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भारत में सामूहिक बलात्कार के आरोपियों के विरुद्ध हत्या का मामला दर्ज, प्रदर्शनकारियों का महिलाओं के लिए व्यापक अधिकारों पर ज़ोर

भारत में पांच पुरुषों के विरुद्ध एक चलती बस में एक 23 वर्षीय छात्रा के अपहरण, सामूहिक बलात्कार और हत्या के आरोप में औपचारिक रूप से मामला दर्ज किया गया है। 16 दिसंबर के बलात्कार के दौरान इस महिला  का शरीर इतनी बुरी तरह विकृत हो गया था कि उसे आंतों के प्रत्यारोपण की जरूरत थी, लेकिन अंततः गंभीर आंतरिक चोटों के कारण उसका जीवन नहीं बचाया जा सका। "मुझे लगता है कि यह एक लंबे समय से संचित गुस्से और आक्रोश का असर था," भारत में यौन हिंसा के खिलाफ विरोध प्रदर्शन की मुख्य आयोजकों में से एक, अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला संघ की कविता कृष्णन का कहना है। "इस मामलें में यह सब फट पड़ा, शायद इसलिए कि उसके साथ ऐसा इतनी मामूली दैनिक गतिविधि के दौरान हुआ: वह केवल अपने दोस्त के साथ एक फिल्म देखने के बाद घर जाने के लिए एक बस में चढ़ी थी। और मुझे लगता है कि इस बात ने हर एक के मानस को छू लिया क्योंकि हर कोई उसकी जगह अपने को रख कर देख सकता था। मुझे लगता है कि उन सबने इस अनाम व्यक्ति के साथ एक गहरा संबंध महसूस किया।" सामूहिक बलात्कार के इस मामले ने भारत में यौन हिंसा के अन्य मामलों पर प्रकाश डाला है, जहां हर 20 मिनट में एक महिला के साथ बलात्कार किया जाता है, राष्ट्रीय अपराध रजिस्ट्री के अनुसार। "मुझे लगता है हमें उऩ सब बदलावों पर भी नज़र डालनी पड़ेगी जो कि विभिन्न प्रकार की सामाजिक और सांस्कृतिक ताकतों के कारण हो रहे हैं - वैश्वीकरण, लोगों का एक जगह से दूसरी जगह जाना, दिखावटी उपभोग, उन सब चीज़ों का मीडिया में व्यापक प्रदर्शन जो इतनी आसानी से उपलब्ध हैं," एलोरा चौधरी, बोस्टन के मैसाचुसेट्स विश्वविद्यालय में महिलाओं के अध्ययन की एसोसिएट प्रोफेसर, का मानना है। "ये सब के सब, मुझे लगता है, और खास तौर पर इन सब विभिन्न प्रकार की ताकतों तथा लैंगिक गतिकी के परस्पर संघर्ष के चलते शहरी क्षेत्रों में हो रहे परिवर्तनों  से लैंगिक गतिकी में, स्त्री-पुरुष संबंधों में तरह-तरह के बदलाव आ रहे हैं।" [प्रतिलेख शामिल है]

अतिथि:

कविता कृष्णन, अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोसिएशन की सचिव और भारत में यौन हिंसा के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के मुख्य आयोजकों में से एक।

एलोरा चौधरी, बोस्टन में मैसाचुसेट्स विश्वविद्यालय में महिलाओं के अध्ययन की एसोसिएट प्रोफेसर।

प्रतिलेख

हुआन गोंज़ालेज़: आज हम अपना कार्यक्रम भारत में शुरू करते हैं, जहां छह लोगों के खिलाफ़ एक चलती बस में एक 23 वर्षीय छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार और  उसकी हत्या के आरोप में औपचारिक रूप से मामला दर्ज़ किया गया है। इस महिला, जिसकी पहचान केवल हिन्दी शब्द  "निर्भय" से की जा रही है, का 29 दिसंबर को उसे लगी चोटों  के कारण सिंगापुर के एक अस्पताल में निधन हो गया, जहां उसे विशेष उपचार के लिए भेजा गया था। पुलिस द्वारा हत्या के आरोप दर्ज करने की संभावना है और पाँच वयस्कों के लिए मौत की सजा की मांग भी की जा सकती है। मंगलवार को महिला की अस्थियों का गंगा नदी में विसर्जन कर दिया गया, और नव-वर्ष के कई समारोह रद्द कर दिए गए, जबकि  शोक मनाने वालों ने उसे शृद्धांजली अर्पित की। महिला का शरीर बलात्कार के दौरान इतनी बुरी तरह विकृत किया गया था कि उसे आंतों के प्रत्यारोपण की जरूरत थी, लेकिन अंततः गंभीर अंग विफलता के चलते उसकी जान नहीं बचाई जा सकी। उसकी स्मृति में लाखों लोगों ने एक कैंडललाइट विजिल में भाग लिया और अपराधियों को दंडित करने की मांग की।

अंजली: एक औरत होने के नाते, मुझे लगता है कि यह सिर्फ उन छह लोगों के बारे में नहीं है, जिन्हें, आप जानते हैं, गिरफ्तार कर लिया गया है। यह हर उस चीज़ के बारे में है जो औरतों के विरुद्ध होती है। यह बच्चों के साथ दुर्व्यवहार के बारे में है। यह घरेलू हिंसा के बारे में है। यह बलात्कार के बारे में है। यह छेड़छाड़, 'ईव टीज़िंग' के बारे में है। और एक बहुत ही सरल बात जो - एक बहुत साधारण बात जो हम कर सकते हैं, दोनों पुरुष और महिलाएँ, वो यह है कि हम अपनी आवाज़ उठाएँ।

हुआन गोंजालेज: इस बीच, दिल्ली में सामूहिक बलात्कार की शिकार के पिता ने अपनी बेटी के बारे  में बीबीसी के साथ एक साक्षात्कार में बातचीत की। यह उनके साक्षात्कार का एक अंश है।

सामूहिक बलात्कार की पीड़ित के पिता [अनुवाद] मेरी बेटी जो चाहती थी उसके लिए अड़ जाती थी। जब वह चौथी कक्षा में स्कूल जाती थी, वहाँ रास्ते में एक मिठाई की दुकान पड़ती थी। और अगर उसने मन बना लिया कि उसे मिठाई खानी है तो दुकानदार भी नरम पड़ जाता था।

उसकी उच्च शिक्षा के मामले में भी वही हुआ, और वह वही कर रही थी जो वह चाहती थी। मुझे याद है एक बार मैंने उससे पूछा था, "बेटा, आपके दोस्त कौन लोग हैं?" और उसने कहा, "पिताजी, केवल मेरी पुस्तकें मेरी दोस्त हैं।" वह हमेशा एक डॉक्टर बनना चाहती थी और इस बारे उसका इरादा पक्का था। हमारे एक ग्रामीण जगह से राजधानी दिल्ली आने का कारण अपने बच्चों के लिए एक बेहतर भविष्य की ज़रूरत थी।

जब मेरी बेटी एक बच्ची था, वह मुझे कसकर पकड़ लेट जाती थी और वैसे ही घंटों के लिए सो जाती थी। इस घटना के बाद पहले दो दिनों तक वह बेहोश थी। लेकिन जब वह उसे होश आ गया, वह डॉक्टर से कुछ खाने को मांगा. क्योंकि उसे खाना देने की अनुमति नहीं थी, उसने विशेष रूप से टॉफ़ी के लिए कहा। डॉक्टर ने पूछा, "आप एक लॉलीपॉप खाना चाहेंगी?" उसने कहा, "हाँ।" वह अस्पताल में अपनी माँ से बात करती रही, जाहिर है, थोड़ा-थोड़ा करके। और एक दिन उसने अपनी माँ को पकड़ कर धीरे से कहा, "माँ, मुझे माफ़ कर दो, मुझे माफ़ कर दो।"

हुआन गोंजालेज: सामूहिक बलात्कार के मामले ने भारत में, जहां राष्ट्रीय अपराध रजिस्ट्री के अनुसार हर 20 मिनट में एक महिला बलात्कार किया जाता है, यौन हिंसा के अन्य मामलों पर प्रकाश डाला है। रजिस्ट्री में यह भी पाया गया कि देश में बलात्कार के 24,206 मामले 2011 में दर्ज किए गए, लेकिन अपराधियों में से तीन चौथाई अभी भी खुले घूम रहे हैं।

भारत में बलात्कार के मामलों में सज़ा की दर जो 1971 में 46 प्रतिशत थी, 2012 में घट कर 26 प्रतिशत हो गई है।

एमी गुडमैन: इस बीच, भारत में बलात्कार विरोधी प्रदर्शनकारी रिकार्ड तोड़ ठंड के बावजूद ऐसे कानूनी सुधारों के लिए अपनी मांग जारी रखे हुए हैं जिनके द्वारा  बलात्कार के लिए सज़ा को बढ़ाया जाए और वर्षों से अटके हुए कानूनी मामलों को निपटाया जा सके। प्रदर्शनकारी न केवल यौन हिंसा पीड़ितों के प्रति अधिक संवेदनशीलता की मांग कर रहे हैं, बल्कि  भारतीय कानून के तहत बलात्कार की परिभाषा के ही विस्तार की मांग कर रहे हैं ताकि इसमें शारीरिक अपमान से लेकर छेदक (पेनिट्रेटिव) हमले तक ऐसे सभी अपराधों को शामिल किया जाए। वह इसमें वैवाहिक बलात्कार, जो भारत में वर्तमान में अपराध के तौर पर मान्य नहीं है, को शामिल करने तथा यौन उत्पीड़न के पीड़ितों के लिए चिकित्सा परीक्षा के दौरान अधिक संवेदनशील फ़ॉरेंसिक प्रक्रियाओं की मांग कर रहे हैं।

तो, और अधिक चर्चा के लिए, हमारे साथ अभी कई अतिथि हैं। भारत से, डेमोक्रेसी नाओ! (Democracy Now!) वीडियोस्ट्रीम के ज़रिए, हम सीधे कविता कृष्णन के पास जाते हैं, जो अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला संघ की सचिव हैं तथा विरोध प्रदर्शनों की एक प्रमुख आयोजक।

पिछले हफ्ते, कृष्णन  ने दिल्ली मुख्यमंत्री निवास के बाहर प्रदर्शनकारियों का नेतृत्व किया, जहाँ पुलिस ने वाटर कैनन का उपयोग किया।

डेमोक्रेसी नाओ! (Democracy Now!) में आपका स्वागत है! आप हमें बता सकती हैं कि क्या हुआ, क्यों एक चलती बस पर इस विशेष रुप से भयंकर बलात्कार ने भारत में इतना विकट विरोध छेड़ दिया है?

कविता कृष्णन: यह एकदम ठीक से समझना मुश्किल है कि क्यों इस विशेष मामले ने ऐसा रूप ले लिया है, क्योंकि यहाँ बहुत सारी अन्य घटनाएं हुई हैं। बेशक, इस घटना में विशेष रूप से ग्राफिक हिंसा थी, लेकिन यहाँ अन्य भयानक घटनाएँ भी हुई हैं, जिनमें से कुछ तो दिल्ली में ही हुई थीं। लेकिन मुझे लगता है कि यह एक लंबे समय से संचित प्रभाव था और यौन हिंसा के बहुत से अपराधियों के खुले घूमने के विरुद्ध क्रोध और आक्रोश की एक संचित भावना तथा उससे जनित  असुरक्षा जिसका महिलाओं को सामना करना पड़ता है।

और यह सब इस बार फट पड़ा, शायद इसलिए क्योंकि यह घटना इस युवा औरत के साथ इतनी सामान्य और दैनिक गतिविधि के दौरान हुई: वह अपने दोस्त के साथ एक फिल्म देखने के बाद घर जाने के लिए एक बस में चढ़ी थी। और मुझे लगता है कि किसी तरह इस घटना ने सबके मन को छू लिया क्योंकि हर कोई उसकी जगह अपने को रख के देख सकता है। दिल्ली में एक बड़ी संख्या में युवा लोग आते हैं - अध्ययन के लिए, विभिन्न पाठ्यक्रमों के लिए, या कई तरह के कैज़ुअलाइज़्ड, कान्ट्रैंक्ट वाली नौकरियों के लिए, असुरक्षित नौकरियों के लिए आते हैं। और मुझे लगता है कि वे सब - उन सभी ने इस अनाम व्यक्ति के साथ एक गहरा संबंध महसूस किया।

आपने उसके नाम का उल्लेख किया है - मेरा मतलब है, वह नाम जो उसे दिया गया है, लेकिन मुझे लगता है कि वह सिर्फ एक नाम है, एक टैग है जिसे कुछ समाचार पत्रों ने इस्तेमाल किया है। लेकिन बहुत से लोगों के लिए, वह गुमनाम थी, और उन्होंने उसके नाम को जाने बिना, उसका नाम पता करने की कोशिश के बिना या उसे कुछ अन्य नाम देकर एक व्यक्ति विशेष के रूप में न देखना बेहतर समझा है, क्योंकि मुझे लगता है कि वह, एक अर्थ में, हर महिला है, और ऐसा उनमें से किसी के भी साथ हो सकता है।

हुआन गोंज़ालेज़: क्या आप देश के प्रमुख नेताओं की प्रतिक्रियाओं के बारे में भी बता सकती हैं और उनकी भूमिका क्या रही विरोध प्रदर्शन के जारी रहने पर?

कविता कृष्णन: हाँ। मुझे लगता है कि में भारत में सरकारें - राज्यों में तथा केंद्र में भी, केंद्रीय सरकार  - और पुलिस तथा पूरी कानून व्यवस्था महिलाओं के खिलाफ हिंसा के पूरे मुद्दे पर  भारी उदासीनता और  बेपरवाही से व्यवहार करने के आदी हैं। और विशेष रूप से यौन हिंसा के प्रति हमेशा - लगभग हर मामले में - समवेत स्वर से पीड़ित को दोष देने का रवैया इख्तियार किया जाता है, सिर्फ़ अभी नहीं, और सिर्फ़ सामाजिक आवाज़ें नहीं, बल्कि सत्ता में बैठे लोगों की तरफ़ से भी - आपको पता है - पुलिस की तो यह एक आम प्रतिक्रिया है, और वहाँ हर तरफ़ के राजनेता हैं जिन्होंने बलात्कार संस्कृति की टिप्पणियाँ की हैं।

और मुझे लगता है कि इस मामले में भी, उदासीनता और बेपरवाही तथा जिम्मेदारी लेने और जो कुछ हुआ इस युवा औरत के साथ उसके लिए जवाबदेही से इन्कार सामने आया है, क्योंकि यह गहराई से महसूस किया गया कि यह एक निजी बस थी, जिसने कई नियमों और विनियमों का उल्लंघन किया था, और इसके बावजूद उसे दिल्ली की सड़कों पर खुला छोड़ दिया गया, यात्रियों को बुला कर उन्हें लूटने या महिलाओं के खिलाफ हिंसा में लिप्त होने के लिए। और पुलिस को इसके अस्तित्व का पता था। उन्होंने एक डायरी भी बना के रखी थी। पुलिस - दिल्ली में यातायात अधिकारियों ने एक डायरी बना के रखी थी, और इस बस को इस डायरी के जरिए ढूंढा गया, जिसमें निजी बस मालिकों से ली गई रिश्वत वगैरह का रिकॉर्ड रखा जाता था। और इस तरह से इस बस का पता लगाया गया। इससे पता चलता है कि उन्हें मालूम था कि यह बस चल रही थी। उन्हें पता था कि इस बस को इस तरह सड़कों पर चलने की अनुमति नहीं थी। वे जानते थे कि इस बस ने उल्लंघन किया था - यह बस नियम-कानून से बाहर चली गई थी। और फिर भी, वे रिश्वत ले रहे थे और इसे कारोबार करने दे रहे थे। इसलिए मुझे लगता है यह सब मिल कर सामने आ गया।

तब से, आप जानती हैं, कैसे  आग में ईंधन जोड़ा गया है, उदाहरण के लिए, सत्तारूढ़ पार्टी के संसद सदस्य, भारत के राष्ट्रपति के बेटे। उन्होंने प्रदर्शनकारियों के बारे में एक टिप्पणी की। उन्होंने कहा, "ओह, यह सजी-धजी औरतें हैं, और यह असल में छात्राएँ नहीं हैं। मुझे पता है कि छात्राएँ कैसी होती हैं। ये वो लोग हैं जिन्हें डिस्कोथेक जाना है। ये खूबसूरत, सुंदर, सुंदर, सुंदर महिलाएँ हैं। और हम उन्हें गंभीरता से नहीं लेना चाहिए, क्योंकि उनका विरोध सिर्फ उनके फैशन का एक हिस्सा है।" और इसी प्रकार, एक और नेता थे -

एमी गुडमैन: कविता, हम असल में -

कविता कृष्णन: आंध्र प्रदेश राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी के एक नेता -

एमी गुडमैन: हमारे पास असल में एक गुप्त -

कविता कृष्णन: - जिन्होंने कहा कि - हाँ।

एमी गुडमैन: हमारे पास वास्तव में एक पुलिसकर्मी की बातचीत की एक गुप्त रिकॉर्डिंग है। मैं तहलका के द्वारा एक पर्दफ़ाश की तरफ़ जाना चाहूंगी, तहलका नई दिल्ली आधारित एक ऑनलाइन साप्ताहिक समाचार पत्रिका है। अप्रैल में पत्रिका के संवाददाताओं ने गुप्त रूप से दिल्ली पुलिस के 30 ऐसे अधिकारियों के साथ बातचीत रिकॉर्ड की जिन्होंने  बलात्कार होने के लिए महिलाओं को दोषी ठहराया। पुलिस ने बलात्कार के लिए औचित्य के रूप में फैशनेबल कपड़े पहनने से लेकर प्रेमी होने, बार में जाने, शराब पीने, पुरुषों के साथ काम करने आदि सब बातों को बलात्कार किए जाने का उचित कारण बताया। यहां देखते हैं कि एक पुलिस अधिकारी गुप्त रूप से की गई रिकॉर्डिंग में एक बलात्कार की शिकार के बारे में क्या कह रहा था।

उप-निरीक्षक रूप लाल [अनुवाद]: अगर एक लड़की जन्मदिन की पार्टी की मांग करती है और दो या तीन लड़कों के साथ अकेली है और देखती है कि वे पी रहे हैं, तो वह जानती है कि क्या होने की संभावना है। जब वह खुद एक ऐसी पार्टी में जाती है, तो वह बलात्कार की शिकायत नहीं कर सकती। आप उसे बलात्कार कैसे कह सकते हैं जब वह उन लोगों के साथ बैठ कर पी रही है?

एमी गुडमैन: यह एक पुलिस अधिकारी की एक गुप्त रिकॉर्डिंग थी। कविता कृष्णन, अगर आप आगे इस बारे में बात कर सकें, ऐसे दृष्टिकोण, और आप किस तरह के अधिनियम बनाए जाने की कोशिश कर रही हैं।

कविता कृष्णन: हाँ, मुझे लगता है कि आप बहुत सही कह रही हैं। यह एक सनसनीखेज खुलासा था। और यह और भी अधिक गौर करने लायक बात है कि  दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के 17 पुलिस कर्मियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई जिन्होंने इस तरह की टिप्पणियाँ की थीं, क्योंकि यह सब सामान्य माना जाता है। ऐसे शीर्ष पुलिस अधिकारी हैं, वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, बहुत प्रसिद्ध पुलिस अधिकारी, जो बिल्कुल यही बातें कह रहे थे, यानी यौन हिंसा और बलात्कार दिल्ली में इसलिए बढ़ रहे हैं क्योंकि महिलाएँ फैशनेबल कपड़े पहन रही हैं।

तो, मुझे लगता है कि हम जो मांग कर रहे हैं वह यह है कि - समाज में गहरे बसे लैंगिक पूर्वाग्रह को पहचाना जाए - जो पुलिस बल में मौजूद है, कानूनों में है, पूरी न्यायिक प्रक्रिया में है, न्यायपालिका में है, और जाहिर है कि समाज में भी है। और इसे सुधारने के लिए हम व्यापक  कार्रवाहियाँ चाहते हैं, क्योंकि इन पूर्वाग्रहों को अब भी सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं किया जा रहा है। तो पहली मांग तो  हम यह कर रहे हैं कि देश में बलात्कार या यौन हिंसा के 100,000 से अधिक लंबित जो मामले हैं, उनमें से कई एक दशक से अधिक से लंबित हैं, उन्हें निपटाया जाए। इसलिए हम चाहते हैं कि इन मामलों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, कि उन्हें अदालत में लाया जाना चाहिए और तेजी से उनकी सुनवाई होनी चाहिए, और इस तरह का कुछ निवारण होना चाहिए।

और पुलिस व्यवस्था में, हम चाहते हैं कि वहाँ एक मानक संचालन प्रक्रिया हो, एक प्रोटोकॉल, जिसके तहत महिलाओं के विरुद्ध अपराधों का निपटारा किया जाए, सिर्फ यौन हिंसा नहीं बल्कि तथाकथित "गौरव अपराधों" ("ऑनर क्राइम्स") या घरेलू हिंसा या महिलाओं के खिलाफ हिंसा के अन्य रूपों का भी, और एक प्रोटोकॉल होना चाहिए जो सार्वजनिक रूप से सभी पुलिस थानों में प्रदर्शित किया जाए। और कुछ निवारण होना चाहिए, ऐसी प्रक्रिया जिसके द्वारा एक औरत जो एक पुलिस स्टेशन जाती है और पाती है कि पुलिस अधिकारी उसकी शिकायत दर्ज नहीं कर रहा है या उसे सही से जवाब नहीं दे रहा है, उसके पास शिकायत करने के लिए के लिए एक तरीका हो और यह सुनिश्चित किया जाए कि वह ऐसा करने पर अपनी पोस्ट में नहीं बना रह सके, क्योंकि उसके विचार, हो सकता है निजी रूप से वह सभी महिलाओं के बारे में सामंती और पितृसत्तात्मक विचार रखता हो, लेकिन अगर वह एक सार्वजनिक अधिकारी है, तो वह आचरण के एक सार्वजनिक कोड के प्रति जवाबदेह हो जाता है, एक स्वीकृत आचार संहिता के प्रति, आचरण के एक लोकतांत्रिक कोड के प्रति। यह एक बात है।

एमी गुडमैन: हम कविता कृष्णन के साथ बात कर रहे हैं, अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला संघ की सचिव, और एक चलती बस पर एक युवा महिला छात्रा के बलात्कार तथा अब उसकी मौत के बाद बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन के प्रमुख आयोजकों में से एक। जब हम ब्रेक के बाद वापस आते हैं, तो हम कविता के अलावा एलोरा चौधरी से भी बात करेंगे जो बोस्टन में मैसाचुसेट्स विश्वविद्यालय में महिलाओं के अध्ययन की एक प्रोफेसर हैं। उसके बाद, न्यूयॉर्क टाइम्स ने एक बांग्लादेशी कारखाने में कम से कम 111 लोगों की आग से मौत तथा उस फ़ैक्टरी के वॉल-मार्ट से संबंधों के बारे में एक खुलासा किया है। यह डेमोक्रेसी नाओ! (Democracy Now!) है! हम एक मिनट में वापस आते हैं।

[ब्रेक]

एमी गुडमैन: हमारे मेहमानों में हैं कविता कृष्णन, अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोसिएशन की सचिव, जो दिल्ली में एक चलती बस पर एक युवा छात्रा के साथ बलात्कार और फिर उसकी मौत के बाद विरोध प्रदर्शन के आयोजकों का नेतृत्व कर रही हैं। हमारे साथ एलोरा चौधरी भी हैं, जो बोस्टन में मैसाचुसेट्स विश्वविद्यालय में महिलाओं के अध्ययन की एसोसिएट प्रोफेसर हैं। हुआन?

हुआन गोंज़ालेज़: मैं बातचीत में एलोरा चौधरी को लाना चाहूंगा। आपकी प्रतिक्रिया, न केवल भारत में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन पर, बल्कि इस पर भी कि जिस तरह से पश्चिमी देशों की मीडिया में घटनाओं को कवर किया गया है और जिस तरह कुछ हद तक पाखंड के साथ इस भयानक घटना की बारीकियों के प्रति वहाँ की मीडिया का आकर्षण सामने आया है?

एलोरा चौधरी: हाँ, मैंने दक्षिण एशिया तथा अमेरिका और ब्रिटेन, तथाकथित पश्चिमी दुनिया, दोनों की मीडिया रिपोर्टों को देखा है - इस घटना की कवरेज के संदर्भ में। और मुझे लगता है कि मेरा यहाँ सुझाव यह होना चाहिए कि हम इन घटनाओं की दोतरफ़ा आलोचना करें। एक तरफ़ तो, हम देखते हैं कि पश्चिमी मीडिया में कुछ पत्रकारों ने एक प्रकार की नैतिक ऊँचाई पर खड़े होकर भारतीय संस्कृति की ओर उंगलियों उठाना और उसके राक्षसीकरण का रवैया अपनाया है, मानो महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा दुनिया के केवल कुछ भागों में में ही व्याप्त हो और यह किसी तरह दुनिया के इस भाग में गहरे बसी निहित सांस्कृतिक परंपराओं का प्रतिरूपण करती हो। बेशक, ऐसे रवैये से जो बात छुप जाती है वो यह है कि बलात्कार और घरेलू हिंसा दोनों ही संयुक्त राज्य अमेरिका में बड़े स्तर पर व्याप्त हैं, और घरेलू हिंसा तो महिलाओं को चोट पहुँचने के प्रमुख कारणों में से एक रहा है, और बलात्कारों की संख्या भी बहुत ही अधिक है, जो कि, वास्तव में, संयुक्त राज्य अमेरिका में ज़्यादातर दर्ज ही नहीं किए जाते। तो, मुझे लगता है कि इस प्रकार की रिपोर्टिंग के में रची-बसी निश्चित तौर पर एक तरह की औपनिवेशिक मानसिकता है, ज़ाहिर है, और यह कि उसका एक लंबा इतिहास है। और इस तरह की मानसिकता कि महिलाएँ एक समाज की प्रगति का मानक हैं, औपनिवेशिक प्रथाओं से उपजी है, कि इस तरह के विचारों का उपयोग उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद  दोनों को ही वैध ठहराने किया जाता रहा है। तो ऐसी रिपोर्टों को पढ़ते समय हमें इन बातों को ध्यान में रखना होगा।

लेकिन इसके साथ ही, मुझे लगता है कि जो बड़े पैमाने पर विरोध भारत में इस विशेष मामले को लेकर हुए हैं वे बहुत महत्वपूर्ण हैं, और हम उम्मीद कर सकते हैं कि इनसे महिलाओं की स्थिति में भी महत्वपूर्ण बदलाव का रास्ता खुलेगा, फिर भी, हमें - मुझे लगता है कि हमें इस मामले की बारीकियों के बारे में भी सोचना होगा और किस तरह इस तरह की गहरे बसी - इस मामले में जो रिपोर्टिंग हुई है, गरीबों के बारे में एक खास तरह की वर्ग-आधारित मान्यताओं के साथ। तो, एक बात जिस पर मेरा खास ध्यान गया है वो यह है कि कैसे बहुत सी रिपोर्टें कई कच्ची बस्ती कॉलोनियों, जहाँ शायद इस मामले के चार अपराधी रहते थे, का वर्णन इस तरह कर रहे हैं  मानो ये बस्तियाँ केवल अपराधी पैदा करने वाले इलाके हैं। इसके अलावा, गरीब पुरुषों को अनपढ़ और हिंसक बताना एक तरह से इन हिंसक हमलों का सामान्यीकरण कर देता है उन्हें गरीबी से जोड़ देता है, और नतीज़ा यह होता है कि इससे गरीबों की अपराधीकरण हो जाता है, जबकि बलात्कार और यौन हिंसा, सब जानते हैं, पूरे समाज में व्याप्त है, व्यवस्थाजनित है, और एक दिनचर्या की बात है। और हमें इस सच्चाई के बारे में भी सोचना होगा कैसे मध्यम वर्ग में, कुछ कुलीन समुदायों में, बलात्कार और महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के मामलों की रिपोर्टों को प्रकाश में नहीं लाया जाता, उन्हें उजागर नहीं किया जाता और उनके प्रति इस तरह का भीषण नैतिक आक्रोश देखने में नहीं आता। तो मुझे लगता है कि इन रिपोर्टों में वर्ग-आधारित मान्यताओं पर भी खास तौर से ध्यान देने की ज़रूरत है।

Friend recounts Delhi gang-rape trauma
 

एमी गुडमैन: मेरा मतलब है, संयुक्त राज्य अमेरिका में आंकड़ों को देखा जाए तो, मुझे लगता है कि हालत यह कि, एक संगठन के अनुसार, हर दो मिनट में एक महिला का यौन शोषण किया जाता है। एक और आंकड़ा है कि संयुक्त राज्य अमेरिका में, यानी यहाँ, चार में से एक कॉलेज के छात्राओं, कॉलेज में पढ़ रही महिलाओं, के साथ या तो बलात्कार किया गया या बलात्कार का प्रयास, यौन शोषण किया गया।

और फिर मैं व्यापक मुद्दे पर जाना चाहूंगी: जहाँ एक तरफ़ प्रदर्शनकारी भारत में सड़कों पर उतरे हैं, यहाँ महिला अधिकार कार्यकर्ता इस बात की शिकायत कर रहे हैं कि हाल ही में सदन के रिपब्लिकन नेताओं ने महिलाओं के खिलाफ हिंसा के लिए 2012 अधिनियम की पुनर्पुष्टि में अड़चन डाल दी है, यह एक अधिनियम है जिसके तहत तीन करोड़ एल जी बी टी व्यक्तियों, आप्रवासियों, तथा मूल अमेरिकी महिलाओं को सुरक्षा मिल सकती है। संघीय स्तर पर लिंग समानता बिल की पुनर्पुष्टि में देरी को देखते हुए, कुछ कार्यकर्ता अमेरिका पर ज़ोर डाल रहे हैं कि वह आखिरकार महिलाओं के अधिकारों के लिए संयुक्त राष्ट्र के विधेयक की पुष्टि कर दे। केवल आठ देशों ने इस समझौते की पुष्टि नहीं की है, नतीज़तन अमेरिका ईरान, सोमालिया और सूडान की श्रेणी में खड़ा है। और भारत में यौन हिंसा के खिलाफ जनता के विरोध के परिणामस्वरूप कुछ लोग संयुक्त राज्य अमेरिका के खुद के ट्रैक रिकॉर्ड पर भी सवाल उठा रहे हैं, जहां कथित तौर पर बलात्कार के मामलों में से केवल 24 प्रतिशत में गिरफ्तारी होती है, अपराध सिद्धि की तो बात ही छोड़ दें।

मैं जानना चाहती हूँ कविता कृष्णन, जो दिल्ली में महिलाओं के अधिकारों की एक अग्रणी कार्यकर्ता हैं तथा जो विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व कर रही हैं, इस विशेष तौर पर क्रूर बलात्कार और मौत के बाद के हालात में इस मुद्दे पर आपके विचार?

कविता कृष्णन: मैं पूरी तरह सहमत हूँ - मैं बस संक्षेप में कहना चाहूंगी कि मैं एलोरा ने जो कहा उससे सहमत हूँ। और वह व्यक्ति जो प्रवासी श्रमिकों का राक्षसीकरण करने की कोशिशों का नेतृत्व कर रहा है और कोई नहीं भारत का प्रधानमंत्री है, जो उन्हें एक "खतरा" बता रहा है और जो उन्हें "फ़ुटलूज़" प्रवासी कह रहा है और कह रहा है कि यौन हिंसा का मुख्य खतरा वही हैं, जो कि पूरी तरह से गलत है, जैसा एलोरा ने कहा। ऐसा है, आप जानती हैं, पूरे देश में, हिरासत में बलात्कार के मामलों की एक बड़ी संख्या है। इस घटना से पहले कुछ सबसे महत्वपूर्ण मामलों, जिन्होंने भारत में महिलाओं के आंदोलन को ज़ोर दिया उनमें से दो हैं, एक तो लगभग 35 वर्ष पूर्व मथुरा नामक एक महिला के साथ हिरासत में बलात्कार, तथा 2004 में पूर्वात्तर भारत में एक आदिवासी महिला, जिस पर उग्रवादी होने का शक था, के साथ सेना द्वारा गिरफ़्तारी के बाद हिरासत में बलात्कार और उसकी हत्या। इसलिए, यह महत्वपूर्ण है कि पूरी घटना को उसके होने की परिस्थितियों के साथ जोड़ कर देखा जाए, कि पूर्वापर संबंधों को ध्यान में रखा जाए।

लेकिन जो आपने अमेरिका के बारे में कहा, मुझे लगता है कि बहुत सच है। लेकिन देखिए, हमें यह ध्यान में रखना होगा कि इस तरह पीड़ित को दोष देना जैसा मैंने बताया, जाहिर है केवल भारत में नहीं हो रहा है। ऐसे पूर्वाग्रह केवल भारत में ही नहीं हैं। दुनिया भर में स्लट वॉक विरोध प्रदर्शन हुए थे, तो जाहिर है यह एक विश्व-व्यापी समस्या है।

लेकिन मैं संक्षेप में आपको बताना चाहूंगी कि हम कानूनों में बदलाव की भी मांग कर रहे हैं, क्योंकि भारत में कानून - जिनमें से कई औपनिवेशिक विरासत हैं, और हम ऐसी खोजी प्रथाओं और कानूनों को जारी रखे हुए हैं जो औपनिवेशिक विरासत हैं और जो महिलाओं के हित के एकदम विरुद्ध हैं। उदाहरण के लिए, एक औरत जो बलात्कार के अनुभव से गुज़री है, जो एक बलात्कार उत्तरजीवी है, उसे एक ऐसे चिकित्सा परीक्षण से गुज़रना पड़ता है जिसे "दो उंगली परीक्षण" ("टू फ़िंगर टेस्ट") कहा जाता है जिसमें डॉक्टर उसके शरीर में दो उंगलियों डालता है यह पता लगाने के लिए कि सेक्स की आदी है या नहीं। इस प्रथा के खिलाफ भारत में अदालतों में फैसले दिए गए हैं, लेकिन यह अब भी जारी है, और सरकार को अभी तक इसे रोकने की ज़िम्मेदारी निभानी है। फिर यहाँ कानून हैं जो यौन हमले के लिए "शीलभंग" ("आउटरेजिंग ऑफ़ मॉडेस्टी") और यौन उत्पीड़न के लिए "छेड़छाड़" ("ईव टीज़िंग") जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। तो इस तरह के शब्द प्रयोग हैं और ऐसे कानून हैं जो यौन हिंसा के अनुभव को तुच्छ बना देते हैं और ऐसे कानून हैं जिनमें यौन हिंसा की एक बहुत ही संकीर्ण परिभाषा है जो कि विभिन्न प्रकार की यौन हिंसा की एक पूरी श्रृंखला को कवर नहीं कर रहे हैं, जैसे पीछा करना, तेज़ाब फेंक कर चेहरा बिगाड़ना, जबरदस्ती नग्न करना, अपमानित करना, और इसी तरह की चीज़ें। इसलिए हम कानून में ऐसे बदलाव की मांग कर रहे हैं जो वास्तव में भारतीय महिलाओं के यौन हिंसा के अनुभव को ध्यान में रखे।

हुआन गोंज़ालेज़: मैं एलोरा चौधरी से बड़े मुद्दे के बारे में भी, जाहिर है, पूछना चाहूंगा, कि जिस रूप से भारत में हाल के दशकों में औद्योगिकीकरण फ़ैला है, और लाखों लोग के ग्रामीण इलाकों से शहरों में आ रहे हैं, और महिलाएँ भी, जाहिर है, बड़ी संख्या में औद्योगिक श्रमशक्ति और शहर के कार्मिकों में शामिल हो रही हैं। व्यापक सामाजिक दबाव और पुरुष प्रभुत्व पर तथा महिलाओं के उत्पीड़न पर उनका असर, और कि यह आंदोलन वास्तव में जो कुछ हो रहा है उसका एक अंशमात्र ही है?

एलोरा चौधरी: हाँ, बिल्कुल। मेरे ख्याल से - मैं यहाँ पूरी तरह से कविता के साथ सहमत हूँ, कि मेरा ध्यान इस बात पर खास तौर से गया था कि रिपोर्टों के अनुसार बलात्कार के इस मामले में आरोपित छह पुरुषों में से लगभग सभी दिल्ली में आर्थिक प्रवासी हैं। और यह निश्चित रूप से एक बड़ी प्रवृत्ति को प्रतिबिंबित करता है। रिपोर्टों से यह भी पता चलता है कि अगर आप उन सारी संख्याओं को जोड़ दें - पिछले वर्ष में भारत के प्रमुख शहरों में दर्ज की गई बलात्कार की घटनाओं की संख्या, तो दिल्ली की संख्या अन्य सभी शहरों में मिलाकर बलात्कार की कुल संख्या से अधिक है। दिल्ली को इस क्षेत्र की बलात्कार राजधानी कहा जा रहा है।

मुझे लगता है हमें उन सब बदलावों पर भी नज़र डालनी पड़ेगी जो कि विभिन्न प्रकार की सामाजिक और सांस्कृतिक ताकतों के कारण हो रहा है - वैश्वीकरण, लोगों का एक जगह से दूसरी जगह जाना, दिखावटी उपभोग, उन सब चीज़ों का मीडिया में व्यापक प्रदर्शन जो इतनी आसानी से उपलब्ध हैं। इन सब के सब, मेरे ख्याल से, और खास तौर से इन विभिन्न ताकतों तथा लैंगिक गतिकी के परस्पर संघर्षों के कारण शहरी क्षेत्रों में हो रहे बदलावों के चलते स्त्री-पुरुष संबंधों में तरह-तरह के बदलाव आ रहे हैं। हमें इस मामले की विशेषताओं के बारे में भी सोचना है, जैसा मैंने पढ़ा है, कि इस मामले में इस युवा महिला को एक पुरुष साथी के साथ बाहर जाने के लिए सज़ा दी जा रही थी और इस बात के लिए कि वह इतनी देर रात तक घर से बाहर थी - और यह कि उसने बस पर पुरुष प्रभुत्व की अवहेलना करने की हिम्मत की, कि इन सब बातों ने इस भयावह घटना के होने में योगदान दिया। और हमें वास्तव में महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा को न केवल महिला बनाम पुरुष के मुद्दे के रूप में  देखने की ज़रूरत है, बल्कि उन अन्य बदलावों की तरफ़ भी जो  हमारे समाज में हो रहे हैं और वे किस तरह पुरुष वर्चस्व को चुनौती देने में एक भूमिका अदा कर रहे हैं -

एमी गुडमैन: अंत में - अंत में कविता -

एलोरा चौधरी: महिलाओं पर अधिकार की भावना।

एमी गुडमैन: कविता कृष्णन, हमारे पास सिर्फ 30 सेकंड हैं। इस बलात्कार और मौत के बाद शुरू हुए व्यापक आंदोलन के लिए आपकी आगे क्या योजनाएँ हैं? आज, पाँच पुरुषों को एक भारतीय अदालत में औपचारिक रूप से एक महिला के सामूहिक बलात्कार और हत्या के लिए आरोपित किया गया है। उस महिला की अभी तक सार्वजनिक रूप से पहचान नहीं बताई गई है।

कविता कृष्णन: बात यह है कि अब हम संघर्ष कर रहे हैं महिलाओं के अधिकारों और स्वतंत्रता के लिए महिलाओं की आकांक्षाओं को केंद्र में लाने के लिए, क्योंकि सरकार की ओर से ऐसा प्रयास किया जा रहा है कि पूरी बहस को सज़ा के कुछ रूपों पर या फिर बलात्कार के शिकार के नाम पर महज एक कानून बना देने की ओर मोड़ दिया जाए। तो हम महिलाओं के अधिकार के मुद्दे तथा स्वतंत्रता के लिए उनकी  आकांक्षाओं को केंद्र में रखने की कोशिश कर रहे हैं। इस आंदोलन में महिलाएँ - मैं सिर्फ कि संक्षेप में उल्लेख करना चाहूंगी - कि वे नारे लगा रही हैं, कह रही हैं, "मेरी आवाज़ मेरी स्कर्ट से ऊँची है," और "मुझे यह मत बताओ कि मुझे क्या पहनना चाहिए।" और हमें लगता है कि यह ऐसा कुछ है जो कि एक महत्वपूर्ण दावा है, और यह ऐसा कुछ है - यह इस संघर्ष से निकला बहुत ही महत्वपूर्ण सारांश है, और हम इसे केंद्र में रखकर आने वाले दिनों में आगे काम करेंगे।

 


लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)