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अविनाश

शर्म करो कि तुम्‍हारी मां ऐसी कहानियां लिखती हैं...

अविनाश

मार्च की तीसरी तारीख की शाम, जब मौसम बेहद खुश्‍क था और रह रह कर बूंदा बांदी हो रही थी, 72, लोदी स्‍टेट के सभागार में लोग भरे हुए थे। अंग्रेजी, फ्रेंच और हिंदुस्‍तानी रंगों वाले मिले जुले लोगों की तादाद नमिता गोखले और जय अर्जुन सिंह की बातचीत सुनने आयी थी। नमिता गोखले अंग्रेजी की मशहूर लिक्‍खाड़ हैं और सन 84 में उनका जलवा पारो : ड्रीम्‍स ऑफ पैशन. के साथ शुरू हुआ था। जबकि जय अर्जुन सिंह पत्रकार हैं और जाने भी दो यारों पर लिखी उनकी एक किताब को लोग इधर बड़े चाव से पढ़ रहे हैं।

जय ने नमिता से ढेर सारी बातें की और बातों के तमाम सिलसिले में लेखक की अपनी यात्रा थी, रचना प्रक्रिया थी, अध्‍यात्‍म और सेक्‍स था, साथ ही मिथकों के साथ एक लेखक की मुठभेड़ के ढेर सारे किस्‍से थे। नमिता ने अपनी अलग अलग किताबों से उठा कर कुछ टुकड़े भी सुनाये, जिनमें सुपर डेज़. के कुछ शानदार अंश थे, तो शकुंतला. के हिंदी अनुवाद की थोड़ी बानगी भी थी…

बनारस की वह पहली छवि मैं कभी भूल नहीं पायी : घाटों पर लपलपाती चिताओं की अग्नि, लहरों पर टूटती उनकी परछाइयां। उनके प्रकाश से धूमिल पड़ गया चंद्रमा। जिह्वा पर लपलपाती आकाश की ओर लपकती ज्‍वाला। चिताओं के प्रकाश और चरमराहट के पीछे अंधेरे में डूबा नगर। शकुंतला ने यहीं प्राण त्‍यागे थे, इस पवित्र नदी के तट पर। उस जन्‍म का स्‍मृति जाल मुझे मुक्‍त नहीं होने देता…

सुपर डेज़ में उनके मायानगरी वाले दिन थे, जिनमें ऋषि कपूर, नीतू सिंह और राजेश खन्‍ना का दिलचस्‍प जिक्र था।

जय अर्जुन सिंह ने अस्‍सी के दशक में पारो जैसी बिंदास किताब लिखने के बारे में जब नमिता गोखले से सवाल किया, तो उन्‍होंने कहा कि इस किताब के प्रकाशन के बाद का समय उनके और उनके परिवार के लिए बहुत मुश्किलों भरा था। किताब लिखते हुए उन्‍हें इस बात का ठीक ठीक अंदाजा नहीं था कि हिंदुस्‍तान इस तरह की किताब लिखने की क्‍या प्रतिक्रिया होगी। इसलिए बेबाकी में जो कहानी कह दी गयी, वो कह दी गयी।

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)