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राइट की फाइट

अनिल एकलव्य

यह सह-संचार की दुनिया, जो एक इलैक्ट्रॉनिक दुनिया है, यहाँ, अगर आपकी पहुँच कंप्यूटर और इंटरनेट तक हो तो, छापने के ज़्यादा दाम नहीं लगते। यानी आपके पास कॉर्पोरेटी बैसाखी होना ज़रूरी नहीं है।

कुकुरमुत्ता भी गुलाब को ठेंगा दिखा सकता है।

जब सह-संचार शुरू किया था तो उम्मीद थी कि लोग साथ आएंगे (मतलब अपने-आप साथ आएंगे) और, जैसा कि (हसरत जयपुरी शायद?) कह गए हैं, कारवाँ बन जाएगा। पर शायद सह-संचार के संपादक के नाम से लोगों को कुछ प्लेग-व्लेग का डर जैसा है। या जो भी हो, (एक-आध को छोड़कर) कोई पास नहीं फटका। इलैक्ट्रॉनिक ढंग से भी नहीं फटका। और अपने बस का तो एक हद तक ही है। खैर।

तो ऐसे हालात के चलते एक तरह की उठाईगिरी का सहारा लेना पड़ा (जिसे कुछ लोगों ने दादागिरी समझ लिया - बाहर की दुनिया में उठाईगिरे छोटे-मोटे दादा भी होते हैं, शायद इसलिए, मगर बादशाहत?)। यानी लेख 'साभार' लेकर यहाँ डालने पड़े, क्योंकि उनके लेखक खुद तो भाव दे नहीं रहे थे।

लेकिन हमारे पास इस उठाईगिरी का नैतिक, राजनैतिक और तकनीकी गणित है। ये गणित है कॉपी करने का।

कंप्यूटर की दुनिया में एक शब्द है 'मिररिंग' (mirroring). क्योंकि कंप्यूटर वाला सारा डेटा इलैक्ट्रॉनों की अदृश्य अमूर्त सी दुनिया में रहता है, ठोस कागज़ों पर नहीं, और यह दुनिया बड़ी आसानी से एकदम गायब हो सकती है, इसलिए यह ज़रूरी समझा जाता है कि एक वेबसाइट का सारा डेटा अन्य वेबसाइटों पर लगातार कॉपी करके रखा जाए। साइट का 'मिरर' बना कर रखा जाए। ऐसा औपचारिक तौर पर भी किया जाता है और अनौपचारिक रूप से भी। कारण ढेर सारे हैं और आप अंदाज़ा लगा सकते हैं।

हमारे (ये हम कौनसा वाला है, कम-से-कम बिहारवासी और पुरबिया तो समझ ही सकते हैं) ... हमारे पास बहुत से ऐसे बुकमार्क हैं जो अब काम नहीं करते। बहुत बढ़िया लेख था, बड़े चाव से बुकमार्क करके रखा था, पर अब तो साइट ही गायब हो गई। गूगल कैश में भी नहीं है। कुछ तो तब के हैं जब गूगल नया-नया था। कुछ उससे भी पहले के हैं।

मतलब यह कि अगर आप चाहते हैं कि आपका लेख इंटरनेट पर बना रहे, और आप पेटेंट-कॉपीराइट धर्म में अधिक (अंध) विश्वास नहीं करते, तो आप चाहेंगे कि आपका लेख इंटरनेट पर जितनी अधिक जगह हो उतना अच्छा। ताकि कुछ साइटें, ब्लॉग वगैरह गायब भी हो जाएँ तब भी लेख लोगों को उपलब्ध रहे। मतलब आप चाहेंगे कि आपका लेख जितना कॉपी किया जाए उतना अच्छा, बशर्ते लेख आपके नाम से ही दिया गया हो। और आपकी साइट का लिंक दिया हो तो और भी अच्छा।

राजनैतिक नज़रिए से देखा जाए तो विकिलीक्स की मिसाल सामने है।

निष्कर्ष यह कि सह-संचार वाले फ़ैनेटिक अंध-कॉपीराइट की फाइट में यकीन नहीं करते। उपरोक्त अर्थ में कॉपी के राइट में यकीन करते हैं। यहाँ यह भी जोड़ सकते हैं कि राइट माने दक्षिणपंथ में यकीन नहीं करते, राइट माने सही में यकीन करते हैं। राइट माने अधिकार में भी यकीन करते हैं, पर पेटेंट करने के अधिकार में यकीन नहीं करते। कॉपीराइट से हमें एक सीमा तक कोई आपत्ति नहीं है, पर कॉपीलेफ़्ट हो तो और अच्छा।

इसी परिप्रेक्ष्य में राइट की फ़ाइट में भी यकीन करते हैं। राइट फ़ाइट में भी यकीन करते हैं।

पर इसका मतलब यह नहीं हुआ कि पेटेंट-कॉपीराइट के कानून तोड़ने का फ़िलहाल कोई इरादा है। तो अगर आपका कोई लेख यहाँ डाल दिया गया है और आपको यह बात कुछ जँची नहीं, तो शर्माएँ नहीं, तुरंत संंपर्क करें और बोलें कि यह मेरा लेख बिना पूछे क्यों उठा लिया है आपने, इसे हटाइए। हम हटा देंगे।

लेख हमारे यहाँ रहे चाहे नहीं रहे, कॉपीराइट वगैरह सब आपका ही होगा।

बाकी जो कुछ भी थोड़ा-बहुत हमने अपनी तरफ से यहाँ डाला है, यानी जिस पर हमारा कॉपीराइट बनता है कानूनन, आप चाहें जब उठा के चाहे जहाँ डाल सकते हैं। शर्त वही जो ऊपर बताई गई है।

 

संक्रामक रोग का डर जब भी कम हो, निमंत्रण जारी रहेगा।

 


(वैसे कई लोग सुना है सह-संचार को ब्लॉग एग्रीगेटर के रूप में भी देखते हैं। तो इसे असहमति और प्रतिरोध का ब्लॉग एग्रीगेटर माना जाए तो भी कोई बुरी बात नहीं है।)


लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)