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मनमोहन

Manmohan

फैज पर मनमोहन का आलेख : गुरूरे इश्‍क का बांकपन

मनमोहन

[ये फैज अहमद फैज का जन्‍मशताब्‍दी वर्ष है। इस मौके पर हिंदी की जिस पहली पत्रिका ने उन पर विशेषांक निकाला है, वह है नया पथ। इसके संपादक हैं वरिष्‍ठ आलोचक मुरली मनोहर प्रसाद सिंह। एक जनवरी को सफदर की याद में हर साल लगने वाले मेले में नया पथ के इस अंक का लोकार्पण हुआ। उस दिन हर तीसरे हाथ में ये पत्रिका नजर आ रही थी। शेष नारायण जी ने बाद में फोन पर बताया कि इस पत्रिका को तो पढ़ो ही, इसमें मनमोहन का लेख जरूर पढ़ना। फिर उन्‍होंने बताया कि मनमोहन कितने बड़े कवि हैं और कैसे राजेश जोशी कहते रहे हैं कि मुझे मनमोहन की कविताओं से डर लगता है। उन्‍होंने नया पथ के इस अंक की इमेज फाइल मुहैया भी करायी, लेकिन हम उसे टेक्‍स्‍ट में कनवर्ट नहीं कर पाये। भला हो श्री सत्‍यानंद निरुपम का कि उन्‍होंने वाया मुरली बाबू पूरा का पूरा टेक्‍स्‍ट हमें मेल कर दिया। हमारी आदतों के मद्देनजर उन्‍होंने धमकी भी दी कि शीर्षक से छेड़छाड़ मत कीजिएगा और नया पथ का पूरा पता जरूर दीजिएगा। तो नया पथ का पूरा पता है : 42, अशोक रोड, नयी दिल्‍ली 110001, फोन : 23738015, 27552954, 22750117, ईमेल : jlscentre@yahoo.com - मॉडरेटर (मोहल्ला लाइव)]

फैज अहमद फैज और उनकी शायरी की जगह और उसका मूल्य ठीक-ठीक वही बता सकते हैं, जो उर्दू जुबान और अदब के अच्छे जानकार और अधिकारी विद्वान हैं। मेरी समाई तो सिर्फ इतनी है कि अपने कुछ ‘इंप्रेशंस’ (या इस कवि के साथ अपने लगाव की कुछ तफसीलें) रख दूं, सो यहां मैं इन्हीं को रखने की कोशिश करता हूं।

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)