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हबीब कैफ़ी

Habib Kaifi

खाए-पिए लोग

हबीब कैफ़ी

देखने में ये लोग खूबसूरत थे। आकर्षक भी। इनके रहने के लिए ख़ास इलाक़ा था। इसे पॉश कॉलोनी कहा जाता है। यह मख़सूस कॉलोनी योजनाबद्ध तरीके से बसी हुई थी। यहाँ भव्य इमारतें थी। अतिरिक्त ऑक्सीजन, सजावट और खूबसूरती के लिए इनके आगे बग़ीचे थे। दूब थी। रिहाइशगाहों के अन्दर की सजावटें आकर्षक और आँखों को भली लगने वाली थीं। ठंडक पहुँचाने वाली भी।

इन ख़ास लोगों की जीवन शैली भी कुछ ख़ास क़िस्म की थी। यह कहने में भी कोई मुजायक़ा नहीं कि पहनने ओढ़ने और खानपान के पैमाने इनकी जीवन शैली से ही निर्धारित किए गए थे। ये लोग उच्च शिक्षा प्राप्त शालीन, सुसभ्य और संस्कारवान थे। धनवान तो ये थे ही। इन्हें जीवन का आनन्द उठाना आता था।

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)