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सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

Sarveshvar Dayal Saxena

मुक्ति की आकांक्षा

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

 

चिड़िया को लाख समझाओ

कि पिंजड़े के बाहर

धरती बहुत बड़ी है, निर्मम है,

वहॉं हवा में उन्‍हें

अपने जिस्‍म की गंध तक नहीं मिलेगी।

यूँ तो बाहर समुद्र है, नदी है, झरना है,

पर पानी के लिए भटकना है,

यहॉं कटोरी में भरा जल गटकना है।

बाहर दाने का टोटा है,

यहॉं चुग्‍गा मोटा है।

बाहर बहेलिए का डर है,

यहॉं निर्द्वंद्व कंठ-स्‍वर है।

फिर भी चिड़िया

मुक्ति का गाना गाएगी,

मारे जाने की आशंका से भरे होने पर भी,

पिंजरे में जितना अंग निकल सकेगा, निकालेगी,

हरसूँ ज़ोर लगाएगी

और पिंजड़ा टूट जाने या खुल जाने पर उड़ जाएगी।


(कविताकोश से साभार)

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)