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अभिज्ञात

Abhigyat

कुलटा

अभिज्ञात

उन्होंने प्रेम विवाह किया था इसलिए दोनों को ही अपना-अपना घर छोड़ना पड़ा। दोनों निम्न मध्य वर्ग के थे। परम्परागत परिवार से। अलग-अलग जाति के। स्वाभाविक ही था कि उन्हें विवाह करने की ऐसी सज़ा मिले। सो मिली। दोनों को कोई अफसोस नहीं। उल्टे लग रहा था कि उन्होंने कुछ ख़ास कार्य किया है। दूसरों से हटकर। जैसा फ़िल्मों में होता है। कुछ क्रांति व्रांति जैसी चीज़। वे एक जातिविहीन समाज की स्थापना में योगदान दे रहे हैं। यह सबके बस की बात नहीं। समाज उनके योगदान को अरसे तक याद रखेगा। उन्हें सराहनाएं भी मिलीं। लानत मलामत तो खैर मिली ही। कुछ खुले दिल के लोगों ने उन्हें शाबाशी भी दी। कुछ ने चुपके से संकेत दिया ठीक किया है तुमने पर हम खुलकर तुम्हारी तारीफ़ नहीं कर सकते। हम ठहरे मामूली लोग। इतना भी साहस नहीं कि ठीक को ठीक कह सकें।

कामरेड और चूहे

अभिज्ञात

अन्ततः प्रोफेसर डीपी झा ने देहदान का फैसला ही किया। उनकी ज़िन्दगी एक आदर्श थी और वे चाहते थे उनकी मौत भी आदर्श बने। उनके दोस्तों ने ठीक ही सुझाव दिया था कामरेड अनिल विश्वास ने भी तो यही किया था कोलकाता में। उन्होंने देहदान किया था। जो विचारधारा कहती है उस पर चलने में कोई दुविधा नहीं आनी चाहिए। खास तौर पर जीवन मृत्यु से जुड़े प्रश्नों पर। जीवन क्यों का उत्तर जिसने खोज लिया हो उसे मृत्यु कैसी का हल भी स्पष्ट और निर्विवाद खोज लेना चाहिए।

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)