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दिलीप मंडल

राडिया कांड : कौए कभी कौए का मांस नहीं खाते?

दिलीप मंडल

मीडिया के बारे में अक्सर कहा जाता है कि हर किसी की बंद मुट्ठी खोलने को तत्पर मीडिया कभी अपनी मुट्ठी नहीं खोलता। ब्रिटिश पत्रकार निक डेविस ने मीडिया और लॉबीइंग के रिश्तों के बारे में अपनी चर्चित किताब “फ्लैट अर्थ न्यूज” की भूमिका की शुरुआत में मीडिया के बारे में लिखा है कि कुत्ता कुत्ते को नहीं खाता और भूमिका के अंत में लिखा है कि इस नियम को तोड़ने की जरूरत है। मीडिया में यह अघोषित विधान रहा है कि देश-दुनिया में जो कुछ हो रहा है, सब कुछ बताओ, लेकिन अपने बारे में और अपने कारोबार से जुड़े अन्य संस्थानों और लोगों के बारे में न बताओ। इसके उदाहरण आसपास देख सकते हैं।

मिसाल के तौर पर 2009 में जब आर्थिक मंदी के दौर में भारत में छंटनियां हो रही थीं, तो कारोबार के अलग-अलग क्षेत्रों में नौकरियां खत्म होने की खबरें देने वाले अखबारों या चैनलों ने यह नहीं बताया कि मीडिया में भी बड़े पैमाने पर छंटनी हुई है और वेतन घटाये गये हैं। मीडिया के मालिक और संपादक राजनेताओं ओर पार्टियों के करीब हैं, यह बात हम तभी जान पाते हैं, जब कोई मालिक या संपादक राज्यसभा का सदस्य बन जाता है या पद्मश्री या पद्मविभूषण से सम्मानित किया जाता है। मीडिया कभी नहीं बताता कि उसके कौन से और कारोबार और कारोबारी हित हैं और इस बात का उसकी संपादकीय नीति पर किस तरह असर पड़ता है। मिसाल के तौर पर भारत में प्रमुख मीडिया हाउस, मीडिया से इतर लगभग ढाई सौ और कारोबार में हैं। यह कारोबार कुछ भी हो सकता है, मसलन – चीनी मिल, तेल मिल, रियल एस्टेट, माइनिंग, स्टील, शिक्षा, फिल्म निर्माण, अचार, रसायन उद्योग, रिटेलिंग आदि। लेकिन यह बात पाठकों और दर्शकों को पता नहीं चलती।

राडिया कांड और मीडिया: धंधा है और गंदा है

दिलीप मंडल

9 जनवरी, 2011

यह छवियों के विखंडन का दौर है। एक सिलसिला सा चल रहा है, इसलिए कोई मूर्ति गिरती है तो अब शोर कम होता है। इसके बावजूद, 2010 में भारतीय मीडिया की छवि जिस तरह खंडित हुई, उसने दुनिया और दुनिया के साथ सब कुछ खत्म होने की भविष्यवाणियां करने वालों को भी चौंकाया होगा। 2010 को भारतीय पत्रकारिता की छवि में आमूल बदलाव के वर्ष के रूप में याद किया जाएगा। देखते ही देखते ऐसा हुआ कि पत्रकार सम्मानित नहीं रहे। वह बहुत पुरानी बात तो नहीं है जब मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता था। लेकिन आज कोई यह बात नहीं कह रहा है। कोई यह बात कह भी रहा है तो उसे पोंगापंथी करार दिया जा सकता है।

मीडिया का स्वरूप पिछले दो दशक में काफी बदल गया है। मीडिया देखते ही देखते चौथे खंभे की जगह, कुछ और बन गया। वह बाकी धंधों की तरह एक और धंधा बन गया। मीडिया को एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के साथ जोड़ दिया गया और पता चला कि भारत में यह उद्योग 58,700 करोड़ रुपए का है। अखबार और चैनल चलाने वाली कंपनियों का सालाना कारोबार देखते ही देखते हजारों करोड़ रुपए का हो गया। मुनाफा कमाना और मुनाफा बढ़ाना मीडिया उद्योग का मुख्य लक्ष्य बन गया। मीडिया को साल में विज्ञापनों के तौर पर साल में जितनी रकम मिलने लगी, वह कई राज्यों के सालाना बजट से ज्यादा है।

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)