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जनपक्ष

मिस्र में सफल रही जनता की क्रांति,राष्ट्रपति होस्नी मुबारक ने दिया इस्‍तीफा

(जनपक्ष से साभार)

मिस्र में करीब 15 दिन से चल रही जनता की ‘क्रांति’ रंग ला चुकी है। मिस्र में 30 साल से सत्ता में काबिज रहे राष्ट्रपति ने आखिरकार आंदोलनकारियों के सामने घुटते टेक दिए। उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।राष्‍ट्रपति हुस्‍नी मुबारक को लेकर खबर आ रही है कि वह देश छोड़ चुके हैं और सत्‍ता उप राष्‍ट्रपति के हवाले कर गए हैं।

उपराष्‍ट्रपति ने आज मुबारक के इस्‍तीफे की घोषणा कर दी। इससे पहले जनता ने राष्‍ट्रपति महल की ओर मार्च किया। इसी बीच सेना ने कहा है कि वे देश से आपातकाल हटाने को राजी हैं और जैसे ही स्थितियां सामान्य होंगीं, आपातकाल हटा लिया जाएगा।

मुबारक के पद छोड़ते ही पूरे देश में जश्न का माहौल है। इससे पूर्व मुबारक पर पद छोड़ने को लेकर चारों तरफ से दबाव बढ़ रहा था।

ईरान के प्रेस टीवी ने खबर दी कि हुस्नी मुबारक मिस्र छोड़कर भाग गए हैं। अपुष्ट खबरों के मुताबिक मुबारक के साथ सेना प्रमुख भी शर्म-एल-शेख के रेड-सी रिसॉर्ट में हैं।

उधर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भी मिस्र के हालात पर नजर रखे हुए थे। वहां की आम जनता को देश की सेना का भी समर्थन मिला हुआ था। इसकी वजह से ना चाहते हुए भी मुबारक को अपने पद से इस्तीफा देने के लिए बाध्य होना पड़ा।

इससे पूर्व शुक्रवार को ही हुस्नी मुबारक राजधानी काहिरा छोड़कर अज्ञात स्थान के लिए रवाना हो गए थे। समाचार एजेंसी डीपीए के मुताबिक राष्ट्रपति महल से मुबारक हेलीकॉप्टर से अज्ञात स्थान के लिए रवाना हुए। ऐसा माना जा रहा है कि वे शर्म-अल-शेख के रेड सी रिसोर्ट गए होंगे।

उल्लेखनीय है कि वर्ष 1981 से सत्ता पर काबिज मुबारक पर पद छोड़ने का चौतरफा दबाव बढ़ गया था।मिस्र में 82 वर्षीय मुबारक के 30 साल पुराने शासन को खत्म करने के लिए लाखों प्रदर्शनकारी 25 जनवरी से आंदोलन कर रहे हैं।

उनके इस्तीफे की मांग को लेकर पिछले दो सप्ताह से देशव्यापी आंदोलन जारी है। राजधानी काहिरा का तहरीर चौक पिछले 25 जनवरी से आंदोलन का केंद्र बना हुआ था।

संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक 25 जनवरी के बाद से विरोध प्रदर्शनों में देश में अब तक 300 लोगों की मौत हो चुकी है।

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)