Increase |  Decrease |  Normal

Current Size: 100%

Share this
Syndicate content

असहमति और प्रतिरोध

उस्‍ताद सरकार की जमूरी अदालतों को बंद करो! बंद करो!

विनीत कुमार

वो दास्तानगोई विनायक सेन के लिए उठी एक आवाज थी

आज से करीब ढाई साल पहले 16 मई 2008 को महमूद फारूकी ने विनायक सेन की गिरफ्तारी के खिलाफ होनेवाले कार्यक्रम में दास्तानगोई की थी। साथ में दानिश भी थे। उस दिन इन दोनों का मिजाज बिल्कुल अलग था। माहौल के मुताबिक एक ही साथ कई मिले-जुले भाव। रवींद्र भवन, साहित्य अकादमी परिसर में खचाखच लोग भरे थे। खुले में देर शाम तक लोग टस से मस नहीं हुए। आज उस शाम और दास्तानगोई का जिक्र फिर से करना चाहता हूं। वहां से लौटकर मैंने जो पोस्ट लिखी, एक बार फिर से साझा करना चाहता हूं। नये सिरे से इसे आज फिर पढ़ना आपको जरूरी लगे, ऐसी उम्मीद है। इस नीयत और भरोसे के साथ कि अब किसी एक शख्स और मुद्दे के साथ छिटपुट तरीके से प्रतिरोध जाहिर करने से कहीं ज्यादा जरूरी है, अभिव्यक्ति की आजादी सुनिश्चित न किये जाने तक लड़ते रहना, चीजों को अपनी कोशिशों से दरकाते रहना : विनीत कुमार

महमूद फारूकी साहब ने कल रात जब दास्तानगोई में अय्यारी और जादूगरी का किस्सा सुनाया, जिसमें चारों तरफ से सुरक्षा के नाम पर प्रहरी के घेर लेने पर जुडूम-जुडूम की आवाज आती थी तो मुझे बस एक ही बात समझ में आयी कि -

यदि देश की सुरक्षा यही होती है कि बिना जमीर होना जिंदगी के लिए शर्त बन जाए
आंख की पुतली में ‘हां’ के सिवाय कोई भी शब्द अश्लील हो
और मन बदकार पलों के सामने दंडवत झुका रहे
तो हमें देश की सुरक्षा से खतरा है
- पाश


दास्‍तानगोई पेश करते हुए महमूद फारूकी

फारूकी साहब की दास्तानगोई में भी कुछ ऐसा ही हो रहा था, जहां जादूगर अय्यारों को कुछ इस तरह की सुरक्षा दे रहे थे कि अय्यार तबाह-तबाह हो गये। लेकिन ये जादूगर एक सुरक्षित मुल्क बनाने पर आमादा थे। फारूकी साहब के हिसाब से वो मुल्क-ए-कोहिस्तान बनाना चाह रहे थे। जहां के लिए सबसे खतरनाक शब्द था – आजादी।


लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)