू अंडर्स्टैंड इंगलिश चैनल लाइक एनडीटीवी के लिए जरूरी पाठ मानता हूं। हालांकि इस फिल्म को एनडीटीवी के लोगों ने नहीं बनाया है, लेकिन जिस तरह से एनडीटीवी के कुछ ऑरिजिनल मीडियाकर्मी और कुछ चरित्र के तौर पर दिखाये गये हैं, पूरा सेटअप एनडीटीवी का है, ऐसे में फिल्म का बड़ा हिस्सा एनडीमय हो गया है जो कि कई बार सिनेमा के भीतर गैरजरूरी जान पड़ता है।

उस्‍ताद सरकार की जमूरी अदालतों को बंद करो! बंद करो!

विनीत कुमार

वो दास्तानगोई विनायक सेन के लिए उठी एक आवाज थी

आज से करीब ढाई साल पहले 16 मई 2008 को महमूद फारूकी ने विनायक सेन की गिरफ्तारी के खिलाफ होनेवाले कार्यक्रम में दास्तानगोई की थी। साथ में दानिश भी थे। उस दिन इन दोनों का मिजाज बिल्कुल अलग था। माहौल के मुताबिक एक ही साथ कई मिले-जुले भाव। रवींद्र भवन, साहित्य अकादमी परिसर में खचाखच लोग भरे थे। खुले में देर शाम तक लोग टस से मस नहीं हुए। आज उस शाम और दास्तानगोई का जिक्र फिर से करना चाहता हूं। वहां से लौटकर मैंने जो पोस्ट लिखी, एक बार फिर से साझा करना चाहता हूं। नये सिरे से इसे आज फिर पढ़ना आपको जरूरी लगे, ऐसी उम्मीद है। इस नीयत और भरोसे के साथ कि अब किसी एक शख्स और मुद्दे के साथ छिटपुट तरीके से प्रतिरोध जाहिर करने से कहीं ज्यादा जरूरी है, अभिव्यक्ति की आजादी सुनिश्चित न किये जाने तक लड़ते रहना, चीजों को अपनी कोशिशों से दरकाते रहना : विनीत कुमार

महमूद फारूकी साहब ने कल रात जब दास्तानगोई में अय्यारी और जादूगरी का किस्सा सुनाया, जिसमें चारों तरफ से सुरक्षा के नाम पर प्रहरी के घेर लेने पर जुडूम-जुडूम की आवाज आती थी तो मुझे बस एक ही बात समझ में आयी कि -

यदि देश की सुरक्षा यही होती है कि बिना जमीर होना जिंदगी के लिए शर्त बन जाए
आंख की पुतली में ‘हां’ के सिवाय कोई भी शब्द अश्लील हो
और मन बदकार पलों के सामने दंडवत झुका रहे
तो हमें देश की सुरक्षा से खतरा है
- पाश


दास्‍तानगोई पेश करते हुए महमूद फारूकी

फारूकी साहब की दास्तानगोई में भी कुछ ऐसा ही हो रहा था, जहां जादूगर अय्यारों को कुछ इस तरह की सुरक्षा दे रहे थे कि अय्यार तबाह-तबाह हो गये। लेकिन ये जादूगर एक सुरक्षित मुल्क बनाने पर आमादा थे। फारूकी साहब के हिसाब से वो मुल्क-ए-कोहिस्तान बनाना चाह रहे थे। जहां के लिए सबसे खतरनाक शब्द था – आजादी।

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)