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सरफराज़

Sarfaraz

तस्लीमा नसरीन तथा अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता

अरुंधती रॉय

13 फरवरी, 2008

मैं चाहूंगी कि इस मुद्दे पर ग़ौर करते समय हम विशेष सतर्कता बर्तें। ख़ास कर तस्लीमा नसरीन के मुद्दे को हमें एकतरफा लेन्स अर्थात् केवल 'धार्मिक कट्टरवाद' तथा धर्म-निरपेक्ष उदारवाद के बीच टकराव के रूप में नहीं देखना चाहिए। हालांकि स्वंय तस्लीमा नसरीन ने भी इस प्रकार के दृष्टिकोण को प्रतिपादित किया है। अपने वेबसाइट में एक जगह वह लिखती हैं - 'मानवजाति को एक अनिश्चित भविष्य का सामना करना पड़ रहा है - विशेष रूप से टकराव दो अत्यंत अलग विचारधाराओं, धार्मिक कट्टरवाद तथा धर्मनिरपेक्षता के बीच है'। मेरे विचार में यह टकराव दरअसल बौद्धिक और तार्क

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)