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हम बराबरी और संस्‍कृति का ‘विकास’ चाहते हैं: बिनायक

बिनायक सेन

10  जनवरी, 2011

[मानवाधिकार कार्यकर्ता विनायक सेन को उम्रकैद की सजा सुनाये जाने की घटना ने अपने देश के साथ-साथ दुनिया के लोगों का ध्यान खींचा है। देश के हर हिस्से से विनायक सेन की सजा के खिलाफ आवाज उठ रही है। लगभग हर दिन किसी न किसी हिस्से में प्रतिरोध सभा, प्रतिवाद मार्च आदि का आयोजन किया जा रहा है। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इस सजा की कड़े शब्‍दों में निंदा की है। छत्तीसगढ़ की स्थानीय अदालत के इस फैसले को लोग लोकतंत्र पर हमले के रूप में देख रहे हैं। ये साक्षात्कार विनायक सेन से कुछ महीनों पहले अनीश अंकुर ने लिया था, जब वे ‘चंद्रशेखर स्मृति व्याख्यान’ के सिलसिले में पटना गये थे। अनीश ने इस साक्षात्‍कार को भेजने के साथ ही ये सूचना दी है कि ये द संडे पोस्‍ट में छपा है : मॉडरेटर - मोहल्ला लाइव]

क्या आपको कभी उम्मीद थी कि छत्तीसगढ़ सरकार आपको माओवादियों के समर्थक होने का आरोप लगा सकती है? एक मानवाधिकार कार्यकर्ता और गरीबों की सेवा करनेवाले डॉक्टर के साथ ऐसा व्यवहार कर सकती है?

भारत में मानवाधिकार का हनन व्यापक स्तर पर हो रहा है, बल्कि ये और बढ़ रहा रहा है। हमलोगों ने उम्मीद की थी या नहीं, ये महत्वपूर्ण बात नहीं हैं। जेल में रहते हुए ये देखने को मिला कि बड़े पैमाने पर, बिना पर्याप्त सबूत के, लोगों को बंद करके रक्खा गया है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को हतोत्साहित करना राज्य का लक्ष्य है। राज्य, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के कार्यकलापों से नाखुश है। जो वाकया मेरे साथ हुआ, वैसा बहुत सारे लोगों के साथ हुआ है। बहुत लोग ऐसे हैं, जिनको कोई जानता भी नहीं। चूंकि मेरा नाम प्रकाश में आ गया, अन्यथा ऐसे लोगों की संख्या अनगिनत है।

क्या वैश्‍वीकरण और उदारीकरण की प्रक्रिया, जो लगभग डेढ़-दो दशक पहले शुरू हुई, उसके आगे बढ़ने के दौर में मानवाधिकारों पर हमले ज्यादा हुए हैं? क्या निजीकरण भूमंडलीकरण का दौर आम लोगों पर हमले के रूप में आया है? जो भी लोगों के सीमित लोकतांत्रिक हक थे, उसकी कटौती के रूप में आया है या दोनों क्या अलग-अलग प्रक्रिया है या इनमें कोई संबंध भी है?

दोनों एक ही प्रक्रिया के जरिये हुआ। पूरी इकॉनॉमी के काम करने का तौर-तरीका ही ऐसा है कि अमीर लोगों को ज्यादा से ज्यादा फायदा हो और गरीबों के पास जो कुछ भी है, उसे छीन लिया जाए। मिनरल्स, खनिज, भूमि के संबंधों, सब कुछ का सरकार अपने हिसाब से तय करना चाहती है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी-बड़ी कंपनी गरीब देशों में कृषि कार्य में दिलचस्पी लेने लगी है। इस प्रक्रिया में जो परंपरागत संसाधन है, उसे छीन लेने की कोशिश हो रही है। सिर्फ इतना ही नहीं आदिवासियों को उनके अपने ही इलाकों से बड़े पैमाने पर हटाया जा रहा है। संविधान के नीति निर्देशक सिद्धांतों में स्टेट को कहा गया है कि जो भी संसाधन है, उनका इस्तेमाल आम जनता की भलाई के लिए होगा, न कि वर्ग विशेष के लिए। इसके विपरीत आज सिर्फ खास लोगों के इस्तेमाल के लिए उन संसाधनों का उपयोग किया जा रहा है। और इस पूरी प्रक्रिया को अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूंजी और उनके भारतीय गुर्गो के फायदे के लिए इसे ‘डेवलपमेंट’ का नाम दिया जा रहा है। यहां तक कि पं बंगाल के मुख्यमंत्री भी ‘डेवलपमेंट’ की बात कर रह हैं। ‘डेवलपमेंट’ अपने आप में पर्याप्त नहीं है। डेवलपमेंट किसके लिए? क्यों? और किसी कीमत पर? ये ज्यादा जरूरी सवाल है।

‘डेवलपमेंट’ का मतलब आज औद्योगिक विकास से लगाया जाता है। औद्योगिक विकास से क्या परेशानी है? यह तो समाज को आगे ले जानेवाली चीज मानी जाती है। कहीं खेती-किसानी पर जोर देने के पीछे एक गहरी राजनीति तो नहीं है कि अमेरिका सहित पश्चिमी देश जो औद्योगिक विकास की एक ऊंचाई पर पहुंच गये हैं, वहां भारत जैसे तीसरी दुनिया के लोग न पहुंचें? भारत जैसे पिछड़े और कृषि प्रधान देशों को ये विकसित पूंजीवादी देश कह रहे हैं कि आप खेती पर ही ध्यान दें, आलू-प्याज उपजाते रहें जबकि औद्योगिक विकास तो सिर्फ हमलोगों का हक है, पश्चिमी देशों का हक है। कहीं जमीन और खेती के पक्ष में चलनेवाला आंदोलन इस साम्राज्यवादी परियोजना में तो नहीं फंस गया है?

आपके कानून में प्रावधान है कि लोगों का हक उनके संसाधनों पर है। संविधान के इस हक को पहचाना जाना चाहिए। पहला अधिकार लोगों का है – ये कानून है। ये एक ऐतिहासिक गलती हुई है। उसका प्रतिकार होना चाहिए। पहले हक मानकर फिर यदि उनकी जमीन लेनी भी है, तो मुआवजे के रूप में उन्हें पैसा, या दूसरी जगह जमीन मुहैया कराया जाना चाहिए। अपने जो कानून हैं, उनका पालन करना चाहिए या नहीं? अभी जो ‘क्लाइमेट’ चेंज की वजह से जो अचानक पारिस्थितिक संकट पैदा होनेवाला है, यह डेवलपमेंट की गलत परिभाषा के कारण हो रहा है। हम बराबरी का, एकता का और अपनी संस्कृति का डेवलपमेंट चाहते हैं। डेवलपमेंट का उद्देश्य समानता होना चाहिए। पूंजी के फायदे के लिए डेवलपमेंट की सीमित परिभाषा लाएंगे, तो कैसे होगा?

आपने प्रतिकार की बात की। आखिर क्या कारण है कि आजकल प्रतिकार काफी कम हो गया है। वर्तमान केंद्र सरकार द्वारा खाद्य पदार्थों की चीजें इतनी ज्यादा महंगी कर दी गयी हैं कि वो अब आम लोगों की पहुंच से लगभग बाहर हो चुकी है। लोग तकलीफ में हैं, परेशान हैं। पर कहीं कोई प्रतिरोध नजर नहीं आ रहा। अगर थोड़ा-बहुत प्रतिरोध है भी, तो प्रभावी नहीं है। जबकि पहले थोड़ी-बहुत भी महंगाई बढ़ने पर बड़े-बड़े जनांदोलन हो जाया करते थे। इस बदलाव के पीछे क्या कारण हो सकते हैं?

मेरे ख्याल से अभी बड़ा तबका पैदा हो गया है, जो भौतिक आधारों पर सोचता-विचारता है। उनकी संख्या शहरों में ज्यादा है, ये दिखनेवाला तबका है। हालांकि शहरों में गरीबों की संख्या भी बहुत ज्यादा है। पर वो ठीक से ‘रिस्पांड’ नहीं कर पा रहा है। ऐसा लोग ये समझ रहे हैं कि दैनिक जीवन दिनोंदिन कठिन होता जा रहा है। तकलीफ झेलनेवाले लोगों का ‘रिस्पांस’ तो है, भले वो दिखता नहीं। देखिए हिंदुस्तान की आबादी के ऊपर के 30 प्रतिशत लोगों की हालत में सुधार हुआ है। बाकी लोग ऐसे ही हैं। गरीब लोगों को संगठित मंच नहीं मिल पा रहा। उनकी असंतुष्टि दर्ज नहीं हो पा रही। लेकिन विस्थापन एक प्रमुख मुद्दा है। विस्थापन पर हरेक जगह प्रतिरोध हुआ है। महंगाई और आवश्यक चीजों की मूल्य वृद्धि से ज्यादा मौलिक व गहरी समस्या है, विस्थापन। जो था वो विनाश के कगार पर है। जीने और मरने के कगार पर है। मेडिकल में एक टर्म होता है ‘बॉडी-मास इंडेक्स’ (बीएमआई) को आगे 18.5 से कम है, तो समझना चाहिए कि वो बहुत बुरी स्थिति है। और ऐसा लगभग 50 प्रतिशत से भी ज्यादा लोगों के साथ है। लोगों को उनके संसाधनों से महरूम किया जा रहा है। बच्चा बचेगा या नहीं? पत्नी बचेगी या नहीं? या फिर डिलीवरी के दौरान वो जीवित रहेगा या नहीं? ये सवाल विस्थापन से गहरे जुड़े हैं। फिर शहरों में भी समस्याएं हैं। लोगों को 12-12 घंटे काम करना पड़ता है।

आपके कल के व्याख्यान से ऐसा लग रहा था कि हिंसा के सवाल पर अब थोड़े डिफेंसिव है। आत्मरक्षा के लिए की गयी हिंसा को तो आप जायज ठहराते हैं लेकिन यदि व्यापक सामाजिक बदलाव के लिए हिंसा का सहारा लिया भी जाए तो क्या दिक्कत है? हिंसा बनाम अहिंसा के सवाल को आप कैसे देखते हैं – विशेषकर माओवादियों के चल रहे आंदोलन के संदर्भ में?

हिंसा या अहिंसा को च्वाइस यानी चुनाव के रूप में पेश नहीं किया जा सकता। महत्वपूर्ण ये है कि हम किस ’कॉन्टेक्‍स्‍ट’ में, किस परिस्थिति में काम कर रहे हैं। लड़ाई में माध्यम का चुनाव कोई स्वैच्छिक मामला नहीं रहता, वो अनिवार्यता रहती है। हिंसा या अहिंसा को स्‍वैच्छिक मामला बताना दरअसल पॉलिटिक्स का एनजीओकरण करना है। हमें अभी पॉलिटिकल इकॉनॉमी के जो कंट्राडिक्‍शंस हैं, उन पर ध्यान देना चाहिए। पॉलिटिकल स्ट्रैटजी (राजनीतिक रणनीति) और मिलिट्री स्ट्रैटजी (सैन्य रणनीति) को एक कर दिया जाता है, तो दिक्कत होती है। यदि मिलिट्री अल्टरनेटिव (सैन्य विकल्प) को आपने अनिवार्य शर्त बना दिया, तो बाकी मूवमेंट में समस्या पैदा होगी, उसके राजनीतिक स्वरूप में समस्या पैदा होगी। रणनीतिक रूप से मिलिट्री ऑप्शन घातक साबित हो सकता है। हां यदि आत्मरक्षा के तौर पर कोई मिलिट्री या हिंसा का सहारा लेता है, तो उस पर कोई सवाल ही नहीं है।

आपकी बात से ऐसा प्रतीत होता है कि समकालीन दौर में राज्य बेहद ताकतवर हो गया है। और तमाम चीजें वह जैसे चाहता है, कर रहा है? तो क्या सब कुछ ऐसा ही चलता रहेगा? इस व्यवस्था का कोई विकल्प नहीं निर्मित हो पाएगा?

मेरे ख्याल में सक्रियता के लिए जगह है। लोगों की सक्रियता से फर्क पड़ सकता है, भले विकल्प तैयार हो या न हों। अगर हम सैन्यीकृत मुकाबले में जाते हैं तो इसका मतलब पूरा समाज सैन्यीकृत हो जाएगा, वो भयावह परिस्थिति होगी। अतः हरेक आदमी को शांति के लिए कोशिश करनी चाहिए। सिविल सोसाइटी के भीतर से शांति की मांग उठनी चाहिए। तटस्थता को छोड़ना होगा। न्याय, बराबरी व मानवाधिकारों के लिए सबको प्रयास करना होगा। शांति कायम करने के लिए वार्ताएं हों। तमाम संबंधित पक्ष एक साथ आएं।

आपने छत्तीसगढ़ के प्रख्यात मजदूर नेता शंकर गुहा नियोगी के साथ काम किया है। इसी सितंबर के अंतिम सप्ताह में उनकी हत्या हुई थी। उनकी मौत के 18 साल बाद यदि हम उनका मूल्यांकन करें, तो वो क्या चीज थी, जो शंकर गुहा नियोगी के आंदोलन से आज के दौर में सीखा जा सकता है। ऐसा सुना गया है कि छत्तीसगढ़ में शंकर गुहा नियोगी के आंदोलन में शामिल लोग बाद में नक्सल या माओवादी हो गये?

शंकर गुहा नियोगी के लोग नक्सल रास्ते पर गये हैं। शंकर गुहा नियोगी एक मजबूत ट्रेड यूनियन नेता थे। ट्रेड यूनियन की शुरुआत उन्होंने खदान मजदूरों के बीच शुरू किया। ज्यादातर मजदूर छत्तीसगढ़ के थे। छत्तीसगढ़ी आइडेंटिटी को क्लास आइडेंटिटी के साथ जोड़ा गया, जो कि मजदूर वर्ग की राजनीति में एक बड़ा बदलाव था। साथ ही ट्रेड यूनियनिज्म में एक जो ब्यूरोक्रेटिज्म का एलीमेंट रहता है, उससे भी निकलने का रास्ता तैयार हुआ। ज्यादा मजदूर किसान पृष्‍ठभूमि से आये थे। गांव से उनका जीवित रूप से जुड़ाव था। रिटायरमेंट के बाद वे लोग गांव चले जाते थे। अपने गांव के साथ इन मजदूरों का जीवित संबंध था, साथ ही ‘डेवलपमेंट’ के मुद्दों का ट्रेड यूनियन के भीतर आधार प्रदान किया गया। इस प्रकार वर्किंग क्लास के नियंत्रण में एक व्यापक परियोजना को विकसित होने का मंच मिला। बाद में समस्याएं पैदा हुईं। इसकी सीमाएं भी जाहिर हुई। फिर व्यापक मंच के साथ न जुड़ पाने में भी यह आंदोलन असक्षम हुआ। ये सब अंर्तविरोध सामने आने लगे। शंकर गुहा नियोगी एक बड़े स्ट्रैटेजिक थिंकर थे। हो सकता है कि जीवित रहते तो कोई हल निकालते, पर समस्याएं थीं। उनका आंदोलन व संगठन जब तक दल्लीराजहरा में रहा, कोई दिक्कत न था – जब उसे भिलाई में फैलाने की कोशिशें हुईं, तभी उनकी हत्या की गयी।


(मोहल्ला लाइव से साभार)
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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)