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असहमति और प्रतिरोध

अरुंधती रॉय के पक्ष में

भूपेन

28 अक्तूबर, 2010

 

लेखिका अरुधंती रॉय पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चलाने के लिए गृह मंत्रालय ने पुलिस को हरी झंडी दे दी है. अब हो सकता है कि अरुंधती पर मुक़दमा दर्ज हो जाए और उन्हें पकड़कर जेल में डाल दिया जाए. गृह मंत्रालय इस मामले में जिस तरह सक्रिय हुआ है उससे लगता है कि हमारा लोकतंत्र लगातार असहमति की आवाज़ों को दबाने में अपना बड़प्पन समझ रहा है और ‘राष्ट्र’ को बचाने के नाम पर अभिव्यक्ति की आज़ादी पर अंकुश लगा रहा है.

अरुंधती को कश्मीर की आज़ादी का समर्थन करने की वजह से देशद्रोही ठहराने की कोशिश की जा रही है. इसी महीने की इक्कीस तारीख़ को उन्होंने दिल्ली के मंडी हाउस में कश्मीरी नेता सैयद अली शाह गिलानी के साथ आज़ादी : द ऑनली वे (आज़ादी: एक ही रास्ता) नाम के एक सेमीनार में कश्मीरी लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार का समर्थन किया था. वे अपने इस पक्ष को पहले भी कई बार सार्जनिक कर चुकी हैं. गौरतलब है कि अरुंधती किसी भी आज़ादी का अंध-समर्थन नहीं करती हैं बल्कि वे कश्मीरियों का समर्थन करती हुईं न्याय के सार्वभौमिक सिद्धांतों की याद दिलाती हैं. वे कश्मीर की आज़ादी की बात कर रहे लोगों को सचेत करती हैं कि जो आज़ादी अपनी जनता को न्याय नहीं दिला सकती उसका कोई मतलब नहीं. इस तरह अरुंधती तमाम तरह की ग़ैरबराबरी से मुंह मोड़कर राष्ट्रीय एकता की वकालत करने वाली सरकार के साथ ही कश्मीर को इस्लामी राष्ट्र बनाने की ख़्वाहिश रखने वालों की तरफ़ से भी ‘ग़लत’ समझ लिए जाने के ख़तरों को उठाती हुई न्याय के पक्ष में बोलती हैं.


लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)