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डेविड माइकल ग्रीन

विकिलीक्स और पेंटागन पेपर्स

अनिल एकलव्य

(ज़ेड मैग में प्रकाशित डेविड माइकल ग्रीन के लेख "व्हाट विकिलीक्स रियली रिवील्स" पर आधारित)

[अनुवादकों की कमी, बल्कि एकदम अनुपलब्धता, के चलते हम कुछ चुने हुए लेखों का सार या संक्षिप्त रूप सह-संचार में प्रकाशित करने का क्रम आज से शुरू कर रहे हैं। संभव है इन लघु लेखों में मूल लेख से बाहर की कुछ अतिरिक्त जानकारी भी हो या हिन्दी लेखक (रुपांतरकार कह लीजिए) की टिप्पणी भी हो।]

विकिलीक्स को लेकर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। फिर भी कुछ पहलू हैं जिन पर सही से नज़र शायद नहीं डाली गई है। डेविड माइकल ग्रीन अपने इस लेख में उन्हीं में से एक पहलू पर ध्यान दिलाते हैं। वो इस सवाल का जवाब देने की कोशिश करते हैं कि विकिलीक्स द्वारा अब तक सामने लाए गए दस्तावेज़ों से असल में क्या तथ्य सामने आते हैं। ऐसा करने के लिए वे इन दस्तावेज़ों की तुलना कई दशक पहले डैनियल एल्सबर्ग के पेंटागन पेपर्स से करते हैं। पेंटागन पेपर्स हालांकि संख्या में कम थे (तब इतनी बड़ी संख्या में दस्तावेज़ों को कहीं से कहीं ले जाना तकनीकी रूप से भी संभव नहीं था) पर उनमें जो कुछ था उससे उच्च स्तर के अधिकारियों के सोचने और काम करने के तरीके का पता चलता था। यह बात भी खुल कर सामने आती थी कि ये अधिकारी जो सार्वजनिक रूप से कहते हैं और जो गोपनीयता के पर्दे के पीछे कहते हैं उसमें कितना बड़ा अंतर है। सीधे शब्दों में कहा जाए तो पेंटागन पेपर्स से सरकारी झूठों का, बल्कि झूठ पर आधारित पूरी व्यवस्था का पर्दाफ़ाश होता था। अगर ऐसा नहीं होता तो उन दस्तावेज़ों का कोई खास महत्व नहीं होता।

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)