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अरुंधती रॉय

Arundhati Roy

बिनायक सेन का मुकद्दमा

अरुंधती रॉय

आई बी एन लाइव पर लिए गए साक्षात्कार का अनुवाद

30 दिसंबर, 2010

[बिनायक सेन के मुकद्दमे ने उस नागरिक समाज के सामने बहुत से सवाल खड़े कर दिए हैं जिसका मानना है कि भारतीय जनतंत्र में - जिसे कि अपने विश्व में सबसे बड़े होने पर गर्व है - असहमति की जगह सिकुड़ती जा रही है। राज्य ने बहस और असहमति को देशद्रोह के घेरे में बांध लेने की प्रथा चला दी है। लेखक-कार्यकर्ता अरुंधती रॉय ने हाल में कश्मीर पर अपने बयान से देशद्रोह पर बहस शुरू कर दी थी। यहाँ प्रस्तुत है बिनायक सेन को कथित रूप से माओवादियों से संपर्क रखने के लिए उम्र कैद दिए जाने के बाद अरूंधती का एक साक्षात्कार। उनसे साक्षात्कार रूपश्री नंदा ने लिया था]
 
जब आपने सुना कि बिनायक सेन तथा दो अन्य लोगों को देशद्रोह के आरोप में उम्र कैद की सज़ा दी गई है तो आपकी सबसे पहली प्रतिक्रिया क्या थी?
 
मुझे यह तो उम्मीद नहीं थी कि फैसला न्यायपूर्ण होगा, पर अन्याय की हद देख कर मैं अचंभित थी। एक तरह से, ऐसा लगता है जैसे न्यायालय में प्रस्तुत प्रमाणों तथा फैसले का एक-दूसरे से कोई लेना-देना नहीं था। मेरी प्रतिक्रिया थी कि यह एक लिहाज से एक घोषणा थी ... यह फैसला नहीं था बल्कि अपनी मंशाओं की घोषणा थी, यह एक संदेश था और दूसरों के लिए एक चेतावनी थी। तो यह दो तरह से काम करता है। चेतावनी को ध्यान में लिया जाएगा। मेरे ख्याल से जिन लोगों ने इस फैसले को सुनाया उन्हें यह अंदेशा नहीं था कि यह लोगों को इस हद तक आक्रोश में एकजुट कर देगा।
 
आपको न्यायपूर्ण फैसले की उम्मीद क्यों नहीं थी?

वे जवाहरलाल नेहरू पर भी मृत्योपरांत मामला चला सकते हैं

अरुंधती रॉय

30 नवंबर, 2010

न्यायालय द्वारा आज के उस आदेश के बारे में, जिसमें दिल्ली पुलिस को मेरे खिलाफ़ राज्य के विरुद्ध युद्द चलाने के लिए एफ़ आई आर दर्ज करने का निर्देश दिया गया है, मेरी प्रतिक्रिया यह है: शायद उन्हें जवाहरलाल नेहरू के खिलाफ़ भी मृत्योपरांत मामला दर्ज करना चाहिए।

कश्मीर के बारे में उन्होंने यह सब कहा था:

1. पाकिस्तान के मुख्य मंत्री को भेजे गए एक तार में भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा, "मैं यह बात साफ़ कर देना चाहता हूँ कि इस आपातकाल में कश्मीर की मदद करने का सवाल किसी भी तरह से उसके भारत में विलय को प्रभावित करने से नहीं जुड़ा है।  हमारा मत, जिसे हम बार-बार सार्वजनिक करते रहे हैं, यह है कि किसी भी विवादग्रस्त इलाके या राज्य के विलय का सवाल वहाँ के लोगों की इच्छाओं के अनुसार ही होना चाहिए और हम इस विचार पर कायम हैं।"  (तार 402, Primin-2227, दिनांकित 27 अक्तूबर, 1947, पाकिस्तान के प्र. मं. को, उसी तार को दोहराते हुए जो यू. के. के प्र. मं. को भेजा गया था)।
 
2. पाकिस्तान के प्र. मं. को भेजे गए एक अन्य पत्र में पंडित नेहरू ने कहा, "कश्मीर के भारत में विलय को हमने महाराजा की सरकार के और राज्य की सर्वाधिक जनसमर्थन वाली संस्था, जो कि मुख्यतया मुस्लिम है, के अनुरोध पर ही माना था। तब भी इसे इस शर्त पर स्वीकृत किया गया था कि जैसे ही कानून-व्यवस्था बहाल हो जाएगी, कश्मीर की जनता विलय के सवाल का निर्णय करेगी। ये निर्णय उन्हें लेना है कि वे किस देश में विलय को स्वीकार करें।" (तार सं. 255 दिनांकित 31 अक्तूबर, 1947) ।

विलय का मुद्दा

'...पर क्या आजाद भारत किसी लिहाज से संपूर्ण है?'

अरुंधती रॉय से जुड़े हालिया और कई पुराने विवादों पर शोमा चौधरी की उनसे बातचीत

(तहलका से साभार)

आपने दिल्ली और कश्मीर में जो बयान दिए उनके आधार पर सरकार आपके खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा चलाने पर विचार कर रही है. राजद्रोह आपकी नजर में क्या है? क्या आप खुद को राष्ट्रद्रोही मानती हैं? दिल्ली और श्रीनगर में ऐसे मंच से बयान देने के पीछे आपकी मंशा क्या थी जिसका शीर्षक था - आजादी: द ओनली वे?

तस्लीमा नसरीन तथा अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता

अरुंधती रॉय

13 फरवरी, 2008

मैं चाहूंगी कि इस मुद्दे पर ग़ौर करते समय हम विशेष सतर्कता बर्तें। ख़ास कर तस्लीमा नसरीन के मुद्दे को हमें एकतरफा लेन्स अर्थात् केवल 'धार्मिक कट्टरवाद' तथा धर्म-निरपेक्ष उदारवाद के बीच टकराव के रूप में नहीं देखना चाहिए। हालांकि स्वंय तस्लीमा नसरीन ने भी इस प्रकार के दृष्टिकोण को प्रतिपादित किया है। अपने वेबसाइट में एक जगह वह लिखती हैं - 'मानवजाति को एक अनिश्चित भविष्य का सामना करना पड़ रहा है - विशेष रूप से टकराव दो अत्यंत अलग विचारधाराओं, धार्मिक कट्टरवाद तथा धर्मनिरपेक्षता के बीच है'। मेरे विचार में यह टकराव दरअसल बौद्धिक और तार्क

मीडिया और भीड़ पर वक्तव्य

अरुंधती रॉय

1 नवंबर, 2010

नई दिल्ली, 31 अक्टूबर: करीब सौ लोगों की एक भीड़ मेरे घर पर आज सुबह 11 बजह पहुँची (रविवार 31 अक्टूबर 2010)। उन्होंने गेट तोड़ दिया और सामान की तोड़-फोड़ की। उन्होंने कश्मीर के बारे में मेरे विचारों के खिलाफ़ नारे लगाए, और मुझे एक सबक सिखाने की धमकी दी।

एन डी टी वी, टाइम्स नाओ तथा न्यूज़ 24 की ओ बी वैनें पहले से ही घटना का सीधा प्रसारण करने के लिए तैयार थीं। टी वी रिपोर्टों का कहना है कि भीड़ में मुख्यत: भाजपा के महिला मोर्चे के सदस्य थे।

तरस आता है उस देश पर जो इंसाफ की मांग करनेवालों को जेल भेजना चाहता है

अरुंधति रॉय

26 अक्टूबर 2010

[कश्मीर के बारे में कही गई अपनी बातों के लिए लेखक अरुंधती रॉय पर भारत में 'राजद्रोह' के आरोप का अंदेशा है। इन भाषणों का फ़िलहाल दिल्ली पुलिस विश्लेषण कर रही है। इस धमकी के बारे में उनका जवाब, जो श्रीनगर से जारी किया गया, नीचे दिया जा रहा है। ]

कंपनियों को खजाना और जनता को मौत बांटती सरकार

दक्षिणी उड़ीसा की हल्की ऊंची और सपाट चोटी वाली पहाड़ियां डोंगरिया कोंध आदिवासियों के घर हैं। तब से जब उड़ीसा नाम के किसी राज्य और भारत नाम के किसी देश का अस्तित्व भी नहीं था। उन पहाड़ियों ने कोंधों का खयाल रखा। कोंधों ने उन पहाड़ियों को सहेजे रखा। उनकी पूजा की। एक जीवित भगवान की तरह। लेकिन अब बॉक्साइट के कारण उन पहाड़ियों को बेच दिया गया है। कोंध आदिवासियों को लगता है कि उनका भगवान बेच दिया गया है। वो पूछ रहे हैं कि अगर उनके देवता की जगह राम, अल्ला या ईसा मसीह होते तो क्या उन्हें बेचा जाता?

 

बंदूक की नली से निकलता ग्राम स्वराज

अरुंधती रॉय

 

दंतेवाड़ा को समझाने के कई तरीके हो सकते हैं। यह एक विरोधाभास है। भारत के हृदय में बसा हुआ राज्यों की सीमा पर एक शहर। यही युद्ध का केन्द्र है। आज यह सिर के बल खड़ा है। भीतर से यह पूरी तरह उघड़ा पड़ा है।

दंतेवाड़ा में पुलिस सादे कपड़े पहनती है और बागी पहनते हैं वर्दी। जेल अधीक्षक जेल में है, और कैदी आजाद (दो साल पहले शहर की पुरानी जेल से करीब 300 कैदी भाग निकले थे)। जिन महिलाओं का बलात्कार हुआ है, वे पुलिस हिरासत में हैं। बलात्कारी बाजार में खड़े भाषण दे रहे हैं।

हम सब एक टाइम बम पर बैठे हुए हैं

मुकदमे की कानूनी जांच किये बिना आप किसी को फांसी कैसे दे सकते हैं?

साहित्यिक लेखन और असाहित्यक लेखन के बीच की जगह

6 अक्टूबर को उत्तरी इटली के फैरारा शहर में भारतीय लेखिका सुश्री अरुंधती राय ने साहित्य और पत्रकारिता विषय पर हो रही बहस में "उपन्यासकार के साहित्यिक लेखन और असाहित्यक लेखन के बीच में कौन सी जगह होती है?" प्रश्न के उत्तर में कुछ बोला था जो यहाँ प्रस्तुत है. मैंने उनके भाषण को अपने आईपोड पर रिकार्ड किया था पर कुछ जगहों पर यह रिकर्डिंग साफ़ नहीं है और वैसे भी मैंने अनुवाद में उनकी कही बात का अर्थ पकड़ने की कोशिश की है बजाय कि हर शब्द का बिल्कुल वही अनुवाद करूँ.

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)