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मृदुला गर्ग

Mridula Garg

मेरे देश की मिट्टी, अहा

मृदुला गर्ग

हवा ठंडी नहीं थी, न साफ़। धूल-मिट्टी से भरी हुई थी। फिर भी खाट पर लेटी लल्ली को वह भली लग रही थी। इसलिए कि उसमें धुआं नहीं था। उसने लंबा कश भरकर हवा भीतर खींची। बे-धुआं हवा में सांस लेना कितना बड़ा सुख है, उसने गांव खेड़ी में आकर जाना। धुआं छोड़ती अंगीठी से अलग होकर खुले आकाश के नीचे बैठने की औक़ात, यहां आने पर जो हुई।

गांव उसके लिए नया-न्यारा नहीं है। गांव में पैदा हुई और शुरू के छः-सात बरस वहीं रही। फ़रीदपुर नाम था उसके गांव का। दादी लकड़ी का चूल्हा करती थी। गाली होती तो धुआं ख़ूब उठता। कुछ देर सांस लेनी मुश्किल हो जाती, पर साथ में जो बास आती, बड़ी मनभावन होती। एक साथ दूर फेंकती और पास खींचती। बहुत लुभाऊ होती है ऐसी बास। दादी के हुक़्क़े में से भी बड़ी मोहिनी गंध आती थी और धुआं बस ज़रा-ज़रा चिलम सुलगाते वक़्त, बस। बीड़ी की तरह नहीं कि पिये कोई और कसैलापन भुगते कोई।

जैसे शहर में। हुक़्क़ा वहां कोई नहीं पीता। बीड़ी खूब़। पर लाख बीड़ियां मिलकर भी उतना धुआं पैदा नहीं करतीं, जितनी वहां के ट्रक, बस, स्कूटर, पल भर में छोड़ देते थे। छोड़ते चलते थे। धुंआ भी ऐसा कसांध भरा कि दीखे चाहे नहीं, छाती में हरदम अटा-फंसा रहे मानो बीसियों बीड़ियां पी चुके हों औरत-मर्द। यूं सच में कोई औरत बीड़ी पीती दिख जाए तो फ़ौरन उसे छिनाल बतला दें।

उसने अंगडाई लेकर हाथ-पैर खोलकर पसारे और एक कश खींचा। बदबू का इतना ज़बरदस्त भभका नाक में घुसा कि उबकाई आ गयी। वह उठ कर बैठ गयी। क्या हुआ, नींद से पहले सपना आ गया ? बीते बचपन का ? उसने च्यूंटी काटी। न, वह तो जगी थी। पर बदबू थी कि आये जा रही थी। जलते चमड़े की चमरौंध। जैसी बचपन में गांव के चमार टोले से आती थी। वहीं तो रहती थी वह। चमार टोले में नहीं, उससे सटी झोपड़ी में। जाति से वह बनिया थी।

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)