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कविताएँ

शब्दों से कभी-कभी काम नहीं चलता

त्रिलोचन

शब्दों से कभी-कभी काम नहीं चलता


जीवन को देखा है

यहां कुछ और

वहां कुछ और

इसी तरह यहां-वहां

हरदम कुछ और

कोई एक ढंग सदा काम नहीं करता


तुम को भी चाहूं तो

छूकर तरंग

पकड़ रखूं संग

कितने दिन कहां-कहां

रख लूंगा रंग


अपना भी मनचाहा रूप नहीं बनता ।


('ताप के ताये हुए दिन' नामक संग्रह से )


(कविताकोश से साभार)

उस जनपद का कवि हूँ

त्रिलोचन

उस जनपद का कवि हूँ जो भूखा दूखा है,
नंगा है, अनजान है, कला--नहीं जानता
कैसी होती है क्या है, वह नहीं मानता
कविता कुछ भी दे सकती है। कब सूखा है
उसके जीवन का सोता, इतिहास ही बता
सकता है। वह उदासीन बिलकुल अपने से,
अपने समाज से है; दुनिया को सपने से
अलग नहीं मानता, उसे कुछ भी नहीं पता
दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँची; अब समाज में
वे विचार रह गये नही हैं जिन को ढोता
चला जा रहा है वह, अपने आँसू बोता
विफल मनोरथ होने पर अथवा अकाज में।
धरम कमाता है वह तुलसीकृत रामायण
सुन पढ़ कर, जपता है नारायण नारायण।


(कविताकोश से साभार)

भारतीय जनकवि का प्रणाम

नागार्जुन

गोर्की मखीम!
श्रमशील जागरूक जग के पक्षधर असीम!
घुल चुकी है तुम्हारी आशीष
एशियाई माहौल में
दहक उठा है तभी तो इस तरह वियतनाम ।
अग्रज, तुम्हारी सौवीं वर्षगांठ पर
करता है भारतीय जनकवि तुमको प्रणाम ।

गोर्की मखीम!
विपक्षों के लेखे कुलिश-कठोर, भीम
श्रमशील जागरूक जग के पक्षधर असीम!
गोर्की मखीम!

दर-असल'सर्वहारा-गल्प' का
तुम्हीं से हुआ था श्रीगणेश
निकला था वह आदि-काव्य
तुम्हारी ही लेखनी की नोंक से
जुझारू श्रमिकों के अभियान का...
देखे उसी बुढ़िया ने पहले-पहल
अपने आस-पास, नई पीढी के अन्दर
विश्व क्रान्ति,विश्व शान्ति, विश्व कल्याण ।
'मां' की प्रतिमा में तुम्ही ने तो भरे थे प्राण ।

गोर्की मखीम!
विपक्षों के लेखे कुलिश-कठोर, भीम
श्रमशील जागरूक जग के पक्षधर असीम!
गोर्की मखीम!


(कविताकोश से साभार)

जन-गण-मन

रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’

मैं भी मरूंगा
और भारत के भाग्य विधाता भी मरेंगे
लेकिन मैं चाहता हूं
कि पहले जन-गण-मन अधिनायक मरें
फिर भारत भाग्य विधाता मरें
फिर साधू के काका मरें
यानी सारे बड़े-बड़े लोग पहले मर लें
फिर मैं मरूं- आराम से
उधर चल कर वसंत ऋतु में
जब दानों में दूध और आमों में बौर आ जाता है
या फिर तब जब महुवा चूने लगता है
या फिर तब जब वनबेला फूलती है
नदी किनारे मेरी चिता दहक कर महके
और मित्र सब करें दिल्लगी
कि ये विद्रोही भी क्या तगड़ा कवि था
कि सारे बड़े-बड़े लोगों को मारकर तब मरा


(कुझ विचार ऐसे भी से साभार)

मुक्ति की आकांक्षा

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

 

चिड़िया को लाख समझाओ

कि पिंजड़े के बाहर

धरती बहुत बड़ी है, निर्मम है,

वहॉं हवा में उन्‍हें

अपने जिस्‍म की गंध तक नहीं मिलेगी।

यूँ तो बाहर समुद्र है, नदी है, झरना है,

पर पानी के लिए भटकना है,

यहॉं कटोरी में भरा जल गटकना है।

बाहर दाने का टोटा है,

यहॉं चुग्‍गा मोटा है।

बाहर बहेलिए का डर है,

यहॉं निर्द्वंद्व कंठ-स्‍वर है।

फिर भी चिड़िया

मुक्ति का गाना गाएगी,

मारे जाने की आशंका से भरे होने पर भी,

पिंजरे में जितना अंग निकल सकेगा, निकालेगी,

हरसूँ ज़ोर लगाएगी

और पिंजड़ा टूट जाने या खुल जाने पर उड़ जाएगी।


(कविताकोश से साभार)

हम तुम्हें मार देंगे

मनमोहन

 

भूखा मार देंगे

या खिला-खिला कर मार देंगे

हम तुम्हें मार देंगे


दूर रखकर

या पास बुलाकर

सामने से या पीछे से

अकेला करके

या किसी कबीले में खड़ा कर के

बटन दबाकर

या किसी क़रार पर दस्तख़त कर के

हम तुम्हें मार देंगे

ज़िन्दा जला कर मार देंगे

फूलों से दबाकर मार देंगे


हम तुम्हें अमर कर देंगे

और इस तरह तुम्हें मार देंगे


हम तुम्हें मार देंगे

और जीवित रखेंगे


एक दिन तुम पड़ोसी के मर जाने से ईर्ष्या करोगे

और अपने बचे रहने पर शर्म करोगे


तुम कहोगे कि मैं जल्द से जल्द मरना चाहता हूँ

और हम कहेंगे कि जल्दी क्या है


(कविताकोश से साभार)

हक दो

केदारनाथ सिंह

फूल को हक दो, वह हवा को प्यार करे,
ओस, धूप, रंगों से जितना भर सके, भरे,
सिहरे, कांपे, उभरे,
और कभी किसी एक अंखुए की आहट पर
पंखुडी-पंखुडी सारी आयु नाप कर दे दे-
किसी एक अनदेखे-अनजाने क्षण को
नए फूलों के लिए!
गंध को हक दो वह उडे, बहे, घिरे, झरे, मिट जाए,
नई गंध के लिए!
बादल को हक दो- वह हर नन्हे पौधे को छांह दे, दुलारे,
फिर रेशे-रेशे में हल्की सुरधनु की पत्तियां लगा दे,
फिर कहीं भी, कहीं भी, गिरे, बरसे, घहरे, टूटे-
चुक जाए-
नए बादल के लिए!
डगर को हक दो- वह, कहीं भी, कहीं भी, किसी
वन, पर्वत, खेत, गली-गांव-चौहटे जाकर-
सौंप दे थकन अपनी,
बांहे अपनी-
नई डगर के लिए!
लहर को हक दो- वह कभी संग पुरवा के,
कभी साथ पछुवा के-
इस तट पर भी आए- उस तट पर भी जाए,
और किसी रेती पर सिर रख सो जाए
नई लहर के लिए!
व्यथा को हक दो- वह भी अपने दो नन्हे
कटे हुए डैनों पर,
आने वाले पावन भोर की किरन पहली
झेल कर बिखर जाए,
झर जाए-
नई व्यथा के लिए!
माटी को हक दो- वह भीजे, सरसे, फूटे, अंखुआए,
इन मेडों से लेकर उन मेडों तक छाए,
और कभी न हारे,
(यदि हारे)
तब भी उसके माथे पर हिले,
और हिले,
और उठती ही जाए-
यह दूब की पताका-
नए मानव के लिए!


(कविताकोश से साभार)

जल्लाद

मॉरिस ऑग्डेन

1.
हमारे शहर में एक दफ़ा आया एक जल्लाद,
सोने और खून और आग की महक के साथ
और वो संकोच से हमारी गलियों में कुछ देर तक टहला,
और उसने कचहरी के चौराहे पर अपना चौखटा बनाया।

चबूतरा कचहरी के चौराहे के पास खड़ा था,
बस इतना चौड़ा जितना चौड़ा दरवाज़ा था;
चौखटा इतना ऊँचा, या उससे ज़रा सा ज़्यादा,
कचहरी के दरवाज़े की ऊपरी चौखट थी जितना।

और वो सोचता रहा, जब भी उसे मिला वक़्त,
कौन हो अपराधी, और क्या हो उसका ज़ुर्म
जिसका कि फैसला जल्लाद करे अपने बुने हुए सन
की पीली गाँठ से जो उसके व्यस्त हाथों में थी बंद।

और निर्दोष चाहे हम थे, पर डर से भर कर
हमने उसकी सीसे सी आँखों पर डाली नज़र
तब एक ने कराह के पूछा: "जल्लाद वो कौन है
जिसके लिए तुमने यह फांसी का पेड़ उगाया है?"

तब उसकी सीसे सी आँखों में एक चमक उग आई,
और उसने हमें जवाब की जगह एक पहेली थमा दी:
"जो मेरी सेवा करेगा सबसे बेहतर," उसने कहा,
"फांसी के इस पेड़ की रस्सी वही तो कमाएगा।"

और वो नीचे उतरा, और उसने अपना हाथ रखा
एक आदमी के कंधे पर जो था किसी और देस का।
और हमारी साँस में साँस आई, क्योंकि जल्लाद के हाथ
किसी और के संताप का मतलब था हमारे लिए राहत

और कचहरी के मैदान में लगा वो फांसी का चौखटा
कल सुबह के सूरज तक गिर जाएगा, चला जाएगा।
तो हमने उसे राह दे दी, और कोई नहीं बोला,
और जल्लाद के चोगे का सम्मान हमने किया।

2.
अगले दिन की सुबह के सूरज ने नर्मी से नीचे देखा
हमारे शांत शहर की छतों और गलियों को निरखा,
और सुबह की हवा में काला सा और कठोर
खड़ा था कचहरी के चौराहे में फांसी का पेड़

और जल्लाद वहीं अपने सामान्य लहजे में खड़ा था
पीले सन को अपने व्यस्त हाथों में दबा रखा था;
अपनी सीसे सी आँखों और शार्क जैसे जबड़े के साथ
और अपनी सर्व-ज्ञाता सी व्यवसायी सी मुद्रा के साथ

और हमने कराह के पूछा, "जल्लाद, क्या तुम्हारा काम
पूरा नहीं हुआ, कल उस परदेसी को करके तमाम?"
फिर हम चुप पड़ गए, और अचंभित खड़े रहे,
"अरे, फंदा थोड़े ही कसा गया था उसके लिए।"

वो हँँसा और हम सब पर एक नज़र दौड़ा गया:
"तुमने क्या सोचा कि मैं इतना झंझट करूंगा

700 बुद्धिजीवियों की एक तेल की टंकी से प्रार्थना

बर्तोल्त ब्रेख़्त

1

बिना न्योते के
हम आ पहुँचे हैं
700 (और बहुतेरे अभी राह पर हैं)
हर कहीं से, जहाँ अब हवा नहीं बहती है
चक्कियों से, जो पस्त पीसती जाती हैं, और
अलावों से, जिनके बारे में कहा जाता है
अब वहाँ कुत्ता भी मूतने नहीं जाता।


2

और हमने तुम्हें देखा
अचानक
ओ तेल की टंकी!


3

अभी कल ही तुम नहीं थी
लेकिन आज
बस तुम ही तुम हो।


4

जल्दी करो, लोगो!
उस डाल को काटने वाले, जिस पर तुम बैठे हो
कामगारो!
भगवान फिर से आ चुके हैं
तेल की टंकी के भेस में।


5

ओ बदसूरत!
तुमसे ख़ूबसूरत कोई नहीं।
चोट करो हम पर
ओ समझदार !
ख़त्म कर दो मैं की भावना!
हमें समूह बना डालो!
वैसा कतई नहीं, जैसा हम चाहते हैं :
बल्कि जैसा कि तुम चाहती हो।


6

तुम हाथीदाँत की नहीं बनी हो
आबनूस की भी नहीं, बल्कि
लोहे की!
लाजवाब! लाजवाब! लाजवाब!
तुम निरभिमान!


7

तुम अदृश्य नहीं
तुम अनंत नहीं !
तुम सात मीटर ऊँची हो।
तुम में कोई रहस्य नहीं
बल्कि तेल है।
और हमसे तुम्हारा नाता
भावनात्मक या दुर्बोध नहीं
बल्कि हिसाब के बिल के मुताबिक है।


8

घास क्या है तुम्हारे लिए?
तुम उस पर बैठती हो।
जहाँ कभी घास थी
अब तुम विराजमान हो, ओ तेल की टंकी!
और भावनाएँ तुम्हारे लिए
कुछ भी नहीं हैं!


9

इसलिए हमारी सुनो
और हमें चिंतन के पाप से मुक्ति दिलाओ।
बिजलीकरण के नाम पर
प्रगति और आंकड़ों के नाम पर।

रचनाकाल : 1927


मूल जर्मन भाषा से अनुवाद : उज्ज्वल भट्टाचार्य

अधिनायक वंदना

गोरख पाण्डेय

 

जन गण मन अधिनायक जय हे  !

जय हे हरित क्रांति निर्माता

जय गेहूँ हथियार प्रदाता

जय हे भारत भाग्य विधाता

अंग्रेज़ी के गायक जय हे ! जन...

जय समाजवादी रंग वाली

जय हे शांतिसंधि विकराली

जय हे टैंक महाबलशाली

प्रभुता के परिचायक जय हे ! जन...

जय हे ज़मींदार पूंजीपति

जय दलाल शोषण में सन्मति

जय हे लोकतन्त्र की दुर्गति

भ्रष्टाचार विधायक जय हे ! जन...

जय पाखंड और बर्बरता

जय तानाशाही सुन्दरता

जय हे दमन भूख निर्भरता

सकल अमंगलदायक जय हे ! जन...

(रचनाकाल : 1982)


(कविताकोश से साभार)


लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)