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रियाज़-उल-हक़

Reyaz-ul-Haque

क्या हमारा लोकतंत्र आदिवासियों को न्याय देगा?

ग्लैडसन डुंगडुंग

ऑपरेशन ग्रीन हंट की आंच भले दिल्ली-मुंबई में बैठे लोगों तक नहीं पहुंच रही हो, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि यह आग किसी को झुलसा नहीं रही. देश के संसाधनों और जमीन को छीन कर देशी-विदेशी कंपनियों के हवाले करने के लिए और इसका विरोध करनेवाली जनता का प्रतिरोध तोड़ने के लिए चलाए जा रहे इस ऑपरेशन ने किसी तरह देश के सबसे गरीब लोगों के जीवन को नारकीय बना दिया है और किस तरह यह लोकतंत्र की चमकदार लेकिन भ्रामक बातों की कलई खोल रहा है, ग्लैडसन डुंगडुंग की यह खोजपरक रिपोर्ट. मूलतः अंगरेजी में प्रकाशित.

13 जून 2010 को झारखंड के 12 मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की यात्रा सूर्योदय से पहले ही शुरू हो गयी थी। हमने सुना था कि लातेहार के बरवाडीह प्रखंड के लादी गांव की एक खरवार आदिवासी महिला, पुलिस और माओवादियों के बीच हुई मुठभेड़ की शिकार हो गयी। उस महिला का नाम जसिंता था। वह सिर्फ 25 साल की थी। गांव में अपने पति और तीन छोटे-छोटे बच्चों के साथ खुशहाल जिंदगी बिता रही थी इसलिए हम घटना की हकीकत जानना चाहते थे। हम जानना चाहते थे कि क्या वह माओवादी थी?

सबसे महत्वपूर्ण बात जो हम जानना चाहते थे, वह यह था कि किस परिस्थिति में सरकारी बंदूक ने उससे जीने का हक छीन लिया और सूर्योदय से पहले ही उसके तीन छोटे-छोटे बच्चों के जीवन को अंधेरे में डाल दिया गया? हम यह भी जानना चाहते थे कि इस अपराध के बाद राज्य की क्या भूमिका है? और निश्चित तौर पर हम यह भी जानना चाहते थे कि क्या जसिंता के तीन बच्चे हमारे बहादुर जवानों के बच्चों के तरह ही मासूम हैं?

सूर्योदय होते ही हमारे फैक्‍ट फाइडिंग मिशन का चारपहिया घूमना शुरू हो गया। जेठ की दोपहरी में हमलोग चिदंबरम के ‘रेड कॉरिडोर’ में घूमते रहे। शायद यहां के आदिवासियों ने ‘रेड कॉरिडोर’ का नाम भी नहीं सुना होगा और निश्चित तौर पर वे इस क्षेत्र को ‘रेड कॉरिडोर’ की जगह ‘आदिवासी कॉरिडोर’ कहना पसंद करेंगे। जो भी हो, इतना घूमने के बाद भी हम लोगों ने माओवादियों को नहीं देखा। लेकिन हमने जला हुआ जंगल, पेड़ और पतियां देखी। माओवादियों के खिलाफ ऑपरेशन चलाते समय अर्द्धसैनिक बलों ने हजारों एकड़ जंगल को जला दिया है। शायद वे माओवादियों का शिकार तो नहीं कर पाये होंगे, लेकिन उन्होंन खुबसूरत पौधे, जड़ी-बूटी, जंगली जानवर, पक्षी और निरीह कीट-फतंगों को जलाकर राख कर दिया है। उन्होंने जंगली जानवर, पक्षी और हजारों कीट-फतंगों का घर जला डाला है। अगर यही काम यहां के आदिवासी करते तो निश्चित तौर पर वन विभाग उनके खिलाफ वन संरक्षण अधिनियम 1980 और वन्यजीवन संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत कार्रवाई करता।

अरुंधती ने सिर्फ इतना ही नहीं कहा था

वरवर राव

28 अक्टूबर 2010

कश्मीर की आज़ादी के पक्ष में बोलने को देशद्रोह कहने वाले अरुंधति राय की गिरफ़्तारी की मांग कर रहे हैं. लेकिन, जैसा अरुंधति ने खुद कहा है, वे यह आवाज़ बुलंद करनेवाली अकेली नहीं हैं. कश्मीर ही नहीं, लाखों आवाजें भारत और भारत से बाहर भी उठ रही हैं जो यह मांग कर रही हैं की कश्मीरियों के आत्मनिर्णय के अधिकार का सम्मान किया जाये. उन्हें आज़ादी दी जाये. लाखों लोगों को बर्बर फौजी ताकत के बल पर आधी सदी से भी ज्यादा समय तक आपने कब्ज़े में रखना देशप्रेम कैसे हो सकता है?

तरस आता है उस देश पर जो इंसाफ की मांग करनेवालों को जेल भेजना चाहता है

अरुंधति रॉय

26 अक्टूबर 2010

[कश्मीर के बारे में कही गई अपनी बातों के लिए लेखक अरुंधती रॉय पर भारत में 'राजद्रोह' के आरोप का अंदेशा है। इन भाषणों का फ़िलहाल दिल्ली पुलिस विश्लेषण कर रही है। इस धमकी के बारे में उनका जवाब, जो श्रीनगर से जारी किया गया, नीचे दिया जा रहा है। ]

विद्रोह के केंद्र में दिन और रातें

जाने-माने मानवाधिकार कार्यकर्ता और ईपीडब्ल्यू के सलाहकार संपादक गौतम नवलखा तथा स्वीडिश पत्रकार जॉन मिर्डल कुछ समय पहले भारत में माओवाद के प्रभाव वाले इलाकों में गए थे, जिसके दौरान उन्होंने भाकपा माओवादी के महासचिव गणपति से भी मुलाकात की थी. इस यात्रा से लौटने के बाद गौतम ने यह लंबा आलेख लिखा है, जिसमें वे न सिर्फ ऑपरेशन ग्रीन हंट के निहितार्थों की गहराई से पड़ताल करते हैं, बल्कि माओवादी आंदोलन, उसकी वजहों, भाकपा माओवादी के काम करने की शैली, उसके उद्देश्यों और नीतियों के बारे में भी विस्तार से बताते हैं.

 

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)