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आनंद प्रधान

Anand Pradhan

मीडिया के चतुर सुजान – सावधान!

आनंद प्रधान

(तहलका से साभार)

मीडिया पर वैकल्पिक मीडिया की निगेहबानी एक शुभ संकेत है

पिछला साल मुख्यधारा के कॉरपोरेट मीडिया के लिए अच्छा नहीं रहा. खबरों की खरीद-फरोख्त (पेड न्यूज) के गंभीर आरोपों से घिरे कॉरपोरेट मीडिया की साख को नीरा राडिया प्रकरण से गहरा धक्का लगा. उसकी विश्वसनीयता पर सवाल दर सवाल उठ रहे हैं, लेकिन अफसोस की बात यह है कि उन सवालों के जवाब नहीं मिल रहे हैं. नतीजा, कॉरपोरेट मीडिया के कारनामों के कारण लोगों का उसमें भरोसा कम हुआ/हो रहा है.

इसका एक नतीजा यह भी हुआ है कि लोग समाचार मीडिया को लेकर जागरूक हो रहे हैं. पाठक, श्रोता और दर्शक अब आंख मूंदकर उस पर भरोसा नहीं कर रहे हैं. वे खुद भी खबरों की पड़ताल करने लगे हैं. इसमें न्यू मीडिया उनकी मदद कर रहा है. न्यू मीडिया और खासकर सोशल मीडिया जैसे फेसबुक, ट्विटर, यू-ट्यूब, ब्लॉग आदि के कारण न सिर्फ उनकी सक्रियता बढ़ी है बल्कि उनका आपस में संवाद भी बढ़ा है. पाठकों-दर्शकों का एक छोटा-सा ही सही लेकिन सक्रिय वर्ग कॉरपोरेट समाचार मीडिया पर कड़ी निगाह रख रहा है और उसकी गलतियों और भटकावों को पकड़ने और हजारों-लाखों लोगों तक पहुंचाने में देर नहीं कर रहा है.

एक ताजा उदाहरण देखिए. वैसे तो अंग्रेजी समाचार चैनल सीएनएन-आईबीएन और इसके संपादक राजदीप सरदेसाई की साख और प्रतिष्ठा बहुत अच्छी है लेकिन पिछले दिनों इस चैनल और खुद उनके कार्यक्रम में एक ऐसी घटना घटी जिसे पत्रकारीय नैतिकता की कसौटी पर उचित नहीं ठहराया जा सकता है. हुआ यह कि इस चैनल पर नीरा राडिया प्रसंग में इस मुद्दे पर बहस का कार्यक्रम प्रसारित किया गया कि ‘क्या लॉबीइंग को कानूनी बना देना चाहिए?’ कार्यक्रम के दौरान दर्शकों की राय दिखाते हुए कई ट्वीट पेश किए गए जिनमें ज्यादातर में लॉबीइंग को कानूनी बनाने की वकालत की गई थी.

यह रहा बिनायक सेन को उम्र कैद देनेवाला ‘बनाना रिपब्लिक’

आनंद प्रधान

लोकतंत्र, न्याय और मानवाधिकारों का इससे बड़ा मजाक और क्या हो सकता है

"और, तब मुझे प्रतीत हुआ भयानक
गहन मृतात्माएँ इसी नगर की
हर रात जुलूस में चलतीं,
परन्तु दिन में
बैठती हैं मिलकर करती हुई षड्यंत्र
विभिन्न दफ्तरों-कार्यालयों, केन्द्रों में, घरों में,
हाय,हाय! मैंने देख लिया उन्हें नंगा,
इसकी मुझे और सजा मिलेगी."

(डा. बिनायक सेन को सजा दिए जाने पर आक्रोश जाहिर करते हुए अपने मित्र और लेखक आशुतोष कुमार ने मुक्तिबोध की ये पंक्तियां फेसबुक पर डाली है. वहीँ से साभार.)
 

जैसीकि आशंका थी, मानवाधिकार कार्यकर्ता और बाल रोग विशेषज्ञ डा. बिनायक सेन को रायपुर की स्थानीय अदालत ने देशद्रोह और राज्य के खिलाफ हिंसक तख्ता पलट के लिए षड्यंत्र करने जैसे आरोपों में उम्र कैद की सजा सुना दी. अरुंधती राय ने सही कहा कि क्या विडम्बना है कि भोपाल गैस कांड में हजारों बेकसूरों के नरसंहार के दोषियों को दो साल की सजा और डा. बिनायक सेन को उम्र कैद? आश्चर्य नहीं कि इस फैसले ने पूरे देश की अंतरात्मा को झकझोर दिया है. न्याय, लोकतंत्र और मानवाधिकारों में यकीन रखनेवाले लोग सदमे में हैं.

सचमुच, लोकतंत्र, न्याय और मानवाधिकारों के साथ इससे बड़ा मजाक नहीं हो सकता है. आखिर डा. बिनायक सेन का कसूर क्या है? यह कि मेडिकल साइंस की इतनी बड़ी डिग्री लेकर प्रैक्टिस करने और रूपया पीटने के बजाय छत्तीसगढ़ जैसे अत्यंत गरीब राज्य में जाकर सबसे गरीबों की सेवा करना और उन गरीबों की आवाज़ उठाना?

सच और असहमति को जेल भेजो

आनंद प्रधान

(तहलका से साभार)

अरुंधती रॉय से शब्द उधार लेकर कहूं, तो सचमुच, तरस आता है इस देश के समाचार मीडिया खासकर समाचार चैनलों पर जो लेखकों और बुद्धिजीवियों को अपने मन की बात कहने के जुर्म में जेल भेजने की मुहिम चला रहे हैं. कई चैनलों की चली होती तो अरुंधती समेत अन्य कई बुद्धिजीवी देशद्रोह के आरोप में अब तक जेल में होते. उन पर तरस इसलिए आता है कि उन्हें पता नहीं कि उनकी इस मुहिम का क्या मतलब है. कहने की इच्छा होती है कि ‘हे दर्शकों-पाठकों-श्रोताओं, माफ करना, इन्हें पता नहीं कि ये क्या कर रहे हैं?’

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)