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मुक्तिदूत

अमेरिका का असली चेहरा!

मुक्तिदूत

जिनकी कोई गलती नहीं, जो ठगी का शिकार हुए, पराए देश में जिनका कोई अपना नहीं अमेरिका ने किया है उनके साथ जानवरों का सा सलूक। अपने आपको सभ्य कहने वाले, मानवाधिकारों का सबसे बड़ा रक्षक कहने वाले अमेरिका ने छात्रों के पैरों में लगा दिए हैं रेडियो कॉलर। रेडियो कॉलर या वो आधुनिक बेड़ियां जिनकी वजह से अमेरिका इन पर निगरानी रख सकता है। ये बेड़ियां पहने छात्र कहीं भी जाएं अमेरिका की उन पर पूरी नजर रहेगी। मामले की शुरूआत अमेरिका के सैन फ्रांसिस्कों की एक यूनिवर्सिटी से हुई जिसे अब फर्जी करार दिया गया है। इस ट्राई वैली यूनिवर्सिटी में जब दाखिले दिए जा रहे थे तब अमेरिकी प्रशासन खामोश बैठा था। इस यूनिवर्सिटी में हजारों छात्रों ने दाखिला लिया था, डेढ़ हजार के करीब तो भारतीय छात्र ही हैं। अमेरिकी अधिकारी अब कह रहे हैं किं यूनिवर्सिटी फर्जी है और इसने गलत तरीके से वीजा दिया। यूनिवर्सिटी तो बंद करा दी गई अब फंस गए यहां दाखिला लेने वाले छात्र। दाखिला लेने वाले तमाम छात्रों को हिरासत में ले लिया गया। जिनके पास पैसे थे वो बॉन्ड भर कर छूट गए लेकिन जिनके पास पैसे नहीं थे वो अब भी हिरासत में हैं। सबसे बड़ी वहशियाना हरकत यह कि छात्रों के पैरों में लगा दिए गए रेडियो कॉलर। सवाल ये है कि खुद को महाशक्ति कहनेवाले अमेरिका की तेज तर्रार पुलिस पहले कहां सो रही थी। कहीं ऐसा तो नहीं कि उसने भी तो तीसरी दुनिया के देशों की तरह ही अपने फायदे के लिए फर्जी यूनिवर्सिटी की तरफ से आंखें बंद कर ली थीं। मामला खुलने के बाद अब निशाना बनाया जा रहा है बेकसूर छात्रों को। जब अमेरिका के तेज तर्रार अधिकारी फर्जी यूनिवर्सिटी को नहीं पकड़ पाए तो वहां दाखिला लेने वाले छात्र कैसे जान पाते कि यूनिवर्सिटी फर्जी है, उन बेचारों का क्या कसूर है जो उन्हें इस तरह से जलील किया जा रहा है। छात्रों के साथ जानवरों सा सलूक करके अमेरिकी क्या साबित करना चाह रहे हैं। इन्सान के साथ जानवरों का सा सलूक करनेवाले वो क्या तालिबान से कम हैं?


(मुक्तिदूत से साभार)

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)