प्रशांत दुबे/रोली शिवहरे
“साहब! हम कभी किसी को काली चाय नहीं पिलाते थे, पर क्या करें ? आज शर्म भी लग रही है आपको यह चाय पिलाते हुये. मजबूर हैं.”
दरअसल काली चाय जो आज बड़े लोगों के लिये स्वास्थ्य का सबब है, किसी के लिये यह शर्म की बात भी है. आईये जाने क्या है इस काली चाय का गणित.
“बहुत खेती थी. बहुत मवेशी थे. दूध दही था हमारे यहां. सुख-सुविधा थी. सुख से रहते थे. मेरी खुद की बीस एकड़ जमीन थी. धान, गेहूँ, ज्वार, बाजरा, तिल, मक्का सब उगाते थे साहब ! और अब ... ?” फिर वह मन ही मन कुछ बुदबुदाते हैं जैसे किस्मत को दोष दे रहे हो या फिर किसी को अपशब्द कह रहे हो.
वह कहते हैं –“मेरा बुढ़ापा ऐसे ही नहीं आ गया है. तीन-तीन बार अपने गाँव से, अपने-अपनों से बिछड़ने का नतीजा है ये. सरकार क्या करेगी या सरकार ने क्या किया ? जमीन का मुआवजा दे दिया, उसके अलावा हमारी अपने जड़ों का क्या ?”
यह कहानी है बरगी बाँध से डूबे गांवों में से एक मगरधा गांव के रामदीन की . रामदीन आज 62 वर्ष के है. यह कहानी अकेले रामदीन की नहीं बल्कि रामदीन जैसे ऐसे हजारों लोग है, जो अपने आज और कल का गणित लगाते है और जीवन की इस धूप-छांव को बड़ी ही शिद्दत महसूस कर रहे है.
उजड़े हुये लोग
मगरधा गांव भी रानी अवंतीबाई लोधी परियोजना के कारण उजड़े अन्य 192 गांवों की तरह वर्ष 1987 में उजडा. रामदीन कहते है- “बाँध बनने की बात पर पहले विश्वास नहीं होता था पर बांध बंध गया और हम कुछ नहीं कर सके. लेकिन नर्मदा माई को कोई बांध कैसे बांध सकता है, वह तो अभी भी रिसती ही हैं.
“हम तो इतने भोले थे साहब कि कुछ समझ ही नहीं पाये और बाँध में काम करने जाते रहे. अगर हम तब समझ जाते तो आवाज बुलंद करते. और जब आवाज बुलंद की तो बहुत देर हो चुकी थी.”