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शर्ली जैकसन

Shirley Jackson

लॉटरी

शर्ली जैकसन

जून 27 की सुबह आसमान साफ़ था और धूप छाई हुई थी, ठंडे इलाके में गर्माहट से भरी; हर तरफ़ फूल खिले हुए थे और घास हरियाली से भरपूर थी। गाँव के लोग चौपाल में इकट्ठे होने लगे थे, पोस्ट ऑफ़िस और बैंक के बीच, दस बजे के आस-पास; कुछ कस्बों में तो इतने लोग थे कि लॉटरी को पूरा होने में दो दिन लगते थे और इसलिए शुरुआत 2 जून को करनी पड़ती थी। लेकिन क्योंकि इस गाँव में केवल तीन एक सौ लोग ही थे, पूरी लॉटरी में दो घंटे से भी कम वक़्त लगता था, यानी अगर दस बजे सुबह शुरुआत की जाए तो काम पूरा करके घर पहुँच कर दोपहर का खाना खाने के लिए पर्याप्त समय बचता था।

बच्चे तो, जाहिर है, सबसे पहले पहुँच चुके थे। स्कूल की गर्मियों की छुट्टियाँ अभी शुरू ही हुई थीं, और छुटकारे के भाव में अभी कुछ बेचैनी मिली हुई थी; उधम चालू करने से पहले अभी उनके कुछ देर शांति से साथ खड़े रहने की संभावना होती थी। और उनकी बातें अब भी कक्षा तथा अध्यापक की, किताबों तथा डाँट-फ़टकार की थीं। बॉबी मार्टिन ने तो पहले से ही अपनी जेबें पत्थरों से भर ली थीं, और बाकी लड़कों ने भी जल्दी ही वैसा ही किया, सबसे चिकने और गोल पत्थरों को चुन-चुन कर; बॉबी और हैरी जोन्स और डिकी डेलाक्रुआ - गाँव वाले इस नाम को "डेलाक्रॉय" बोलते थे - ने होते-होते पत्थरों का एक बड़ा सा ढेर चौपाल के एक कोने में बना लिया था और अन्य लड़कों के धावे से उसके बचाव के लिए तैयार खड़े थे। लड़कियाँ अलग खड़ी थीं, आपस में बात करते हुए, अपने पीछे देखते हुए या अपने बड़े भाइयों या बहनों का हाथ पकड़े हुए।

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)