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अमिताभ त्रिपाठी

ट्यूनीशिया में उथल पुथल

डैनियल पाइप्स

23 वर्ष तक सत्ता में रहने के बाद ट्यूनीशिया के शक्तिशाली व्यक्ति 74 वर्षीय जाइन एल अबीदीन बेन अली द्वारा अचानक और अव्याख्यायित ढंग से अपना देश छोडने की इस घट्ना का मध्य पूर्व और मुस्लिम विश्व के लिये दूरगामी परिणाम होने वाला है। जैसा कि इजिप्ट के एक विश्लेषक ने लिखा है, " प्रत्येक अरब नेता ट्यूनीशिया को भय से देख रहा है और प्रत्येक अरब निवासी ट्यूनीशिया को आशा और एकजुट्ता के साथ देख रहा है"। मैं इसे दोनों ही भावनाओं से देख रहा हूँ।

1970 तक स्वतंत्रता के पहले युग में अरब भाषी देशों में जल्दी जल्दी सरकारों को उखाड फेंका जाता था जब कि असंतुष्ट कर्नलों के राजधानी में प्रवेश करने की सूचना आती थी जो कि राष्ट्रपति के महल को घेर लेते थे साथ ही रेडियो स्टेशन भी और तत्काल एक नयी सत्ता की घोषणा कर देते थे। सीरिया में तो अकेले 1949 में ही तीन तख्ता पलट हुए।

समय के साथ शासन को भी स्वयं को सुरक्षित करना आ गया और उन्होंने खुफिया सेवाओं की चुस्ती , परिवार और कबीलों पर निर्भरता तथा उत्पीडन सहित अन्य तरीकों का प्रयोग कर ऐसा किया। चार दशक तक एक स्थिरता रही जो मजबूरी की स्थिरता थी। इसके कुछ ही दुर्लभ अपवाद रहे ( 2003 में इराक, गाज़ा में 2007) जब शासन का तख्ता पलट हुआ यहाँ तक कि ( 1985 में सूडान में ) नागरिक विद्रोह की मह्त्वपूर्ण भूमिका है।

यदि हम देखें तो सर्वप्रथम अल जजीरा ने अपने इस चयनित विषय पर अरब का ध्यान अत्यंत व्यापक रूप से खींचा और उसके बाद इंटरनेट ने। अल जजीरा की अत्यंत व्यापक और सामयिक सूचना के साथ इंटरनेट ने भी अनेक असाधारण गोपनीय रहस्य खोले। ( अभी हाल का विकीलीक्स का अमेरिका का कूट्नीतिक केबल का ढेर) इसके साथ ही इसकी भाँति के ही फेसबुक और ट्वीटर भी। इन सभी शक्तियों ने एक साथ ट्यूनीशिया में दिसम्बर महीने में इंतिफादा आरम्भ किया और अत्यन्त शीघ्र ही एक तानाशाह को बाहर का रास्ता दिखा दिया।

यदि एक ओर मताधिकार से वंचित लोगों द्वारा अपने सुस्त, क्रूर और लोभी शासक को सत्ताच्युत करने के लिये उनकी प्रशंसा करनी चाहिये तो वहीं वहीं इस पूरी उथल पुथल के इस्लामवादी परिणामों के प्रति भी सचेत रहने की आवश्यकता है।

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)