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लॉटरी

शर्ली जैकसन

जून 27 की सुबह आसमान साफ़ था और धूप छाई हुई थी, ठंडे इलाके में गर्माहट से भरी; हर तरफ़ फूल खिले हुए थे और घास हरियाली से भरपूर थी। गाँव के लोग चौपाल में इकट्ठे होने लगे थे, पोस्ट ऑफ़िस और बैंक के बीच, दस बजे के आस-पास; कुछ कस्बों में तो इतने लोग थे कि लॉटरी को पूरा होने में दो दिन लगते थे और इसलिए शुरुआत 2 जून को करनी पड़ती थी। लेकिन क्योंकि इस गाँव में केवल तीन एक सौ लोग ही थे, पूरी लॉटरी में दो घंटे से भी कम वक़्त लगता था, यानी अगर दस बजे सुबह शुरुआत की जाए तो काम पूरा करके घर पहुँच कर दोपहर का खाना खाने के लिए पर्याप्त समय बचता था।

बच्चे तो, जाहिर है, सबसे पहले पहुँच चुके थे। स्कूल की गर्मियों की छुट्टियाँ अभी शुरू ही हुई थीं, और छुटकारे के भाव में अभी कुछ बेचैनी मिली हुई थी; उधम चालू करने से पहले अभी उनके कुछ देर शांति से साथ खड़े रहने की संभावना होती थी। और उनकी बातें अब भी कक्षा तथा अध्यापक की, किताबों तथा डाँट-फ़टकार की थीं। बॉबी मार्टिन ने तो पहले से ही अपनी जेबें पत्थरों से भर ली थीं, और बाकी लड़कों ने भी जल्दी ही वैसा ही किया, सबसे चिकने और गोल पत्थरों को चुन-चुन कर; बॉबी और हैरी जोन्स और डिकी डेलाक्रुआ - गाँव वाले इस नाम को "डेलाक्रॉय" बोलते थे - ने होते-होते पत्थरों का एक बड़ा सा ढेर चौपाल के एक कोने में बना लिया था और अन्य लड़कों के धावे से उसके बचाव के लिए तैयार खड़े थे। लड़कियाँ अलग खड़ी थीं, आपस में बात करते हुए, अपने पीछे देखते हुए या अपने बड़े भाइयों या बहनों का हाथ पकड़े हुए।

जल्दी ही आदमी इकट्ठा होने लगे, अपने बच्चों की गिनती करते हुए, जुताई और बारिश की, ट्रैक्टरों और टैक्सों की बातें करते हुए। वो एक-साथ खड़े थे, कोने में बने पत्थरों के ढेर से दूर, और उनके मज़ाक हल्के-फुल्के थे और वे हँसने की बजाय मुस्करा ज़्यादा रहे थे। औरतें, पुराने घरेलू कपड़े तथा स्वेटर पहने, अपने आदमियों के आने के कुछ ही देर बाद आ गईं। उन्होंने एक-दूसरे का हाल-चाल पूछा और थोड़ी बहुत गपशप की अपने पतियों तक पहुँचने तक। जल्दी ही औरतें, अपने पतियों के बगल में खड़े हुए, अपने बच्चों को बुलाने लगीं, और बच्चे अनमने भाव से आने लगे, चार-पाँच बार बुलाने के बाद। ब़ॉबी मार्टिन अपनी माँ के आगे बढ़े हाथों के नीचे से निकल कर हँसते हुए दुबारा पत्थरों के ढेर की तरफ़ वापस दौड़ गया। उसके पिता ने उसे तीखी आवाज़ में बुलाया तो वो तुरंत वापस आ गया और अपने पिता तथा अपने सबसे बड़े भाई के बीच में अपनी जगह पर पहुँच गया।

लॉटरी को - चौकोर नृत्यों, किशोर गोष्ठियों तथा हैलोवीन कार्यक्रम की ही तरह - मि. समर्स के द्वारा ही चलाया जाता था, जिनके पास नागरिक कार्यक्रमों को चलाने के लिए समय और ऊर्जा थी। वो एक गोल चेहरे वाले व्यक्ति थे, एक हँसमुख आदमी और वो अपना कोयले का व्यवसाय चलाते थे, और लोग उनके लिए दुखी रहते थे क्योंकि उनके कोई बच्चे नहीं थे और उनकी पत्नी उन्हें डाँटती थी। जब वो चौपाल में पहुँचे, लकड़ी का काला बक्सा उठाए हुए, तो गाँव वालों के बीच थोड़ी बात-चीत की आवाज़ फैल गई, और उन्होंने हाथ हिला कर कहा, "आज थोड़ी देर हो गई, भाइयों"। उनके पीछे-पीछे पोस्टमास्टर मि. ग्रीव्स एक तीन पैरों वाला स्टूल उठा कर आए, और उस स्टूल को चौपाल के बीच में रख दिया गया और मि, समर्स ने काला बक्सा उस पर रख दिया। गाँव वाले कुछ दूरी बना के खड़े रहे, अपने तथा स्टूल के बीच कुछ जगह छोड़ कर। और जब मि. समर्स ने कहा, "आप में से कुछ भाई मेरा हाथ बँटाना चाहेंगे?" तब थोड़ी देर झिझक रही और फिर दो आदमी, मि. मार्टिन तथा उनका सबसे बड़ा बेटा बैक्सटर आगे आए बक्से को स्थिर रखने के लिए ताकि मि. समर्स उसमें डले कागज़ों को हिला सकें।

लॉटरी के लिए पुराने जमाने का शुरूआती तामझाम तो बहुत पहले ही खोया जा चुका था, और स्टूल पर जो काला बक्सा रखा था उसका इस्तेमाल बुढ़ऊ वॉर्नर, जो कस्बे के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति थे, के जन्म से भी पहले से हो रहा था। मि. समर्स ने कई बार गाँव वालों से नया बक्सा बनाने की बात चलाई थी, पर कोई उतनी भी परंपरा को गड़बड़ाना नहीं चाहता था जितनी उस काले बक्से में संचित थी। एक कहानी थी कि वर्तमान का बक्सा उस बक्से के कुछ टुकड़ों को मिला कर बना था जो इससे पहले इस्तेमाल होता था, यानी वो बक्सा जो उस गाँव को बसाने वाले सबसे पहले लोगों के समय में बनाया गया था। हर साल, लॉटरी के बाद, मि. समर्स एक नया बक्सा बनाने की बात शुरू करते थे, पर हर साल इस विषय को बिना कुछ किए भुला दिया जाता था। हर साल काला बक्सा और अधिक जीर्ण-शीर्ण होता जाता था: अब तक आते-आते वो पूरी तरह काला भी नहीं रहा था, बल्कि उसके एक तरफ से खपच्चियाँ निकल आईं थीं जिससे उसके नीचे का लकड़ी का रंग दिखने लगा था, और कई जगहों पर दाग भी पड़ गए थे।

मि. मार्टिन और उनके सबसे बड़े बेटे, बैक्सटर, ने तब तक काले बक्से को स्टूल पर जमा कर पकड़े रखा जब तक कि मि. समर्स ने कागज़ों को अपने हाथ से अच्छी तरह से हिला-मिला नहीं दिया। क्योंकि इस रिवाज़ के बारे में इतनी सारी बातें लोग भुला दी गई थीं या छोड़ दी गई थी कि मि. समर्स लकड़ी की चिट्टियों, जो कई पीढ़ियों तक इस्तेमाल होती रही थीं, की जगह कागज़ के पर्चों को चलन में लाने में सफल हो गए थे। लकड़ी की चिप्पियाँ, मि, समर्स का तर्क था, तब तक एकदम ठीक थीं जब तक कि गाँव छोटा सा था, पर अब जबकि जनसंख्या तीन सौ पार कर गई थी और बढ़ रही था, यह ज़रूरी था कि ऐसी किसी चीज़ का प्रयोग हो जो आसानी से काले बक्से में समा सके। लॉटरी से पिछली रात मि. समर्स और मि, ग्रीव्स कागज़ों के पर्चे तैयार करते थे और उन्हें बक्से में रख देते थे, और उसके बाद बक्से को मि. समर्स के कोयले की कंपनी वाली तिजोरी में ले जाकर ताले में तब तक बंद रखा जाता था जब तक कि मि. समर्स अगली सुबह उसे चौपाल तक ले जाने के लिए न आ जाएँ। साल के बाकी दिनों में बक्से को कभी एक जगह, कभी दूसरी जगह रखा जाता था; उसने एक साल मि. ग्रीव्स के अनाजघर में तथा एक अन्य साल पोस्ट ऑफ़िस में बिताया था। और कई बार उसे मार्टिन के किराने की दुकान की अल्मारी के ऊपर रख कर छोड़ दिया जाता था।


लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)