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रियाज़-उल-हक़

Riyaz-ul-Haque

इराकः एक देश के बारे में दो कविताएं

रियाज़-उल-हक़

 

[अमेरिकी सेना ने इराक को छोड़ दिया है. जैसा कि भारत के बारे में कहा जाता है, बहुत से लोग अब इराक के बारे में भी कहेंगे कि वह  विदेशी कब्जे से आजाद हो गया है. लेकिन हम जानते हैं और इराकी भी जानते हैं कि आजादी उनके लिए अब भी एक सपने और संघर्ष का नाम है. अमेरिकी या किसी भी विदेशी सेना के निकल जाने से कुछ नहीं होता, इस दौरान वहां जिस तरह की सत्ता संरचना को स्थापित किया गया है, जिस तरह का शासक वर्ग वहां सत्ता पर काबिज है, वह अब इस सेना द्वारा छोड़ी गई जिम्मेदारियों को पूरा करेगा. इराकी संसाधनों की लूट जारी रहेगी, वह साम्राज्यवादी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मुनाफे की चरागाह बना रहेगा. इराक की जनता की दुर्दशा और बदतर हालत में कोई कमी नहीं आएगी. लेकिन जाहिर है कि इसी के साथ इराकी जनता का शानदार और अपराजेय प्रतिरोध भी जारी रहेगा और पूरी दुनिया उसके साथ अपनी उम्मीदों को जोड़े रखने में अपनी सार्थकता तलाशेगी. पेश हैं फिलिस्तीनी कवि महमूद दरवेश और छात्र राजनीति में साक्रिय अंजनी कुमार की कविताएं. रविवार और कारवां से साभार. दरवेश की कविता का अनुवाद अनिल जनविजय ने किया है.]
 

नहर का पानी खा गया खेती

रियाज़-उल-हक़

अपनी फूस की झोंपड़ी में गरमी से परेशान छोटेलाल बात की शुरुआत आसान हो गई खेती के जिक्र से करते हैं. वे कहते हैं, ‘पानी की अब कोई कमी नहीं रही. नहर से पानी मिल जाता है तो धान के लिए पानी की दिक्कत नहीं रहती.’

पास बैठे रामसरूप यादव मानो एक जरूरी बात जोड़ते हैं, ‘अब बाढ़ का खतरा कम हो गया है.’
राजरानी इलाके में खर-पतवार के खत्म होने का श्रेय नहर को देती हैं.

शारदा में सिंचाई
 

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)