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पाब्लो नेरूदा

Pablo Neruda

रेल के सपने

पाब्लो नेरूदा

बिना रखवाली के स्टेशनों पर
सोती हुई रेलगाड़ियाँ
अपने इंजनों से दूर
सपनों में खोई थीं ।

भोर के वक़्त मैं दाख़िल हुआ
टहलता, हिचकिचाता
मानो भेदता कोई तिलिस्म
चारों ओर बिखरी थी यात्रा की मरती गंध
और मैं खोजता हुआ कुछ
डिब्बों में छूट गई चीज़ों के बीच ।
जा चुकी देहों की भीड़ में
निपट अकेला था मैं,
ठहरी थी रेलगाड़ी ।

हवा की सांद्रता
अवरोध की महीन पर्त थी
अधूरी रह गई बातों और
उगती बुझती उदासियों पर ।
गाड़ी में छूट गईं कुछ आत्माएँ,
जैसे चाभियाँ थीं बिन तालों की,
सीट के नीचे गिरी हुईं ।

फूलों के गुच्छे और मुर्गियों के सौदे से लदीं,
दक्षिण से आई औरतें
जो शायद मार डाली गई थीं,
जो शायद वापस लौटकर बिलखती भी रहीं थीं,
शायद बेकार चले गए थे सफ़र में खर्च उनके भाड़े
उनकी चिताओं की आग के साथ,
शायद मैं भी उनके ही साथ हूँ, उन्हीं के सफ़र में,

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)