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भगत सिंह

Bhagat Singh

उसे यह फ़िक्र है हरदम

भगत सिंह

उसे यह फ़िक्र है हरदम,

नया तर्ज़े-जफ़ा क्या है?

हमें यह शौक देखें,

सितम की इंतहा क्या है?

दहर से क्यों खफ़ा रहें,

चर्ख का क्यों गिला करें,

सारा जहाँ अदू सही,

आओ मुकाबिला करें।

कोई दम का मेहमान हूँ,

ए-अहले-महफ़िल,

चरागे सहर हूँ,

बुझा चाहता हूँ।

मेरी हवाओं में रहेगी,

ख़यालों की बिजली,

यह मुश्त-ए-ख़ाक है फ़ानी,

रहे रहे न रहे।
 

रचनाकाल: मार्च 1931

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)