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अनिल एकलव्य

Anil Eklavya

भारत में सामूहिक बलात्कार के आरोपियों के विरुद्ध हत्या का मामला दर्ज, प्रदर्शनकारियों का महिलाओं के लिए व्यापक अधिकारों पर ज़ोर

भारत में पांच पुरुषों के विरुद्ध एक चलती बस में एक 23 वर्षीय छात्रा के अपहरण, सामूहिक बलात्कार और हत्या के आरोप में औपचारिक रूप से मामला दर्ज किया गया है। 16 दिसंबर के बलात्कार के दौरान इस महिला  का शरीर इतनी बुरी तरह विकृत हो गया था कि उसे आंतों के प्रत्यारोपण की जरूरत थी, लेकिन अंततः गंभीर आंतरिक चोटों के कारण उसका जीवन नहीं बचाया जा सका। "मुझे लगता है कि यह एक लंबे समय से संचित गुस्से और आक्रोश का असर था," भारत में यौन हिंसा के खिलाफ विरोध प्रदर्शन की मुख्य आयोजकों में से एक, अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला संघ की कविता कृष्णन का कहना है। "इस मामलें में यह सब फट पड़ा, शायद इसलिए कि उसके साथ ऐसा इतनी मामूली दैनिक गतिविधि के दौरान हुआ: वह केवल अपने दोस्त के साथ एक फिल्म देखने के बाद घर जाने के लिए एक बस में चढ़ी थी। और मुझे लगता है कि इस बात ने हर एक के मानस को छू लिया क्योंकि हर कोई उसकी जगह अपने को रख कर देख सकता था। मुझे लगता है कि उन सबने इस अनाम व्यक्ति के साथ एक गहरा संबंध महसूस किया।" सामूहिक बलात्कार के इस मामले ने भारत में यौन हिंसा के अन्य मामलों पर प्रकाश डाला है, जहां हर 20 मिनट में एक महिला के साथ बलात्कार किया जाता है, राष्ट्रीय अपराध रजिस्ट्री के अनुसार। "मुझे लगता है हमें उऩ सब बदलावों पर भी नज़र डालनी पड़ेगी जो कि विभिन्न प्रकार की सामाजिक और सांस्कृतिक ताकतों के कारण हो रहे हैं - वैश्वीकरण, लोगों का एक जगह से दूसरी जगह जाना, दिखावटी उपभोग, उन सब चीज़ों का मीडिया में व्यापक प्रदर्शन जो इतनी आसानी से उपलब्ध हैं," एलोरा चौधरी, बोस्टन के मैसाचुसेट्स विश्वविद्यालय में महिलाओं के अध्ययन की एसोसिएट प्रोफेसर, का मानना है। "ये सब के सब, मुझे लगता है, और खास तौर पर इन सब विभिन्न प्रकार की ताकतों तथा लैंगिक गतिकी के परस्पर संघर्ष के चलते शहरी क्षेत्रों में हो रहे परिवर्तनों  से लैंगिक गतिकी में, स्त्री-पुरुष संबंधों में तरह-तरह के बदलाव आ रहे हैं।" [प्रतिलेख शामिल है]

अतिथि:

कविता कृष्णन, अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोसिएशन की सचिव और भारत में यौन हिंसा के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के मुख्य आयोजकों में से एक।

एलोरा चौधरी, बोस्टन में मैसाचुसेट्स विश्वविद्यालय में महिलाओं के अध्ययन की एसोसिएट प्रोफेसर।

साहित्य और सर्वसत्तावाद

जॉर्ज ऑर्वेल

मैंने अपने पहले संभाषण में कहा था कि यह एक आलोचक युग नहीं है। यह पक्षधरता का युग है और तटस्थता का नहीं, एक ऐसा युग जिसमें खास तौर से बहुत मुश्किल है किसी ऐसी किताब में साहित्यिक उत्कृष्टता देखना जिसके निष्कर्षों से आप असहमत हैं। राजनीति ने - अपने सबसे व्यापक अर्थ में - साहित्य में घुसपैठ कर ली है, इस हद तक जितना कि आम तौर पर नहीं होता, और इससे वह संघर्ष हमारी चेतना में सतह पर ऊपर आ गया है जो हमेशा व्यक्ति और समुदाय के बीच चलता रहता है। जब हम अपने जैसे समय में पूर्वाग्रह रहित ईमानदार आलोचना करने की मुश्किलों पर गौर करते हैं. सिर्फ़ तभी हमें संपूर्ण साहित्य के ऊपर मंडराते खतरे की प्रकृति का अंदाज़ा लगना शुरू हो पाता है।

हम ऐसे युग में रह रहे हैं जिसमें स्वायत्त व्यक्ति का अस्तित्व ही खत्म होता जा रहा है - या शायद हमें कहना चाहिए, जिसमें व्यक्ति का अपने स्वायत्त होने का भ्रम दूर हो जा रहा है। अब, साहित्य के बारे में हम जो कुछ भी कहते हैं, और (सबसे बढ़ कर) जो भी कुछ हम आलोचना के बारे में कहते हैं, उस सब में हम सहज भाव से स्वायत्त व्यक्ति का अस्तित्व स्वयंसिद्ध मान के ही चलते हैं। आधुनिक यूरोप का पूरा का पूरा साहित्य - मैं पिछली चार सदियों के इतिहास की बात कर रहा हूँ - बौद्धिक ईमानदारी की अवधारणा पर निर्मित है, या, अगर आप चाहें तो इसे शेक्सपियर की उक्ति, 'स्वयं के प्रति सच्चे रहो', से अभिव्यक्त कर सकते हैं। पहली चीज़ जो हम लेखक से मांगते हैं वह ये है कि वो झूठ नहीं बोलेगा, कि वो वही कहेगा जो वह सच में सोचता है, सच में महसूस करता है। किसी भी कलाकृति के बारे में जो सबसे बुरी बात हम कह सकते हैं वो यह है कि यह निष्ठारहित (इनसिन्सियर) है। और यह बात रचनाशील साहित्य से भी ज़्यादा आलोचना के लिए सच है, क्योंकि रचनाशील साहित्य में एक हद तक बनावट और वैचित्र्य, यहाँ तक कि एक हद तक सीधी-सपाट बकवास भी हो सकती है, औऱ उससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता जब तक कि लेखक मूल रूप से निष्ठावान (सिन्सियर) है। ['सिन्सियर' शब्द का अनुवाद हिन्दी में पता नहीं क्यों बहुत मुश्किल है - अनु.]। आधुनिक साहित्य सारतः एक व्यक्तिगत चीज़ है। या तो यह एक व्यक्ति की सोच और भावनाओं की सच्ची अभिव्यक्ति है, या फिर यह कुछ नहीं है।

जल्लाद

मॉरिस ऑग्डेन

1.
हमारे शहर में एक दफ़ा आया एक जल्लाद,
सोने और खून और आग की महक के साथ
और वो संकोच से हमारी गलियों में कुछ देर तक टहला,
और उसने कचहरी के चौराहे पर अपना चौखटा बनाया।

चबूतरा कचहरी के चौराहे के पास खड़ा था,
बस इतना चौड़ा जितना चौड़ा दरवाज़ा था;
चौखटा इतना ऊँचा, या उससे ज़रा सा ज़्यादा,
कचहरी के दरवाज़े की ऊपरी चौखट थी जितना।

और वो सोचता रहा, जब भी उसे मिला वक़्त,
कौन हो अपराधी, और क्या हो उसका ज़ुर्म
जिसका कि फैसला जल्लाद करे अपने बुने हुए सन
की पीली गाँठ से जो उसके व्यस्त हाथों में थी बंद।

और निर्दोष चाहे हम थे, पर डर से भर कर
हमने उसकी सीसे सी आँखों पर डाली नज़र
तब एक ने कराह के पूछा: "जल्लाद वो कौन है
जिसके लिए तुमने यह फांसी का पेड़ उगाया है?"

तब उसकी सीसे सी आँखों में एक चमक उग आई,
और उसने हमें जवाब की जगह एक पहेली थमा दी:
"जो मेरी सेवा करेगा सबसे बेहतर," उसने कहा,
"फांसी के इस पेड़ की रस्सी वही तो कमाएगा।"

और वो नीचे उतरा, और उसने अपना हाथ रखा
एक आदमी के कंधे पर जो था किसी और देस का।
और हमारी साँस में साँस आई, क्योंकि जल्लाद के हाथ
किसी और के संताप का मतलब था हमारे लिए राहत

और कचहरी के मैदान में लगा वो फांसी का चौखटा
कल सुबह के सूरज तक गिर जाएगा, चला जाएगा।
तो हमने उसे राह दे दी, और कोई नहीं बोला,
और जल्लाद के चोगे का सम्मान हमने किया।

2.
अगले दिन की सुबह के सूरज ने नर्मी से नीचे देखा
हमारे शांत शहर की छतों और गलियों को निरखा,
और सुबह की हवा में काला सा और कठोर
खड़ा था कचहरी के चौराहे में फांसी का पेड़

और जल्लाद वहीं अपने सामान्य लहजे में खड़ा था
पीले सन को अपने व्यस्त हाथों में दबा रखा था;
अपनी सीसे सी आँखों और शार्क जैसे जबड़े के साथ
और अपनी सर्व-ज्ञाता सी व्यवसायी सी मुद्रा के साथ

और हमने कराह के पूछा, "जल्लाद, क्या तुम्हारा काम
पूरा नहीं हुआ, कल उस परदेसी को करके तमाम?"
फिर हम चुप पड़ गए, और अचंभित खड़े रहे,
"अरे, फंदा थोड़े ही कसा गया था उसके लिए।"

वो हँँसा और हम सब पर एक नज़र दौड़ा गया:
"तुमने क्या सोचा कि मैं इतना झंझट करूंगा

बिनायक सेन का मुकद्दमा

अरुंधती रॉय

आई बी एन लाइव पर लिए गए साक्षात्कार का अनुवाद

30 दिसंबर, 2010

[बिनायक सेन के मुकद्दमे ने उस नागरिक समाज के सामने बहुत से सवाल खड़े कर दिए हैं जिसका मानना है कि भारतीय जनतंत्र में - जिसे कि अपने विश्व में सबसे बड़े होने पर गर्व है - असहमति की जगह सिकुड़ती जा रही है। राज्य ने बहस और असहमति को देशद्रोह के घेरे में बांध लेने की प्रथा चला दी है। लेखक-कार्यकर्ता अरुंधती रॉय ने हाल में कश्मीर पर अपने बयान से देशद्रोह पर बहस शुरू कर दी थी। यहाँ प्रस्तुत है बिनायक सेन को कथित रूप से माओवादियों से संपर्क रखने के लिए उम्र कैद दिए जाने के बाद अरूंधती का एक साक्षात्कार। उनसे साक्षात्कार रूपश्री नंदा ने लिया था]
 
जब आपने सुना कि बिनायक सेन तथा दो अन्य लोगों को देशद्रोह के आरोप में उम्र कैद की सज़ा दी गई है तो आपकी सबसे पहली प्रतिक्रिया क्या थी?
 
मुझे यह तो उम्मीद नहीं थी कि फैसला न्यायपूर्ण होगा, पर अन्याय की हद देख कर मैं अचंभित थी। एक तरह से, ऐसा लगता है जैसे न्यायालय में प्रस्तुत प्रमाणों तथा फैसले का एक-दूसरे से कोई लेना-देना नहीं था। मेरी प्रतिक्रिया थी कि यह एक लिहाज से एक घोषणा थी ... यह फैसला नहीं था बल्कि अपनी मंशाओं की घोषणा थी, यह एक संदेश था और दूसरों के लिए एक चेतावनी थी। तो यह दो तरह से काम करता है। चेतावनी को ध्यान में लिया जाएगा। मेरे ख्याल से जिन लोगों ने इस फैसले को सुनाया उन्हें यह अंदेशा नहीं था कि यह लोगों को इस हद तक आक्रोश में एकजुट कर देगा।
 
आपको न्यायपूर्ण फैसले की उम्मीद क्यों नहीं थी?

लॉटरी

शर्ली जैकसन

जून 27 की सुबह आसमान साफ़ था और धूप छाई हुई थी, ठंडे इलाके में गर्माहट से भरी; हर तरफ़ फूल खिले हुए थे और घास हरियाली से भरपूर थी। गाँव के लोग चौपाल में इकट्ठे होने लगे थे, पोस्ट ऑफ़िस और बैंक के बीच, दस बजे के आस-पास; कुछ कस्बों में तो इतने लोग थे कि लॉटरी को पूरा होने में दो दिन लगते थे और इसलिए शुरुआत 2 जून को करनी पड़ती थी। लेकिन क्योंकि इस गाँव में केवल तीन एक सौ लोग ही थे, पूरी लॉटरी में दो घंटे से भी कम वक़्त लगता था, यानी अगर दस बजे सुबह शुरुआत की जाए तो काम पूरा करके घर पहुँच कर दोपहर का खाना खाने के लिए पर्याप्त समय बचता था।

बच्चे तो, जाहिर है, सबसे पहले पहुँच चुके थे। स्कूल की गर्मियों की छुट्टियाँ अभी शुरू ही हुई थीं, और छुटकारे के भाव में अभी कुछ बेचैनी मिली हुई थी; उधम चालू करने से पहले अभी उनके कुछ देर शांति से साथ खड़े रहने की संभावना होती थी। और उनकी बातें अब भी कक्षा तथा अध्यापक की, किताबों तथा डाँट-फ़टकार की थीं। बॉबी मार्टिन ने तो पहले से ही अपनी जेबें पत्थरों से भर ली थीं, और बाकी लड़कों ने भी जल्दी ही वैसा ही किया, सबसे चिकने और गोल पत्थरों को चुन-चुन कर; बॉबी और हैरी जोन्स और डिकी डेलाक्रुआ - गाँव वाले इस नाम को "डेलाक्रॉय" बोलते थे - ने होते-होते पत्थरों का एक बड़ा सा ढेर चौपाल के एक कोने में बना लिया था और अन्य लड़कों के धावे से उसके बचाव के लिए तैयार खड़े थे। लड़कियाँ अलग खड़ी थीं, आपस में बात करते हुए, अपने पीछे देखते हुए या अपने बड़े भाइयों या बहनों का हाथ पकड़े हुए।

वे जवाहरलाल नेहरू पर भी मृत्योपरांत मामला चला सकते हैं

अरुंधती रॉय

30 नवंबर, 2010

न्यायालय द्वारा आज के उस आदेश के बारे में, जिसमें दिल्ली पुलिस को मेरे खिलाफ़ राज्य के विरुद्ध युद्द चलाने के लिए एफ़ आई आर दर्ज करने का निर्देश दिया गया है, मेरी प्रतिक्रिया यह है: शायद उन्हें जवाहरलाल नेहरू के खिलाफ़ भी मृत्योपरांत मामला दर्ज करना चाहिए।

कश्मीर के बारे में उन्होंने यह सब कहा था:

1. पाकिस्तान के मुख्य मंत्री को भेजे गए एक तार में भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा, "मैं यह बात साफ़ कर देना चाहता हूँ कि इस आपातकाल में कश्मीर की मदद करने का सवाल किसी भी तरह से उसके भारत में विलय को प्रभावित करने से नहीं जुड़ा है।  हमारा मत, जिसे हम बार-बार सार्वजनिक करते रहे हैं, यह है कि किसी भी विवादग्रस्त इलाके या राज्य के विलय का सवाल वहाँ के लोगों की इच्छाओं के अनुसार ही होना चाहिए और हम इस विचार पर कायम हैं।"  (तार 402, Primin-2227, दिनांकित 27 अक्तूबर, 1947, पाकिस्तान के प्र. मं. को, उसी तार को दोहराते हुए जो यू. के. के प्र. मं. को भेजा गया था)।
 
2. पाकिस्तान के प्र. मं. को भेजे गए एक अन्य पत्र में पंडित नेहरू ने कहा, "कश्मीर के भारत में विलय को हमने महाराजा की सरकार के और राज्य की सर्वाधिक जनसमर्थन वाली संस्था, जो कि मुख्यतया मुस्लिम है, के अनुरोध पर ही माना था। तब भी इसे इस शर्त पर स्वीकृत किया गया था कि जैसे ही कानून-व्यवस्था बहाल हो जाएगी, कश्मीर की जनता विलय के सवाल का निर्णय करेगी। ये निर्णय उन्हें लेना है कि वे किस देश में विलय को स्वीकार करें।" (तार सं. 255 दिनांकित 31 अक्तूबर, 1947) ।

विलय का मुद्दा

जूलियन असांज के समर्थन में

जॉन पिल्जर

08 दिसंबर, 2010

प्रेस की स्वतंत्रता

जॉर्ज ऑर्वेल

[ऑर्वेल ने यह निबंध अपने प्रसिद्ध उपन्यास 'ऐनिमल फ़ार्म' की प्रस्तावना के रूप में लिखा था, पर इसे छापा नहीं गया। उपन्यास के साथ इसे आज भी नहीं छापा जाता क्योंकि इसको मिला कर जो सच उजागर होता है वो बहुत से मठाधीशों और चेलों को रास नहीं आता और मठ-मालिकों को रास आने का तो सवाल ही नहीं उठता।]

जहाँ तक केन्द्रीय अवधारणा का सवाल है, इस पुस्तक का विचार तो 1937 में आया था, पर इसे  असल में1943 के अंत तक नहीं लिखा गया था। जब तक इसे लिखा गया, यह साफ़ हो चुका था कि इसे छपवाने में काफ़ी दिक्कतें पेश आएंगी (इस बात के बावजूद कि अभी फिलहाल किताबों की इतनी किल्लत है कि कोई भी चीज़ जिसे किताब कहा जा सके 'बिकने' लायक है), और हुआ भी यही कि इसे चार प्रकाशकों द्वारा वापस कर दिया गया। इनमें से केवल एक के पास कोई विचारधारात्मक मंशा थी। दो तो सालों से रूस-विरोधी पुस्तकें छाप रहे थे, और जो बचा उसका कोई स्पष्ट राजनीतिक रंग नहीं था। एक प्रकाशक ने तो पुस्तक को छापने की कार्यवाही शुरू भी कर दी थी, पर आरंभिक इंतज़ाम करने के बाद उसने सूचना मंत्रालय से सलाह लेने का निर्णय लिया, जिसने शायद उसे चेता दिया, या कम-से-कम पुरज़ोर सलाह दी कि इस किताब को न छापे। उसके पत्र से एक उद्धरण पेश है:

लंदन

विलियम ब्लेक

["ब्लेक राजनीतिज्ञ नहीं थे, पर 'मैं हर पट्टे पर ले ली गई गली में भटकता हूँ' जैसी कविता में पूंजीवादी समाज की उससे ज़्यादा समझ है जितनी तीन-चौथाई समाजवादी साहित्य में है" - ऑर्वेल चार्ल्स डिकेन्स पर उनके एक लेख में]

ऑर्वेल की प्रस्तावना 'ऐनिमल फ़ार्म' के लिए

रॉबर्ट वीवर

[जॉर्ज आर्वेल ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास 'ऐनिमल फ़ार्म' के लिए एक प्रस्तावना लिखी थी, जिसे छापा नहीं गया और पुस्तक के साथ अब भी नहीं छापा जाता। प्रस्तुत है रॉबर्ट वीवर की टिप्पणी ऑर्वेल के जीवन तथा इस प्रस्तावना के बारे में। ऑर्वेल की प्रस्तावना को भी शीघ्र ही पेश करेंगे।]

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)