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मुकेश मानस

Mukesh Manas

खूबसूरत लड़की

मुकेश मानस

1

सुबह होते ही वहाँ के लोग अपनी-अपनी बगलों में खाने के डिब्बों को दबाये काम पर निकल जाते और देर रात तक ठीक अपने लौट आने के वक्त के आस-पास लौट आते। फिर खाना खाकर घर के भीतरी कमरों में टेलीविज़न पर कुछ भी देखते या नई या पुरानी बीबियों से पाँव दबवाते। फिर नींद का झटका आने पर मुर्दों की तरह निस्तेज होकर सो जाते। कभी-कभार बीबियों की शिकायतों पर दाँती मिसमिसाकर बच्चों को पीटते और उन्हें गला फाड़कर रोने भी नहीं देते।

उन्नीस सौ चौरासी

मुकेश मानस

1

शीशे के सामने खड़े होकर मैंने खुद को जांचा, बाल कंघी किये और अपना झोला उठा लिया -

“अच्छा मौसी, अब मैं चलूं।”

“अभी थोड़ी देर और रुक, तेरे मौसा आते ही होंगे। उनसे मिलकर जाइओ।” मौसी के चहरे पर नाराजगी के चिन्ह उभर आये।

“नहीं मौसी, बहुत देर हो गयी हैं फिर मौसा जी के आने का समय भी तो पक्का नहीं है। उनसे अगली बार मिल लूंगा।” मैंने पुन: हाथ जोड़ दिये।

“ओह हो, बड़ा साहबों की तरह बतियाने लगा है।”

“नहीं, यह बात नहीं, मैं मां को कहकर नहीं आया हूँ। नहीं पहुँचा तो चिन्ता करेगी।“

मैं चलने लगा तो मौसी ने जबरदस्ती दस रुपये कमीज की जेब में रख दिये। दरवाजे तक छोड़ने आयीं। जाने क्या सोचकर मैं झुका और उनके पैर छू लिये।

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)