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हंस

भारत को विश्र्व का सबसे पसंदीदा लोकतंत्र बनाना

परमाणु करार पर हुई पूरी नाटकबाजी और तमाशे के दौरान यह भी हुआ-संसद में वह बात सबके सामने ला दी गयी, जो ढंके छुपे अरसे से होती रही है। हम संसद के प्रति इसलिए आभारी हैं की उसने एक बार फिर, और इस बार बिना किसी छिपाव के, अपने को ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर दिया। हमने लोकतंत्र को एक बार फिर एक बेहद मंहगे तमाशे के रूप में घटित होते देखा। एक ऐसा लोकतंत्र, जिसमे देश को गुलामी की कुछ और सीढियां चढानेवाले समझौते पर उस देश की तथाकथित सर्वोच्च संस्था-ख़ुद संसद को ही कुछ कहने-करने का अधिकार नहीं है। और दूसरी बात यह की, भले संसद को कुछ करने का अधिकार भी होता, फिर भी क्या एक ऐसी व्यवस्था स्वीकार्य हो सकती है, जिसमें वोट खरीद लिए जाते हों और इस आधार पर संसद चलती हो? इस पर आगे भी कुछ आयेगा, अभी हंस के अप्रैल अंक में छपे अरुंधती राय के इंटरव्यू, जिसे पुण्य प्रसून वाजपेयी ने लिया है।

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)