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कनक तिवारी

Kanak Tiwari

थैंक यू, सुप्रीम कोर्ट

कनक तिवारी

इधर कुछ महीनों से सुप्रीम कोर्ट ने देश की चिंता करने में ज़्यादा सक्रियता बरतने का परिचय दिया है. वैसे वे सब काम कार्यपालिका अर्थात केन्द्र सरकार को ही करने थे. देश की यह हालत है कि मुद्दई सुस्त गवाह चुस्त की तरह आचरण हो रहा है.

न्यायिक सक्रियता का लेकिन बढ़ जाना लोकतंत्र के लिए अच्छा लक्षण नहीं है. इससे धीरे-धीरे न्यायपालिका में भी एक तरह का अधिनायकवाद उभरता रहा है. लेकिन मौज़ूदा हालत यह है कि यदि न्यायतन्त्र ने तन्त्र के अन्याय के खिलाफ लोकतांत्रिक मूल्यों का बचाव नहीं किया तो जनता में भयानक पराजय की भावना पनपने लगेगी. मौजूदा समय में वही एक पुराना कारण राजनेताओं और नौकरशाहों को जुल्मखोर बनाता नज़र आ रहा है क्योंकि भारतीय जनता में इक्कीसवीं सदी में भी अन्याय के खिलाफ उठ खड़े होने का मुनासिब जज्बा दीख ही नहीं रहा है.p-j-thomas

 

केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त पी जे थॉमस के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के प्रशासनिक-न्यायिक विवेक पर सीधा तमाचा मारा है. शुरू में यह भ्रम फैलाया गया कि तीन सदस्यीय चयन समिति के सामने थॉमस की वह पुरानी फाइल रखी ही नहीं गई जब उनके खिलाफ केरल राज्य के सचिव के रूप में पामोलिन घोटाले में उनका भी नाम अभियुक्तों में संलग्न किया गया था.

 

गांधी, तुम तो रोज मरते हो

कनक तिवारी

इतिहास में अब तक यह तय नहीं हो पाया है कि गांधी लोगों की मुसीबत हैं या लोग गांधी की. ताज़ा इतिहास का यह सबसे बड़ा दुनियावी शख्स लगभग सर्वसम्मति से सहस्त्राब्दी का नायक मान लिया गया है. यह मुख्यतः उस अमरीका की पहल पर हुआ है, जहां गांधी कभी नहीं गए थे. उन्होंने अमरीकी राष्ट्रपति की यह सलाह भी अनसुनी कर दी थी कि यदि गांधी चाहें तो अमरीका भारत की आज़ादी को लेकर ब्रिटिश प्रधानमंत्री से मध्यस्थता करने को तैयार है.

अमरीका में ही मार्टिन लूथर किंग जूनियर हुए जिन्होंने अश्वेतों के पक्ष में प्रसिद्ध मांटगोमरी मार्च निकाला. उन्हें अमरीकियों ने मार डाला और वे दुनिया में अश्वेत गांधी के रूप में मशहूर हो गए. अमरीका का प्रजातांत्रिक ढांचा ऊपरी तौर पर मानव अधिकारों का रक्षक है. वहां न्यायपालिका की श्रेष्ठता असंदिग्ध है. इसके बावजूद अमरीका पूरी दुनिया में पूंजीवाद का सरगना शोषक बना हुआ है. उसके नाम से किसी देश की घिग्गी बंध जाती है. किसी दूसरे को मितली आने लगती है. कोई उससे छुटकारा पाने को मोक्ष के बराबर समझता है. दुनिया में लेकिन भारत वह महान देश है, जिसके प्रधानमंत्री मोहनदास करमचंद गांधी के रास्ते पर चलने की नीयत रखने के बदले अमरीका के मनमोहन बने हुए हैं.

इस वर्ष गांधी के निधन दिवस पर उसी नई दिल्ली में एक कथित जनयुद्ध की शुरुआत की गई, जहां 5 बजकर 17 मिनट पर गांधी को गोडसे की गोलियों ने भून दिया था. गांधी की शहादत का दिन भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए बौद्धिकों, नागरिकों और स्वयंसेवी संस्थाओं की ओर से प्रतीक के तौर पर चुना गया. उसी नई दिल्ली में आज़ादी के कोई पांच वर्ष पहले से गांधी के योग्यतम शिष्यों नेहरू और पटेल वगैरह ने उनके कर्म को दाखिलदफ्तर कर दिया था.

देश का विभाजन गांधी के विरोध के बावज़ूद हुआ. गांधी के सपनों का भारत कांग्रेस के कर्णधारों ने अपने पैरों तले कुचला लेकिन तोतारटंत की तरह उनके नाम का जाप करना जारी रखा. गांधी का नाम फिर भी भारत के लोकजीवन की झाड़ियों में छिपा रहा. इस वर्ष देश के करीब साठ शहरों में उसकी याद में केंद्र सरकार की भ्रष्टाचार-कथा के विरुद्ध एक जनचुनौती जूलूस, रैली और आमसभा बनकर सड़कें नापती रही.

भगत सिंह के बारे में कुछ अनदेखे तथ्य

कनक तिवारी

मैं भगतसिंह के बारे में कुछ भी कहने के लिए अधिकृत व्यक्ति नहीं हूं. लेकिन एक साधारण आदमी होने के नाते मैं ही अधिकृत व्यक्ति हूं, क्योंकि भगतसिंह के बारे में अगर हम साधारण लोग गम्भीरतापूर्वक बात नहीं करेंगे तो और कौन करेगा. मैं किसी भावुकता या तार्किक जंजाल की वजह से भगतसिंह के व्यक्तित्व को समझने की कोशिश कभी नहीं करता. इतिहास और भूगोल, सामाजिक परिस्थितियों और तमाम बड़ी उन ताकतों की, जिनकी वजह से भगतसिंह का हम मूल्यांकन करते हैं, अनदेखी करके भगतसिंह को देखना मुनासिब नहीं होगा.

भगत सिंह

 
पहली बात यह कि कि दुनिया के इतिहास में 24 वर्ष की उम्र भी जिसको नसीब नहीं हो, भगतसिंह से बड़ा बुद्धिजीवी कोई हुआ है? भगतसिंह का यह चेहरा जिसमें उनके हाथ में एक किताब हो-चाहे कार्ल मार्क्स की दास कैपिटल, तुर्गनेव या गोर्की या चार्ल्स डिकेन्स का कोई उपन्यास, अप्टान सिन्क्लेयर या टैगोर की कोई किताब-ऐसा उनका चित्र नौजवान पीढ़ी के सामने प्रचारित करने का कोई भी कर्म हिन्दुस्तान में सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों सहित भगतसिंह के प्रशंसक-परिवार ने भी लेकिन नहीं किया. भगतसिंह की यही असली पहचान है.

भगतसिंह की उम्र का कोई पढ़ा लिखा व्यक्ति क्या भारतीय राजनीति का धूमकेतु बन पाया? महात्मा गांधी भी नहीं, विवेकानन्द भी नहीं. औरों की तो बात ही छोड़ दें. पूरी दुनिया में भगतसिंह से कम उम्र में किताबें पढ़कर अपने मौलिक विचारों का प्रवर्तन करने की कोशिश किसी ने नहीं की. लेकिन भगतसिंह का यही चेहरा सबसे अप्रचारित है. इस उज्जवल चेहरे की तरफ वे लोग भी ध्यान नहीं देते जो सरस्वती के गोत्र के हैं. वे तक भगतसिंह को सबसे बड़ा बुद्धिजीवी कहने में हिचकते हैं.

इंकलाब के ढहते अर्थ

कनक तिवारी

‘इंकलाब ज़िंदाबाद‘ बीसवीं सदी के भारत में शायद सबसे प्रखर लोकप्रिय नारा रहा है. कई नारे हैं जिन्होंने देश के जीवन को बेहद प्रभावित किया है. ‘भारत माता की जय‘, ‘दुनिया के मज़दूरों एक हो‘, ‘हर ज़ोर ज़ुल्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है‘, ‘गूंजे धरती और आकाश देश का नेता जयप्रकाश‘, ‘जयश्रीराम‘, हम सुधरेंगे, युग बदलेगा‘, ‘गरीबी हटाओ‘, ‘जय जवान जय किसान‘ ‘स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है‘, ‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा‘, वगैरह नारे आज भी देश की गूंज-अनुगूंज बने हुए हैं.

राष्ट्रद्रोह, राजद्रोह और जनविद्रोह

कनक तिवारी

[इस लेख का खास महत्व इस निगाह से है कि लेखक न सिर्फ़ कानून से जुड़े हैं, बल्कि विनायक सेन के वकील रह चुके हैं। जाहिर है, अन्य लेखों की ही तरह, इस लेख को यहाँ शामिल करने का अर्थ इसके पूरे कथ्य से संपूर्ण संपादकीय सहमति नहीं है। लेकिन शामिल किया है तो कुछ तो सहमति होगी ही।]

विनायक सेन के मामले में चुप रहना उचित नहीं होगा. मैं ज़मानत आवेदन के सिलसिले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में उनका वकील रह चुका हूं. इसलिए मुझे अच्छी तरह मालूम है कि उस स्थिति में विनायक सेन के विरुद्ध पुलिस की केस डायरी में ऐसा कुछ नहीं था कि प्रथम दृष्टि में मामला भी बनता. यह अलग बात है कि हाईकोर्ट ने उनकी ज़मानत मंजूर नहीं की जो बाद में लगभग उन्हीं तथ्यों पर बल्कि पुलिस द्वारा और कुछ साक्ष्य एकत्रित कर लिए जाने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट में मंजूर हो गई.

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)