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अंधेर नगरी के राजा

पुण्य प्रसून बाजपेयी

पहली बार किसी प्रधानमंत्री ने माफी मांगी। पहली बार लोकसभा में विपक्ष के किसी नेता ने माफ भी कर दिया। पहली बार भ्रष्टाचार, महंगाई और कालेधन पर सरकार कटघरे में खड़ी दिखी। पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री से लेकर जांच एंजेसियों को समाजवादी सोच का पाठ यह कर पढ़ाया कि अपराध अपराध होता है। उसमें कोई रईस नहीं होता। पहली बार प्रधानमंत्री के चहेते कारपोरेट घरानों को भी अपराधी की तरह सीबीआई हेडक्वाटर में दस्तक देनी पड़ी। पहली बार चंद महीने पहले तक सरकार के लिये देश के विकास से जुडी डीबी रियल्टी कार्पो सरीखी कंपनी के निदेशक जेल में रहकर पद छोड़ना पड़ा। पहली बार पौने सात साल के दौर में यूपीए में संकट भ्रष्टाचार के खिलाफ हो रही कार्रवाई को लेकर मंडराया। और पहली बार सरकार को बचाने भी वही दल खुल कर आ गया जिसकी राजनीति गैर कांग्रेसी समझ से शुरु हुई। यानी पहली बार देश में यह खुल कर उभरा कि मनमोहन सिंह सिर्फ सोनिया गांधी के रहमो करम पर प्रधानमंत्री बनकर नहीं टिके है बल्कि देश का राजनीतिक और सामाजिक मिजाज भी मनमोहन सिंह के अनुकूल है।

पहली बार संसद ने भी माना कि विकास को लेकर आर्थिक सुधार की जो जमीन मनमोहन-इकनॉमिक्स ने बनायी है, उसकी बिसात ही भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रही है । और इन सब के बीच देश के सामने वैकल्पिक राजनीति ही नही बल्कि आर्थिक नीतियों का भी कोई खाका नहीं है जो सामाजिक तौर पर कारपोरेट जगत के टर्नओवर को तीन सौ से तीन हजार फीसदी बढाने के साथ साथ के साथ साथ देश के किसान-मज़दूरो की क्रय शक्ति में दस फिसदी का ही इजाफा कर दें। संसदीय राजनीति के पास भी ऐसे तौर-तरीके नहीं है, जो पूंजी पर टिकती जा रही चुनावी व्यवस्था के सामानांतर बिना पूंजी भी संसदीय लोकतंत्र का जाप जनता से करवा सके। यानी हाशिये पर खड़े देश के 80 करोड़ लोगों के सवाल उनके अपने नुमाइंदों के जरिये पूरे हों और देश में बनती विकास की नीतियों को न्यूनतम से भी जोड़ सके। इसका कोई चेहरा देश के सामने नहीं है। वहीं इसके उलट सत्ता का विकेन्द्रीकरण पूंजी और मुनाफे के बंटवारे के आसरे कुछ इस तरह फैला है, जिससे सत्ता की नयी परिभाषा में हर वह संस्था सत्ता में तब्दील हो चुकी है, जिसके आसरे विकल्प के सवालो को जन्म लेना था। यानी राजनीति अगर सत्ता लोभ में पटरी से उतरने लगे तो संस्थाओं के आसरे उसपर नकेल कसने की जो प्रक्रिया अपनायी जानी चाहिये, वह भी पटरी ही बन जाये तो क्या होगा। सीधे कहें तो भ्रष्टाचार, महंगाई या कालेधन के सवाल पर लोकतंत्र के पहरुओं के तौर पर जिन संवौधानिक संस्थाओं को अपनी भूमिका निभानी चाहिये अगर उन्ही संस्थाओं की विश्वसनीयता खत्म होने लगे तो क्या होगा।

असल में पहली बार देश के आमजन के सामने संवैधानिक संस्थाओं के जरिये भी रास्ता ना निकल पाने का संकट है। यानी संस्थाएं अगर ढहती नजर आ रही है तो विकल्प के सवाल किस आसरे देश के मानस पटल पर छा सकते हैं, यह सवाल संसदीय राजनीति में सत्ता के लिये मशगूल राजनीतिक दलों के सामने भी है और आंदोलनों के जरिये सरकार पर दबाव बनाने वाले संगठनों के सामने भी। लेकिन वह किस चेहरे को लिये सामने आये, यह जवाब किसी के पास नहीं है। इसलिये सवाल यही है कि जो आर्थिक परिस्थितियां देश की राजनीति को भी अपने हिसाब से चला रही है और जिन माध्यमों के जरिये विकास का खांचा खींच कर देश के भीतर कई देश बना रही है, क्या उसे बदला जा सकता है। क्या संसदीय व्यवस्था के भीतर राजनीति करने की इतनी जगह बची हुई है, जहां चुनाव के नये मापदंड तय किये जा सकें। क्या सत्ता से टकराने में इतना लोकतंत्र देश के भीतर बचा हुआ है जहां पुलिस-प्रशासन विकल्प की सोच को राजद्रोह या गैरकानूनी करार देकर जेल में ना ठूंस दें। क्या लोकतंत्र के तीन स्तम्भों पर निगरानी रखने वाला मीडिया में इतनी मानवीयता अब भी बची है कि वह जनमानस की हवा को मुद्दों के आसरे आंधी बनाने में बिना मुनाफा काम करें। क्या यह संभव है कि देश के खनिज संस्धानों से लेकर देश की न्यूनतम ज़रुरत पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य के मद्देनजर पहले समूचे देश को सरकारी व्यवस्था नापे और संस्थायें काम में जुट जाएं। क्या यह संभव है कि विकास की जो नीति शहरीकरण और बाजारीकरण के जरिए कॉरपोरेट के आसरे मुनाफा पंसद नीति बनायी जा रही है, उसे कानून के जरिये बदला जाये। यानी बैकों को लेकर कानून बन जाये कि जनता का पैसा बहुसंख्यक जन के हित की योजनाओ को अमली जामा पहनाने के लिये एक नियत वक्त में सरकारी संस्थाओ के जरीये जन नुमाइंदों की निगरानी में पूरा किया जायेगा। गड़बड़ी होने पर आपराधिक कानून काम करेगा।

क्या यह संभव है कि कानून बनाकर बैंकिंग सेक्टर को किसान-खेती से जोड़ा जाये । मसलन बैंकों को हर हाल में किसानों को खेती के लिये तीन फीसदी पर कर्ज देना है, नहीं दिया तो पैनल्टी में बैंक से उस क्षेत्र के किसानो की संख्या के मुताबिक वसूली होगी। क्या खेती की ज़मीन पर कानूनन पूरी तरह रोक लगाकर खरीदने-बेचने वालों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज नहीं किया जा सकता है। और खेती के लिये सिंचाई से लेकर कटाई और गोदाम से लेकर बाज़ार तक फसल पहुंचाने के लिये इन्फ्रास्ट्रक्चर को उद्योग का दर्जा देकर नयी नीति नहीं बनायी जा सकती है। क्या औद्योगिकीरण के लिये देश की करोड़ों एकड बंजर जमीन को विकास से जोड़ने की योजना बनाने की दिशा में योजना आयोग को नहीं लगाया जा सकता है। क्या बुंदेलखंड सरीखे देश के पिछडे इलाको में देश के सबसे बेहतरीन शिक्षा और स्वास्थ्य केन्द्र खोलकर एक नया आर्थिक मॉडल नहीं बनाया जा सकता है। जो अपने इर्द-गिर्द रोज़गार का एक पूरा खाका खडा कर सकता हो । क्या गांव को शहरो में तब्दील करने की जगह गांवो के माहौल-जरुरत के मुताबिक विकास का वैकल्पिक ढांचा खड़ा नहीं किया जा सकता है। क्या पब्लिक सेक्टर के जरिये विकास की उन योजनाओ को अमल में नहीं लाया जा सकता है जो कॉरपोरेट या निजी हाथो में लाइसेंस थमाकर देश के इन्फ्रास्ट्रक्चर को भी सस्ते में लुटाया जाता है और बैंकों के जरिये सस्ते में पूंजी जुगाड़ने का रास्ता भी साफ कर दिया जाता है। क्या देश का एक आर्थिक इंडेक्स नहीं बनाया जा सकता । जिसके मातहत रोटी से लेकर ज़मीन और शिक्षा से लेकर मकान तक की कीमत देश में एक निर्धारित खांचे से बाहर ना निकले। यानी जमीन की कीमतें अगर बढ़ती है तो गेहूं-चावल और भाजी की कीमते भी उसी रुप में बढेंगी। फ्लैट अगर दस लाख की जगह एक करोड़ हो सकते हैं तो दाल-चावल की कीमतें एक हज़ार रुपये प्रति किलोग्राम क्यो नहीं हो सकती। अगर यह नहीं हो सकता तो फिर जमीन-फ्लैट या वैसे हर प्रोडक्ट की कीमतें भी एक सीमित दायरे में ही रहेगी जिससे कालाधन बनाने या कालाधन को इन्वेस्ट करने के रास्ते रुके। यानी कीमत बाज़ार नहीं देश की ज़रुरत के मुताबिक सरकार तय करें जो पंचायत स्तर से लेकर संसद तक में काम कर रही हो। शायद यह सब कुछ हो सकता है लेकिन इसके लिये संसदीय ढांचे की चुनावी प्रक्रिया को भी सस्ता करने की जरुरत पड़ेगी। ज़रुरी है कि देश में चुनाव लडने के लिये 10 रुपये का फॉर्म मिले। यानी 25 हज़ार रुपये ना देने पड़े।

ज़रुरी है कि पंचायती राज व्यवस्था से लेकर लोकसभा तक की प्रक्रिया आपस में इस तरह जुड़े, जिससे हर पचास हज़ार लोगो को अपना नुमाइंदा सीधे नज़र आये । यानी चार स्तर या चौखम्भा राज की व्यवस्था ज़मीनी तौर पर हो। चूंकि यह सब नहीं है इसलिये चुनावी व्यवस्था में नीतियाँ-विचारधारा हाशिये पर है और उसी का प्रतिफल है कि ममता बनर्जी बंगाल में भूमि-सुधार से लेकर भूमि अधिग्रहण और किसान-मज़दूर आदिवासियो के सवाल पर कांग्रेस की सोच से ठीक उलट है लेकिन बंगाल में दोनों एक साथ हैं। दिल्ली में पूर्व कैबिनेट मंत्री ए राजा को भ्रष्टाचार के आरोप में जेल भिजवाने पर प्रधानमंत्री खुशी जाहिर करते है, उसी ए राजा को चेन्नई में वही डीएमके क्लीन चिट दे देती है। और दोनों एकसाथ मिलकर चुनाव भी लड़ते है और केन्द्र की सरकार भी सभी साथ मिलकर चलाते है । यानी विकास के हर मुद्दे पर देश के खिलाफ लिये जा रहे निर्णयों पर एक वक्त के बाद अगर प्रधानमंत्री माफी मांग लें और विपक्ष माफ कर दें और इस संसदीय व्यवस्था को बरकरार रखने के लिये कोई ना कोई राजनीतिक दल आंकड़ों के लिहाज से संसद के भीतर खानापूर्ती करते रहें तो सवाल यही है कि व्यवस्था का राजद्रोह और राजनीति की जनविरोधी सोच और क्या होती है।


(हस्तक्षेप से साभार)


लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)