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ऑड्री लॉर्ड

कला के लिए कला और प्रतिरोध

ऑड्री लॉर्ड

प्रतिरोध को मैं हमारी ज़िंदगियों की विभीषिकाओं, विसंगतियों को महसूस करने हेतु किसी को उत्साहित करने वाले जेनुइन साधन के तौर पर देखती हूँ. सामाजिक प्रतिरोध कहता है कि जिस तरह हम जी रहे हैं, हमेशा उस तरह जीना ज़रूरी नहीं है. अगर हम खुद शिद्दत से महसूस करते हैं, और शिद्दत से महसूस करने के लिए खुद को और औरों को उत्साहित करते हैं, तो बदलाव लाने के हमारे उत्तरों का बीज हमें मिल जाएगा. क्योंकि जब आप जान जाते हैं कि जिसे आप महसूस कर रहे हैं
वह क्या है, जब आप जान जाते हैं तो आप शिद्दत से महसूस कर सकते हैं, शिद्दत से प्यार कर सकते हैं, ख़ुशी महसूस कर सकते हैं, और फिर हम मांग करेंगे कि हमारी ज़िंदगियों के सभी हिस्से वैसी ख़ुशी पैदा करें. और अगर ऐसा नहीं होगा तो हम पूछेंगे,"ऐसा क्यों नहीं हो रहा है?" और यह पूछना ही अनिवार्यतः हमें बदलाव की तरफ ले जाएगा.
 
इसलिए सामाजिक प्रतिरोध और कला मेरे लिए अभिन्न हैं. मेरे लिए कला के लिए कला का वास्तव में कोई अस्तित्व नहीं है. 'ईदर' कला 'ऑर' प्रतिरोध जैसी कोई बात नहीं है. मैंने जिस बात को गलत पाया, मुझे उसके खिलाफ बोलना ही था. मैं कविता से प्यार करती थी, मैं शब्दों से प्यार करती थी. पर जो सुन्दर था उसे मेरी ज़िन्दगी को बदलने का मकसद पूरा करना था, वरना मैं मर जाती. इस पीड़ा को अगर मैं व्यक्त नहीं कर सकती और उसे बदल नहीं सकती, तो मैं ज़रूर उस पीड़ा से मर जाउंगी. और यही सामाजिक प्रतिरोध का आग़ाज़ है.
 
("ऑड्री लॉर्ड", ब्लैक वूमन राइटर्स एट वर्क . संपा: क्लॉडिया टेट.  न्यू योंर्क: कॉन्टिनम, 1983,पृ. 100-106.)

(जनपक्ष से साभार)

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)