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उदयप्रकाश

Uday Prakash

आवरण

उदयप्रकाश

 

[ताकि गलतफ़हमी ना हो, कैंसर कतई संक्रामक नहीं होता - सं.]

 

इसे कहानी कहने का जी नहीं करता। फिर भी कहना पड़ेगा। विवशता है।

जिस दौर में हम जीवित हैं, उसमें हमारा जीवन चारों ओर से असंख्य, तरह-तरह की कहानियों के बीच घिरा हुआ है। जैसे हम किसी बाढ़ में डूबे हों। या व्यस्त हाइवे पर ट्रैफिक के बीचों-बीच खड़े हों। चारों ओर किस्सों का शोर और जीवन पर उतने ही ख़तरे। ऐसा इतिहास में कभी नहीं हुआ था। हर रोज़, कई कई बार, हम अलग-अलग कहानियों के पात्र बन जाते हैं या बना दिये जाते हैं, या फिर किसी अन्य को बनता हुआ देखते हैं। कभी कोई यूनानी त्रासदी, कभी संस्कृत की कादंबरी, कभी कोई विस्मृत जातक कथा, कभी किसी विदूषक की कामुदी। किसी गरीब और मामूली आदमी के दुख से उपजता ऊबे और सुखी लोगों का चुटकुला।

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)