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एक पाठक

मक्सिम गोर्की

रात काफी हो गई थी जब मैं उस घर से विदा हुआ जहाँ मित्रों की एक गोष्ठी में अपनी प्रकाशित कहानियों में से एक का मैंने अभी पाठ किया था । उन्होंने तारीफ के पुल बांधने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी और मैं धीरे-धीरे मगन भाव से सड़क पर चल रहा था, मेरा हृदय आनंद से छलक रहा था और जीवन के एक ऐसा सुख का अनुभव मैं कर रहा था जैसा पहले कभी नहीं किया था ।

फरवरी का महीना था, रात साफ थी और खूब तारों से जड़ा मेघरहित आकाश धरती पर स्फूर्तिदायक शीतलता का संचार कर रहा था, जो नयी गिरी बर्फ से सोलहों सिंगार किये हुए थी ।

’इस धरती पर लोगों की नजरों में कुछ होना अच्छा लगता है!’ मैंने सोचा और मेरे भविष्य के चित्र में उजले रंग भरने में मेरी कल्पना ने कोई कोताही नहीं की ।

“हां, तुमने एक बहुत ही प्यारी-सी चीज़ लिखी है, इसमें कोई शक नहीं,” मेरे पीछे सहसा कोई गुनगुना उठा।

मैं अचरज से चौंका और घूमकर देखने लगा।

काले कपड़े पहने एक छोटे कद का आदमी आगे बढ़कर निकट आ गया और पैनी लघु मुस्कान के साथ मेरे चेहरे पर उसने अपनी आंखें जमा दीं, उसकी हर चीज़ पैनी मालूम होती थी-उसकी नज़र, उसके गालों की हड्डियां, उसकी दाढ़ी जो बकरे की दाढ़ी की तरह नोकदार थी, उसका समूचा छोटा और मुरझाया-सा ढांचा, जो कुछ इतना विचित्र नोक-नुकीलापन लिये था कि आंखों में चुभता था, उसकी चाल हल्की और निःशब्द थी, ऐसा मालूम होता था जैसे वह बर्फ़ पर फिसल रहा हो, गोष्ठी में जो लोग मौजूद थे, उनमें वह मुझे नज़र नहीं आया था ओर इसीलिए उसकी टिप्पणी ने मुझे चकित कर दिया था, वह कौन था ? और कहां से आया था ?

“क्या आपने ... मतलव ... मेरी कहानी सुनी थी ? मैंने पूछा।

"हां, मुझे उसे सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ ।"

उसकी आवाज तेज़ थी, उसके पतले होंठ और छोटी काली मूछें थी जो उसकी मुस्कान को नहीं छिपा पाती थीं। मुस्कान उसके होंठो से विदा होने का नाम ही नहीं लेती थी और यह मुझे बड़ा अटपटा मालूम हो रहा था ।

“अपने आपको अन्य सबसे अनोखा अनुभव करना बड़ा सुखद मालूम होता है, क्यों, ठीक है न ?” मेरे साथी ने पूछा।

मुझे इस प्रश्न में ऐसी कोई बात नहीं लगी जो असाधारण हो, सो मुझे सहमति प्रकट करने में देर नहीं लगी ।

“हो-हो-हो!” पतली उगलियों से अपने छोटे हाथों को मलते हुए वह तीखी हंसी हंसा, उसकी हंसी मुझे अपमानित करने वाली थी ।

“तुम बड़े हंसमुख जीव मालूम होते हो,” मैंने रूखी आवाज में कहा, “अरे हाँ, बहुत !” मुस्काराते और सिर हिलाते हुए उसने ताईद की, “साथ ही मैं बाल की खाल निकालने वाला भी हूं क्योंकि मैं हमेशा चीज़ों को जानना चाहता हूं-हर चीज़ को जानना चाहता हूं।”

वह फिर अपनी तीखी हंसी हँसा और वेध देने वाली अपनी काली आंखों से मेरी ओर देखता रहा, मैंने अपने कद की ऊंचाई से एक नज़र उस पर डाली और ठंडी आवाज़ में पूछा, “माफ़ करना लेकिन क्या मैं जान सकता हूँ कि मुझे किससे बातें करने का सौभाग्य ..."

“मैं कौन हूँ ? क्या तुम अनुमान नहीं लगा सकते ? जो हो, फिलहाल तुम्हें आदमी का नाम उस बात से ज़्यादा महत्वपूर्ण मालूम होता है जो कि वह कहने जा रहा है ?”

“निश्चय ही नहीं, लेकिन यह कुछ ... बहुत ही अजीब है,” मैंने जवाब दिया ।

उसने मेरी आस्तीन पकड़ कर उसे एक हल्का-सा झटका दिया और शांत हँसी के साथ कहा, “होने दो अजीब, आदमी कभी तो जीवन की साधारण और घिसी-पिटी सीमाओं को लाँघना चाहता ही है, अगर एतराज़ न हो तो आओ, ज़रा खुलकर बातें करें, समझ लो कि मैं तुम्हारा एक पाठक हूँ - एक विचित्र प्रकार का पाठक, जो यह जानना चाहता है कि कोई पुस्तक - मिसाल के लिए तुम्हारी अपनी लिखी हुई पुस्तकें - कैसे और किस उद्देश्य के लिए लिखी गयी हैं, बोलो, इस तरह की बातचीत पसंद करोगे ?”

“ओह, ज़रूर !” मैंने कहा, “मुझे खुशी होगी, ऐसे आदमी से बात करने का अवसर रोज़-रोज़ नहीं मिलता,” लेकिन मैंने यह झूठ कहा था, क्योंकि मुझे यह सब बेहद नागवार मालूम हो रहा था, फिर भी मैं उसके साथ चलता रहा - धीमे कदमों से, शिष्टाचार की ऐसी मुद्रा बनाये, मानो मैं उसकी बात ध्यान से सुन रहा हूँ ।

मेरा साथी क्षण भर के लिए चुप हो गया और फिर बड़े विश्वासपूर्ण स्वर में उसने कहा, “मानवीय व्यवहार में निहित उद्देश्यों और इरादों से ज्यादा विचित्र और महत्वपूर्ण चीज़ इस दुनिया में और कोई नहीं है, तुम यह मानते हो न ?” मैने सिर हिलाकर हामी भरी ।

“ठीक, तब आओ, ज़रा खुलकर बातें करें, सुनो, तुम जब तक जवान हो तब तक खुलकर बात करने का एक भी अवसर हाथ से नहीं जाने देना चाहिए ।”

’अजीब आदमी है!’ मैंने सोचा, लेकिन उसके शब्दों ने मुझे उलझा लिया था ।

“सो तो ठीक है,” मैंने मुस्कराते हुए कहा, “लेकिन हम बातें किस चीज़ के बारे में करेंगे ?

पुराने परिचित की भांति उसने घनिष्ठता से मेरी आँखों में देखा और कहा, “साहित्य के उद्देश्यों के बारे में, क्यों, ठीक है न ?”

“हाँ मगर ... देर काफी हो गया है ...”

“ओह, तुम अभी नौजवान हो, तुम्हारे लिए अभी देर नहीं हुई ।”

मैं ठिठक गया, उसके शब्दों ने मुझे स्तब्ध कर दिया था । किसी और ही अर्थ में उसने इन शब्दों का उच्चारण किया था और इतनी गंभीरता से किया था कि वे भविष्य का उद्घोष मालूम होते थे । मैं ठिठक गया था, लेकिन उसनें मेरी बांह पकड़ी और चुपचाप किंतु दृढ़ता के साथ आगे बढ़ चला ।

 


लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)