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मुकेश मानस

Mukesh Manas

नौजवान का रास्ता : भगत सिंह को क्यों याद करें?

मुकेश मानस

 

गुलामी से आजादी की कहानी

फासीवाद, साम्प्रदायिकता और दलितजन

मुकेश मानस

हिन्दुस्तान के दलित समुदायों के लिए सांप्रदायिकता और फासीवाद एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों एक दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़े हुए हैं। कहना चाहिए कि दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। हिन्दुस्तान का इतिहास इस बात का साक्षात प्रमाण है। मौजूदा हालात में तो इन दोनों को अलग करके देखा ही नहीं जा सकता है।

फिर भी ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं है जो जानते-बूझते हुए इन दोनों को अलग-अलग खानों में रखकर देखते हैं। कुछ लोग अपनी सीमाओं के कारण ऐसा कर जाते हैं। विस्तृत अध्ययन, व्यावहारिक अनुभव की कमी, दलितों के संबंध में भारतीय इतिहास की आधी-अधूरी जानकारी और संकुचित नज़रिए के कारण ये लोग ऐसा करते हैं। कई बार इन चीजों पर चलताऊ ढंग से कुछ कहने या लिखने के कारण भी ऐसा हो जाता है। मुझे यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि ऐसे लोगों में दलित राजनीतिज्ञ और विचारक भी बड़ी संख्या में शामिल हैं।

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)