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मॉरिस ऑग्डेन

Maurice Ogden

जल्लाद

मॉरिस ऑग्डेन

1.
हमारे शहर में एक दफ़ा आया एक जल्लाद,
सोने और खून और आग की महक के साथ
और वो संकोच से हमारी गलियों में कुछ देर तक टहला,
और उसने कचहरी के चौराहे पर अपना चौखटा बनाया।

चबूतरा कचहरी के चौराहे के पास खड़ा था,
बस इतना चौड़ा जितना चौड़ा दरवाज़ा था;
चौखटा इतना ऊँचा, या उससे ज़रा सा ज़्यादा,
कचहरी के दरवाज़े की ऊपरी चौखट थी जितना।

और वो सोचता रहा, जब भी उसे मिला वक़्त,
कौन हो अपराधी, और क्या हो उसका ज़ुर्म
जिसका कि फैसला जल्लाद करे अपने बुने हुए सन
की पीली गाँठ से जो उसके व्यस्त हाथों में थी बंद।

और निर्दोष चाहे हम थे, पर डर से भर कर
हमने उसकी सीसे सी आँखों पर डाली नज़र
तब एक ने कराह के पूछा: "जल्लाद वो कौन है
जिसके लिए तुमने यह फांसी का पेड़ उगाया है?"

तब उसकी सीसे सी आँखों में एक चमक उग आई,
और उसने हमें जवाब की जगह एक पहेली थमा दी:
"जो मेरी सेवा करेगा सबसे बेहतर," उसने कहा,
"फांसी के इस पेड़ की रस्सी वही तो कमाएगा।"

और वो नीचे उतरा, और उसने अपना हाथ रखा
एक आदमी के कंधे पर जो था किसी और देस का।
और हमारी साँस में साँस आई, क्योंकि जल्लाद के हाथ
किसी और के संताप का मतलब था हमारे लिए राहत

और कचहरी के मैदान में लगा वो फांसी का चौखटा
कल सुबह के सूरज तक गिर जाएगा, चला जाएगा।
तो हमने उसे राह दे दी, और कोई नहीं बोला,
और जल्लाद के चोगे का सम्मान हमने किया।

2.
अगले दिन की सुबह के सूरज ने नर्मी से नीचे देखा
हमारे शांत शहर की छतों और गलियों को निरखा,
और सुबह की हवा में काला सा और कठोर
खड़ा था कचहरी के चौराहे में फांसी का पेड़

और जल्लाद वहीं अपने सामान्य लहजे में खड़ा था
पीले सन को अपने व्यस्त हाथों में दबा रखा था;
अपनी सीसे सी आँखों और शार्क जैसे जबड़े के साथ
और अपनी सर्व-ज्ञाता सी व्यवसायी सी मुद्रा के साथ

और हमने कराह के पूछा, "जल्लाद, क्या तुम्हारा काम
पूरा नहीं हुआ, कल उस परदेसी को करके तमाम?"
फिर हम चुप पड़ गए, और अचंभित खड़े रहे,
"अरे, फंदा थोड़े ही कसा गया था उसके लिए।"

वो हँँसा और हम सब पर एक नज़र दौड़ा गया:
"तुमने क्या सोचा कि मैं इतना झंझट करूंगा

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)