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असहमति और प्रतिरोध

करीब पच्चीस साल पहले हमारे तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने हमें याद दिलाना शुरु किया था कि भारत बहुत जल्दी इक्कीसवी में पहुंचने वाला है। हमें इक्कीसवीं सदी में जाना है। यह बात करते करते हम इक्कीसवीं सदी मे पहुंच गए और इस नई सदी के दस साल भी बीत गए। इक्कीसवीं सदी का भारत कहां है, कैसा है, कैसा बनने वाला है, कहां पहुँचने वाला है- यह एक विशद विषय है। यहां उसके कुछ पहलुओं पर विचार करेंगें।

निश्चित ही नई सदी में बहुत सारी चीज़ें काफी चमकदार दिख रहीं है। बीस साल या पचास साल पहले के मुकाबले भारत काफी आगे दिखाई दे रहा है। कई तरह की क्रांतियां हो रही है। कम्प्यूटर क्रांति चल रही है। मोबाईल क्रांति भी हो गई है - अब गरीब आदमी की जेब में भी एक मोबाइल मिलता है। ऑटोमोबाईल क्रांति चल रही है। एक ज़माना था जब स्कूटर के लिए नंबर लगाना पड़ता था, वह ब्लैक में मिलता था। कारों के बस दो ही मॉडल थे – एम्बेसेडर और फिएट। अब किसी भी शोरुम में जाइए, मनपसंद मॉडल की मोटरसाइकिल या कार उठा लाइए। नित नए मॉडल बाज़ार में आ रहे है। सड़कों पर कारें ही कारें दिखाई देती हैं।  सड़कें फोरलेन-सिक्सलेन बन रही है। हाईवे, एक्सप्रेसवे की चिकनी सड़कों पर गाड़ियां हवा से बात करती हैं। ‘फोरलेन‘ शब्द तो बच्चे-बच्चे की जुबान पर चढ़ गया है। इसी तरह शिक्षा में भी क्रांति आ गई है। पहले इंजीनियरिंग, मेडिकल, बी.एड. कॉलेज गिनती के हुआ करते थे। आज एक-एक शहर में दस-दस कॉलेज है और उनमें सीटें खाली रहती है। पहलें चुनिंदा कॉन्वेंट स्कूल हुआ करते थे,  अब इंग्लिश मिडियम स्कूल गली-गली, मोहल्ले में खुल गए है। 

दिल लगाई और सताई - 5

हावर्ड ज़िन

[हावर्ड ज़िन रचित 'ए पीपुल्स हिस्टरी ऑफ़ द यूनाइटेड स्टेट्स' (संयुक्त राज्य का जनवादी इतिहास) के छठे अध्याय 'द इंटिमेटली आप्रेस्ड' के अनुवाद का पाँचवाँ भाग। अनुवादक: लाल्टू]

कई महिला इतिहासकारों ने हाल में यह लिखा है कि अमरीकी इंकलाब में श्रमिक वर्गों से आई औरतों के अवदान को नज़र-अंदाज़ किया गया है। ऐसा नेताओं की संभ्रांत पत्नियों (डॉली मैडिसन, मार्था वॉशिंगटन, ऐबिगेल ऐडम्स) (क्रमशः जेम्स मैडिसन, जॉर्ज वॉशिंगटन और सैमुएल ऐडमंड्स की पत्नियाँ - इन तीनों पुरुष नेताओं का अमरीकी आज़ादी के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान है।) के साथ नहीं हुआ। 'डर्टी कैट' के नाम से प्रसिद्ध मार्गरेट कोर्बिन, डेबोरा सैंप्सन गार्नट और 'मॉली पिचर' ज़मीन से जुड़ी निम्नवर्गीय औरतें थीं, हालांकि इतिहासकारों ने इन्हें संभ्रांत महिलाओं जैसी सुकोमल जताने की कोशिश की है। लड़ाई के अंतिम वर्षों में जिन गरीब औरतों ने शिविरों में जाकर मदद की और लड़ाई में हिस्सा लिया, उन्हें वेश्याएँ कहा गया, जबकि वैली फ़ोर्ज में अपने पति से मिलने जाती मार्था वॉशिंगटन को इतिहास में विशेष जगह मिली।


लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)