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हैरॉल्ड पिंटर

Harold Pinter

हँसी

हैरॉल्ड पिंटर

 

[हैरॉल्ड पिंटर ने यह कविता एक दिन तब लिखी थी जब दूसरा ईराक़ युद्ध शुरू हुआ था और उन्होंने एक पब से लगातार आती हुई हँसी की आवाज़ें सुनी थीं, जहाँ एक टी वी पर समाचार भी दिखाए जा रहे थे। वर्तमान विश्व-सम्राट की रियासते-हिन्दुस्तान की हाल की यात्रा और उससे कुछ ही पहले विकिलीक्स द्वारा जारी किए गए ईराक युद्ध अभिलेखों के संदर्भ में यह कविता बड़ी प्रासंगिक लगती है।]

हँसी थम जाती है पर कभी नहीं होती खत्म
हँसी झुठाने में लगा देती है अपना पूरा दम
हँसी हँसती है उस पर जो है अनकहा हर दम
ये झरती है और किकयाती है और रिसती है दिमाग़ में
ये झरती है और किकयाती है लाशों के दिमाग़ों में
यूँ सारे झूठ हँसते-हँसते किए जाते हैं फ़राहम
जिन्हें सोख लेती है सिर कटी लाशों की हँसी बेदम
जिन्हें सोख लेते हैं हँसती लाशों के मुँह हर कदम


अनुवादक : अनिल एकलव्य

लोकतंत्र

हैरॉल्ड पिंटर

कोई उम्मीद नहीं
बड़ी सावधानियाँ ख़त्म
वे दिख रही हर चीज़ की मार देंगे
अपने पिछवाड़े की निगरानी कीजिए


मूल अंग्रेज़ी से अनुवाद : व्योमेश शुक्ल

(कविताकोश से साभार)

दोपहर के खाने के बाद

हैरॉल्ड पिंटर

और दोपहर के बाद आते हैं सजे-धजे प्राणी
लाशों में सूंघने के लिए
और करने के लिए अपना भोजन

और तोड़ लेते हैं ये ढेर से सजे-धजे प्राणी
फूले हुए नाशपाती धूल से
और मिनेस्त्रोन-सूप हिलाते हैं बिखरी हड्डियों से

और जब हो जाता है भोजन
वे वहीं पसर जाते हैं आराम से
निथारते हुए लाल मदिरा को सुविधाजनक खोपड़ियों में


अनुवादक: अनिल एकलव्य

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)