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शमशेर बहादुर सिंह

Shamsher Bahadur Singh

काल तुझ से होड़ है मेरी

शमशेर बहादुर सिंह

काल,

तुझसे होड़ है मेरी : अपराजित तू-

तुझमें अपराजित मैं वास करूं ।

इसीलिए तेरे हृदय में समा रहा हूं

सीधा तीर-सा, जो रुका हुआ लगता हो-

कि जैसा ध्रुव नक्षत्र भी न लगे,

एक एकनिष्ठ, स्थिर, कालोपरि

भाव, भावोपरि

सुख, आनंदोपरि

सत्य, सत्यासत्योपरि

मैं- तेरे भी, ओ' 'काल' ऊपर!

सौंदर्य यही तो है, जो तू नहीं है, ओ काल !

जो मैं हूं-

मैं कि जिसमें सब कुछ है...

क्रांतियां, कम्यून,

कम्यूनिस्ट समाज के

नाना कला विज्ञान और दर्शन के

जीवंत वैभव से समन्वित

व्यक्ति मैं ।

मैं, जो वह हरेक हूं

जो, तुझसे, ओ काल, परे है

('काल तुझ से होड़ है मेरी' नामक कविता-संग्रह से)

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)