जल्लाद
मॉरिस ऑग्डेन
1.
हमारे शहर में एक दफ़ा आया एक जल्लाद,
सोने और खून और आग की महक के साथ
और वो संकोच से हमारी गलियों में कुछ देर तक टहला,
और उसने कचहरी के चौराहे पर अपना चौखटा बनाया।
चबूतरा कचहरी के चौराहे के पास खड़ा था,
बस इतना चौड़ा जितना चौड़ा दरवाज़ा था;
चौखटा इतना ऊँचा, या उससे ज़रा सा ज़्यादा,
कचहरी के दरवाज़े की ऊपरी चौखट थी जितना।
और वो सोचता रहा, जब भी उसे मिला वक़्त,
कौन हो अपराधी, और क्या हो उसका ज़ुर्म
जिसका कि फैसला जल्लाद करे अपने बुने हुए सन
की पीली गाँठ से जो उसके व्यस्त हाथों में थी बंद।
और निर्दोष चाहे हम थे, पर डर से भर कर
हमने उसकी सीसे सी आँखों पर डाली नज़र
तब एक ने कराह के पूछा: "जल्लाद वो कौन है
जिसके लिए तुमने यह फांसी का पेड़ उगाया है?"
तब उसकी सीसे सी आँखों में एक चमक उग आई,
और उसने हमें जवाब की जगह एक पहेली थमा दी:
"जो मेरी सेवा करेगा सबसे बेहतर," उसने कहा,
"फांसी के इस पेड़ की रस्सी वही तो कमाएगा।"
और वो नीचे उतरा, और उसने अपना हाथ रखा
एक आदमी के कंधे पर जो था किसी और देस का।
और हमारी साँस में साँस आई, क्योंकि जल्लाद के हाथ
किसी और के संताप का मतलब था हमारे लिए राहत
और कचहरी के मैदान में लगा वो फांसी का चौखटा
कल सुबह के सूरज तक गिर जाएगा, चला जाएगा।
तो हमने उसे राह दे दी, और कोई नहीं बोला,
और जल्लाद के चोगे का सम्मान हमने किया।
2.
अगले दिन की सुबह के सूरज ने नर्मी से नीचे देखा
हमारे शांत शहर की छतों और गलियों को निरखा,
और सुबह की हवा में काला सा और कठोर
खड़ा था कचहरी के चौराहे में फांसी का पेड़
और जल्लाद वहीं अपने सामान्य लहजे में खड़ा था
पीले सन को अपने व्यस्त हाथों में दबा रखा था;
अपनी सीसे सी आँखों और शार्क जैसे जबड़े के साथ
और अपनी सर्व-ज्ञाता सी व्यवसायी सी मुद्रा के साथ
और हमने कराह के पूछा, "जल्लाद, क्या तुम्हारा काम
पूरा नहीं हुआ, कल उस परदेसी को करके तमाम?"
फिर हम चुप पड़ गए, और अचंभित खड़े रहे,
"अरे, फंदा थोड़े ही कसा गया था उसके लिए।"
वो हँँसा और हम सब पर एक नज़र दौड़ा गया:
"तुमने क्या सोचा कि मैं इतना झंझट करूंगा
एक आदमी की फांसी के लिए? ये तो है बस एक काम
जो मैं करता हूँ नई रस्सी को तानने को, भाई अन्जान।"
तब एक ने चिल्ला के कहा, "हत्या!" और एक चिल्लाया "शर्म!"
और फिर हम सबके बीच उतर आया जल्लाद होके कुछ गर्म
जाके उस व्यक्ति के पास, उसने कहा, "तुम लेते हो पक्ष,
उसका जिसके लिए बनाया गया है यह फांसी का वृक्ष?"
और उसने अपना हाथ उस व्यक्ति के हाथ पर रख दिया।
और तब डर ने चौंका कर हम सबको पीछे कर दिया!
और हमने उसे राह दे दी, और कोई नहीं बोला
और जल्लाद के चोगे का सम्मान हमने किया।
उस रात, डर से भरे अचरज से, हमने देखा
जल्लाद के उस चबूतरे का आकार बढ़ गया था
पोषित हो कर नाली के नीचे के खून से,
जड़ें जमा ली थीं वहाँ फांसी के पेड़ ने;
अब जो इतनी ऊँची थीं, या उससे ज़रा सा ज़्यादा थी,
जितनी कि सीढ़ियाँ जो कचहरी के दरवाज़े तक जाती थीं,
उतनी ही ऊँची जितनी कि लिखावट, या लगभग उतनी,
जो कचहरी की दीवार की आधी ऊँचाई पर लिखी थी।
3.
तीसरा जिसको वो ले गया - हम सबने सुना था -
वो एक सूदखोर था, और विधर्मी भी था।
"क्या," जल्लाद ने कहा "संबंध है तुम्हारा उससे
जिसको फांसी होनी है, और वो भी एक यहूदी?"
और हमने कराह के पूछा, "क्या यही है जिसने
वफ़ादारी से तुम्हारी खूब बढ़िया सेवा की है?"
जल्लाद मुस्करा कर बोला: "यह एक चतुर तकनीक है
जिससे हम फांसी की शहतीर की मज़बूती जाँचते हैं।"
चौथे व्यक्ति के व्यथित, इल्ज़ाम लगाते गीत ने
हमारे आराम को देर तक कड़ाई से खरोंचा था;
"और तुम्हें क्यों चिंता होगी," उसने हमसे पूछा था
"अभिशप्त के लिए - अभिशप्त और वो भी अश्वेत?"
पाँचवाँ। छठा। और हम फिर से कराहे, चीखे,
"जल्लाद, जल्लाद, क्या यही वो आदमी है?"
"यह एक तरकीब है," उसने कहा। "जो हम जल्लाद जानते हैं
तख्ते को ढीला करने की, जब तख्ता अटकने लग जाए।"
और इस तरह हम रुक गए, और तब से कुछ नहीं पूछा,
जबकि जल्लाद अपने खूनी हिसाब को बढ़ाता चला गया।
और दिन पर दिन निकले, रात पर रात निकलीं,
फांसी का पेड़ दानवाकार ऊँचाई तक बढ़ता चला गया।
चबूतरे की दीवारों का घेराव फैलता चला गया
यहाँ तक कि उन्होंने पूरे चौराहे को समा लिया;
और दानवाकार शहतीर, नीचे देखती हुई,
पूरे शहर पर अपनी छाया डालने लगी।
4.
तब शहर से होकर जल्लाद आया,
खाली गलियों से निकलता हुआ, और मेरा नाम बुलाया -
और मैंने आसमान को छूते हुए फांसी के पेड़ को देखा
और सोचा, "तो फिर कोई भी नहीं बचा
फांसी देने के लिए, तभी ये मुझे बुलाता है
फांसी के पेड़ को आखिर गिरा देने के लिए।"
तो मैं गया वहाँ मन में ले के अच्छी भली आस
जल्लाद के पेड़ और जल्लाद की रस्सी के पास
वो मुस्कराया जैसे उसके पास आया मैं
कचहरी के चौराहे पर सूने-शांत शहर में
और उसके व्यस्त हाथों में था लचीला, तना हुआ
सन के रेशों का बना पीला फंदा वही पहचाना हुआ
और उसने अपनी धुन में सीटी बजा कर तख्ते को परखा,
और तैयारशुदा तख्ता एक खटके के साथ नीचे जा गिरा -
और फिर डरावने आदेश की मुस्कान के साथ
मेरे हाथ के ऊपर उसने रख दिया अपना हाथ।
"तुमने मुझे छला है। जल्लाद!," मैं तब चिल्लाया,
"कि तुम्हारा चबूतरा और लोगों के लिए बना था ...
और मैं तुम्हारा वफ़ादार सेवक नहीं हूँ," मै कराहा,
"तुमने मुझसे झूठ बोला, जल्लाद। घृणित झूठ बोला!"
तब उसकी सीसे सी आँखों में एक चमक उग आई,
"तुमसे झूठ बोला? तुम्हें छला?", उसने कहा। "नहीं भाई।
बल्कि मैंने तो साफ़ जवाब दिया था और तुम्हें सच बताया था -
कि चबूतरा और किसी के नहीं बल्कि तुम्हारे लिए ही बना था।
क्योंकि तुम्हीं ने तो सबसे वफ़ादारी से मेरी सेवा की है
तब फिर काहे को तुम्हारी कायर उम्मीद?" कहा उसने
"और कहाँ हैं वे जो तुम्हारे साथ खड़े हो सकते थे
तुम्हारे कंधे से कंधा मिला कर सबके लाभ के लिए?"
"मृत," मैंने हल्के से कहा। और मधुरता से
जल्लाद ने मुझे सही किया "कत्ल कर दिए गए":
"पहले वो परदेस से आने वाला, फिर वो यहूदी ...
मैंने तो बस उतना किया जो तुमने मुझे करने दिया।"
उस शहतीर के नीचे जिसने आसमान को ढँक लिया था
कोई वहाँ उतना अकेला नहीं खड़ा हुआ होगा मेरे जितना
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| लेखक | विषय | संवाद | साभार | अनुवादक |
पहले वो आए साम्यवादियों के लिए
और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था
फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए
और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था
फिर वो यहूदियों के लिए आए
और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था
फिर वो आए मेरे लिए
और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था
