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असहमति और प्रतिरोध

केवल सरकार के समर्थकों के लिए आज़ादी, केवल एक पार्टी के सदस्यों के लिए आज़ादी - चाहे वो संख्या में कितने ही क्यों न हों - आज़ादी कतई नहीं है। आज़ादी हमेशा असहमत व्यक्ति की आज़ादी है। 'न्याय' की कट्टरता के कारण नहीं, बल्कि इसलिए कि वो सब कुछ जो राजनैतिक आज़ादी में हमें कुछ सिखाने वाला है, हितकारी है, और निर्मलता लाने वाला है, इसी सारतत्व पर निर्भर करता है, और इसका सारा असर खत्म हो जाता है जैसे ही आज़ादी एक विशेषाधिकार बन जाती है।

रोज़ा लक्सेम्बर्ग


अन्याय के विरुद्ध असहमति और प्रतिरोध तथा एक बेहतर दुनिया के लिए एक कोशिश है ज़ेडकॉम। यह एक विस्तृत वेबस्थल है जहाँ विश्व के प्रमुख प्रतिबद्ध लेखकों, पत्रकारों, कार्यकर्ताओं, विचारकों आदि के सामयिक लेख प्रकाशित होते रहते हैं। इसके कुछ हिस्से का हिन्दी में अनुवाद उपलब्ध कराने की यहाँ शुरुआत की गई है। आप भी इसमें सहयोग कर सकते हैं ज़ेडकॉम के अपने मनपसंद लेखों का अनुवाद करके या उसी स्तर के हिन्दी लेखों का योगदान करके।

 


 

पिछले कुछ समय से वेबसाइट बार-बार रहस्यमय रूप से अनुपलब्ध हो जा रही है। अगर आप लंबे समय तक बेवसाइट को इस हालत में पाएँ तो अनुरोध है कि हमें सूचित कर दें। हम से जो हो सकेगा वो करेंगे। जहाँ तक हो पाएगा वेबसाइट चालू रखेंगे, हालांकि जैसा पहले भी लिखा था, एक व्यक्ति के लिए एक सीमा तक ही कुछ कर पाना संभव है। फिर भी आसानी से हार मानने का इरादा नहीं है।

 


 

भारत में सामूहिक बलात्कार के आरोपियों के विरुद्ध हत्या का मामला दर्ज, प्रदर्शनकारियों का महिलाओं के लिए व्यापक अधिकारों पर ज़ोर

भारत में पांच पुरुषों के विरुद्ध एक चलती बस में एक 23 वर्षीय छात्रा के अपहरण, सामूहिक बलात्कार और हत्या के आरोप में औपचारिक रूप से मामला दर्ज किया गया है। 16 दिसंबर के बलात्कार के दौरान इस महिला  का शरीर इतनी बुरी तरह विकृत हो गया था कि उसे आंतों के प्रत्यारोपण की जरूरत थी, लेकिन अंततः गंभीर आंतरिक चोटों के कारण उसका जीवन नहीं बचाया जा सका। "मुझे लगता है कि यह एक लंबे समय से संचित गुस्से और आक्रोश का असर था," भारत में यौन हिंसा के खिलाफ विरोध प्रदर्शन की मुख्य आयोजकों में से एक, अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला संघ की कविता कृष्णन का कहना है। "इस मामलें में यह सब फट पड़ा, शायद इसलिए कि उसके साथ ऐसा इतनी मामूली दैनिक गतिविधि के दौरान हुआ: वह केवल अपने दोस्त के साथ एक फिल्म देखने के बाद घर जाने के लिए एक बस में चढ़ी थी। और मुझे लगता है कि इस बात ने हर एक के मानस को छू लिया क्योंकि हर कोई उसकी जगह अपने को रख कर देख सकता था। मुझे लगता है कि उन सबने इस अनाम व्यक्ति के साथ एक गहरा संबंध महसूस किया।" सामूहिक बलात्कार के इस मामले ने भारत में यौन हिंसा के अन्य मामलों पर प्रकाश डाला है, जहां हर 20 मिनट में एक महिला के साथ बलात्कार किया जाता है, राष्ट्रीय अपराध रजिस्ट्री के अनुसार। "मुझे लगता है हमें उऩ सब बदलावों पर भी नज़र डालनी पड़ेगी जो कि विभिन्न प्रकार की सामाजिक और सांस्कृतिक ताकतों के कारण हो रहे हैं - वैश्वीकरण, लोगों का एक जगह से दूसरी जगह जाना, दिखावटी उपभोग, उन सब चीज़ों का मीडिया में व्यापक प्रदर्शन जो इतनी आसानी से उपलब्ध हैं," एलोरा चौधरी, बोस्टन के मैसाचुसेट्स विश्वविद्यालय में महिलाओं के अध्ययन की एसोसिएट प्रोफेसर, का मानना है। "ये सब के सब, मुझे लगता है, और खास तौर पर इन सब विभिन्न प्रकार की ताकतों तथा लैंगिक गतिकी के परस्पर संघर्ष के चलते शहरी क्षेत्रों में हो रहे परिवर्तनों  से लैंगिक गतिकी में, स्त्री-पुरुष संबंधों में तरह-तरह के बदलाव आ रहे हैं।" [प्रतिलेख शामिल है]

अतिथि:

कविता कृष्णन, अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोसिएशन की सचिव और भारत में यौन हिंसा के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के मुख्य आयोजकों में से एक।

एलोरा चौधरी, बोस्टन में मैसाचुसेट्स विश्वविद्यालय में महिलाओं के अध्ययन की एसोसिएट प्रोफेसर।

दिल लगाई और सताई - 11

हावर्ड ज़िन

[हावर्ड ज़िन रचित 'ए पीपुल्स हिस्टरी ऑफ़ द यूनाइटेड स्टेट्स' (संयुक्त राज्य का जनवादी इतिहास) के छठे अध्याय 'द इंटिमेटली आप्रेस्ड' के अनुवाद का अंतिम भाग। अनुवादक: लाल्टू]

सेरा की लिखाई में ताकत थी; एंजेलीना के भाषण में आग थी। एक बार बॉस्टन ऑपेरा हाउस में वह लगातार छः रातों तक बोलती रही। कुछ भले दास प्रथा विरोधी साथियों की दलील थी कि लिंगों में समानता की बात नहीं की जानी चाहिए क्योंकि इससे दास प्रथा विरोधी आंदोलन को नुकसान पहुँचता है। इस दलील के खिलाफ़ उसने कहा -

"दास प्रथा विरोध को हम तब तक पूरी ताकत से आगे नहीं बढ़ा सकते, जब तक रास्ते की सबसे बड़ी रुकावट को हम दूर नहीं करते। आज अगर हम सार्वजनिक रूप से बोलने का अधिकार खो बैठें, तो अगले साल आवेदन करने का अधिकार खोएंगे और उसके अगले साल लिखने का अधिकार खो बैठेंगे और यह सिलसिला चलता रहेगा। जब औरत मर्द के पैरों तले दबी हो और शर्म से चुप हो तो वह गुलामों के लिए क्या कर पाएगी?"

मैसाचुसेट्स राज्य की विधान-परिषद में दास प्रथा विरोधी आवेदनों पर बोलने वाली पहली नारी (1838 में) एंजेलीना थी। बाद में उसने बतलाया, "मैं भावनाओं के आवेग से होश खोने वाली थी ...।" उसके भाषणों में भीड़ बड़ी होती थी और सेलेम नगर के एक प्रतिनिधि ने प्रस्ताव रखा कि "मैसाचुसेट्स की राज्य सभा के संविधान का अध्ययन करने के लिए एक समिति बनाई जाए जो इस बात की जाँच करे कि हम सुश्री ग्रिम्के का एक और भाषण झेल पाएंगे या नहीं।"

दीगर मामलों पर बात करने से औरतों की स्थिति पर बोलने के रास्ते खुले। बॉस्टन क्षेत्र में जेलों और आश्रमों के अवलोकनों पर मैसाचुसेट्स विधान परिषद्  में डोरोथिआ डिक्स ने 1848 में इस तरह कहा -

"बहुत ही दुःखदायी और शोचनीय परिस्थियों का आँखों देखा हाल मैं सुनाती हूँ ... भद्रजन, इस पूंजीबद्ध राज्य संघ में विक्षिप्त व्यक्तियों को किस तरह पिंजड़ों में, अल्मारियों में, कोठरियों में, छोटे कमरों में, बिलों में, ज़ंजीरों से बांध, नंगे रखा जाता है और छड़ों से पीटा जाता है और चाबुक द्वारा पिटाई कर उनसे आदेश मनवाए जाते हैं, इस पर दो शब्दों में आपका ध्यान दिलाना चाहूंगी।"

साहित्य और सर्वसत्तावाद

जॉर्ज ऑर्वेल

मैंने अपने पहले संभाषण में कहा था कि यह एक आलोचक युग नहीं है। यह पक्षधरता का युग है और तटस्थता का नहीं, एक ऐसा युग जिसमें खास तौर से बहुत मुश्किल है किसी ऐसी किताब में साहित्यिक उत्कृष्टता देखना जिसके निष्कर्षों से आप असहमत हैं। राजनीति ने - अपने सबसे व्यापक अर्थ में - साहित्य में घुसपैठ कर ली है, इस हद तक जितना कि आम तौर पर नहीं होता, और इससे वह संघर्ष हमारी चेतना में सतह पर ऊपर आ गया है जो हमेशा व्यक्ति और समुदाय के बीच चलता रहता है। जब हम अपने जैसे समय में पूर्वाग्रह रहित ईमानदार आलोचना करने की मुश्किलों पर गौर करते हैं. सिर्फ़ तभी हमें संपूर्ण साहित्य के ऊपर मंडराते खतरे की प्रकृति का अंदाज़ा लगना शुरू हो पाता है।

हम ऐसे युग में रह रहे हैं जिसमें स्वायत्त व्यक्ति का अस्तित्व ही खत्म होता जा रहा है - या शायद हमें कहना चाहिए, जिसमें व्यक्ति का अपने स्वायत्त होने का भ्रम दूर हो जा रहा है। अब, साहित्य के बारे में हम जो कुछ भी कहते हैं, और (सबसे बढ़ कर) जो भी कुछ हम आलोचना के बारे में कहते हैं, उस सब में हम सहज भाव से स्वायत्त व्यक्ति का अस्तित्व स्वयंसिद्ध मान के ही चलते हैं। आधुनिक यूरोप का पूरा का पूरा साहित्य - मैं पिछली चार सदियों के इतिहास की बात कर रहा हूँ - बौद्धिक ईमानदारी की अवधारणा पर निर्मित है, या, अगर आप चाहें तो इसे शेक्सपियर की उक्ति, 'स्वयं के प्रति सच्चे रहो', से अभिव्यक्त कर सकते हैं। पहली चीज़ जो हम लेखक से मांगते हैं वह ये है कि वो झूठ नहीं बोलेगा, कि वो वही कहेगा जो वह सच में सोचता है, सच में महसूस करता है। किसी भी कलाकृति के बारे में जो सबसे बुरी बात हम कह सकते हैं वो यह है कि यह निष्ठारहित (इनसिन्सियर) है। और यह बात रचनाशील साहित्य से भी ज़्यादा आलोचना के लिए सच है, क्योंकि रचनाशील साहित्य में एक हद तक बनावट और वैचित्र्य, यहाँ तक कि एक हद तक सीधी-सपाट बकवास भी हो सकती है, औऱ उससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता जब तक कि लेखक मूल रूप से निष्ठावान (सिन्सियर) है। ['सिन्सियर' शब्द का अनुवाद हिन्दी में पता नहीं क्यों बहुत मुश्किल है - अनु.]। आधुनिक साहित्य सारतः एक व्यक्तिगत चीज़ है। या तो यह एक व्यक्ति की सोच और भावनाओं की सच्ची अभिव्यक्ति है, या फिर यह कुछ नहीं है।

दिल लगाई और सताई - 10

हावर्ड ज़िन

[हावर्ड ज़िन रचित 'ए पीपुल्स हिस्टरी ऑफ़ द यूनाइटेड स्टेट्स' (संयुक्त राज्य का जनवादी इतिहास) के छठे अध्याय 'द इंटिमेटली आप्रेस्ड' के अनुवाद का दसवाँ भाग। अनुवादक: लाल्टू]

मैसाचुसेट्स राज्य के गार्डनर नगर में, जहाँ उसका भाई धर्मगुरू था, लूसी स्टोन ने नारी अधिकारों पर भाषण देना शुरू किया। वह कद की छोटी, करीब सौ पाउण्ड वज़न (छियालीस किलो) की थी और बहुत अच्छी वक्ता थी। दास-प्रथा विरोधी सोसायटी के लिए भाषण देने पर उस पर कई बार ठंडा पानी फेंका गया, किताबें उछाल कर चोट पहुँचाई गई, लोगों ने हमला किया।

जब हेनरी ब्लैकवेल के साथ उसकी शादी हुई, रस्म के दौरान उन्होंने परस्पर हाथ थामे और एक वक्तव्य पढ़ा -

"हालांकि सार्वजनिक रूप से पति-पत्नी का संबंध मानते हुए, हम परस्पर स्नेह को स्वीकार करते हैं ... यह घोषणा करना हम कर्तव्य मानते हैं कि ऐसा करते हुए हम न तो उन वैवाहिक नियमों को स्वीकार करते हैं, जिनमें पत्नी को स्वच्छंद, तार्किक व्यक्ति नहीं माना गया है, जबकि पति को अस्वाभाविक और क्षतिकर गुरुता दी गई है।"

अपना नाम बदलने से इंकार करने वाली पहली औरतों में एक वह थी। वह 'श्रीमती स्टोन' कहलाती थी। सरकार में अपना प्रतिनिधित्व न होने से जब उसने कर देने से इंकार किया, अधिकारियों ने उसके घर का सामान बदले में ले लिया, यहाँ तक कि बच्चे का झूला भी नहीं छोड़ा।

न्यूयॉर्क राज्य की एक महिला पोस्टमास्टर अमीलिया ब्लूमर ने जब 'ब्लूमर' नामक परिधान का विकास किया, नारी कार्यकर्ता पुराने स्टाइल की तिमि मछली की हड्डियों से बनी बाडीस, कोर्सेट और पेटीकोट छोड़कर ब्लूमर पहनने लगीं। उस ज़माने की नारीवादी आंदोलन की एक मुख्य नेता एलिज़ाबेथ केडी स्टैंटन ने अपनी एक रिश्ते की बहन के ब्लूमर पहनने के बारे में लिखा है :

"जब खुद मैं बिना किसी बोझ लिए लंबे-चौड़े कपड़ों में कठिनाई से ही ऊपर चढ़ पाती थी, अपनी बहन को एक हाथ में रोशनी का लैंप और दूसरे में बच्चा लिए आसानी से सीढ़ियों पर चढ़ते देख मुझे समझ में आ गया कि महिलाओं के परिधान में सुधार की बड़ी ज़रूरत है और मैंने जल्दी ही ऐसे कपड़े पहनने शुरू कर दिए।"

विकीलीक्स का सही इस्तेमाल किया गया तो देश की राजनीति का बहुत भला होगा

शेष नारायण सिंह

[हम बस यहाँ इतना जोड़ना चाहेंगे कि विकीलीक्स के काम के पीछे अकेले जूलियन असांज ही नहीं, और भी बहुत से लोग हैं, सबसे महत्वपूर्ण तो वे जिन्होंने दस्तावेज़ उपलब्ध करवाए। विकीलीक्स से बाहर भी उनके बहुत से समर्थक हैं। एक समय तक तो मुख्यधारा का मीडिया भी उनकी सराहना ही कर रहा था और उनके द्वारा सार्वजनिक किए गए दस्तावेज़ों का बड़े ज़ोर-शोर से उपयोग कर रहा था। अमरीका का मीडिया भी। फिर विकीलीक्स ने कुछ ऐसा कर डाला कि 'अपनी टीम' और 'अपने लोगों' के विरोध में चला गया। ऐसा लगने लगा कि 'अपन' भी घेरे में आ जाएंगे। ऐसा होते ही 'न्यूयॉर्क टाइम्स' तो क्या 'द गार्जियन' तक का राग बदल गया और जूलियन असांज हीरो से विलन बन गए। लेकिन विकीलीक्स के दस्तावेज़ों का उपयोग अब भी हो रहा है और उनकी जीवनी पर पहले किताब और फिर किताब पर आधारित फिल्म से पैसा कमाने में उन्हीं लोगों को परहेज नहीं है। उधर जूलियन असांज एक तरह से नज़रबंद हैं आने वाले खतरे के इंतज़ार मेंऔर ब्रैडले मैंनिंग के ऊपर मृत्युदंड का खतरा मंडरा रहा है (उन्हें लगातार दी जा रही गैर-कानूनी यातना के अलावा)। शर्ली जैकसन के अंदाज़ में कहें तो अच्छी खेती (मानव) बलि मांग रही है। दूसरे ढंग से कहें तो शहीद बनाने का मौसम है। पर दस्तावेज़ों का इस्तेमाल हो रहा है, यह भी कम नहीं है। उम्मीद तो कर ही सकते हैं कि इससे कुछ अच्छा बदलाव आए। उम्मीद करने के लिए हाल-फिलहाल बहुत ज़्यादा चीज़ें हैं भी नहीं । फिर भी उस सवाल से नज़र बचाना मुश्किल होता जा रहा है जो उधर पीछे अटका हुआ है पर गायब होने का नाम नहीं ले रहा : "है कोई माई का लाल वीर पुरूष जो भ्रष्टाचार का पर्दाफ़ाश करने से आगे जाकर भारत का ब्रैडले मैंनिंग या डैनियल एल्सबर्ग बन सके?"। हम बड़ी कोशिश कर रहे है

अंधेर नगरी के राजा

पुण्य प्रसून बाजपेयी

पहली बार किसी प्रधानमंत्री ने माफी मांगी। पहली बार लोकसभा में विपक्ष के किसी नेता ने माफ भी कर दिया। पहली बार भ्रष्टाचार, महंगाई और कालेधन पर सरकार कटघरे में खड़ी दिखी। पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री से लेकर जांच एंजेसियों को समाजवादी सोच का पाठ यह कर पढ़ाया कि अपराध अपराध होता है। उसमें कोई रईस नहीं होता। पहली बार प्रधानमंत्री के चहेते कारपोरेट घरानों को भी अपराधी की तरह सीबीआई हेडक्वाटर में दस्तक देनी पड़ी। पहली बार चंद महीने पहले तक सरकार के लिये देश के विकास से जुडी डीबी रियल्टी कार्पो सरीखी कंपनी के निदेशक जेल में रहकर पद छोड़ना पड़ा। पहली बार पौने सात साल के दौर में यूपीए में संकट भ्रष्टाचार के खिलाफ हो रही कार्रवाई को लेकर मंडराया। और पहली बार सरकार को बचाने भी वही दल खुल कर आ गया जिसकी राजनीति गैर कांग्रेसी समझ से शुरु हुई। यानी पहली बार देश में यह खुल कर उभरा कि मनमोहन सिंह सिर्फ सोनिया गांधी के रहमो करम पर प्रधानमंत्री बनकर नहीं टिके है बल्कि देश का राजनीतिक और सामाजिक मिजाज भी मनमोहन सिंह के अनुकूल है।

थैंक यू, सुप्रीम कोर्ट

कनक तिवारी

इधर कुछ महीनों से सुप्रीम कोर्ट ने देश की चिंता करने में ज़्यादा सक्रियता बरतने का परिचय दिया है. वैसे वे सब काम कार्यपालिका अर्थात केन्द्र सरकार को ही करने थे. देश की यह हालत है कि मुद्दई सुस्त गवाह चुस्त की तरह आचरण हो रहा है.

न्यायिक सक्रियता का लेकिन बढ़ जाना लोकतंत्र के लिए अच्छा लक्षण नहीं है. इससे धीरे-धीरे न्यायपालिका में भी एक तरह का अधिनायकवाद उभरता रहा है. लेकिन मौज़ूदा हालत यह है कि यदि न्यायतन्त्र ने तन्त्र के अन्याय के खिलाफ लोकतांत्रिक मूल्यों का बचाव नहीं किया तो जनता में भयानक पराजय की भावना पनपने लगेगी. मौजूदा समय में वही एक पुराना कारण राजनेताओं और नौकरशाहों को जुल्मखोर बनाता नज़र आ रहा है क्योंकि भारतीय जनता में इक्कीसवीं सदी में भी अन्याय के खिलाफ उठ खड़े होने का मुनासिब जज्बा दीख ही नहीं रहा है.p-j-thomas

 

केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त पी जे थॉमस के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के प्रशासनिक-न्यायिक विवेक पर सीधा तमाचा मारा है. शुरू में यह भ्रम फैलाया गया कि तीन सदस्यीय चयन समिति के सामने थॉमस की वह पुरानी फाइल रखी ही नहीं गई जब उनके खिलाफ केरल राज्य के सचिव के रूप में पामोलिन घोटाले में उनका भी नाम अभियुक्तों में संलग्न किया गया था.

 

दो तिहाई दलित बच्चे दसवीं क्लास के पहले ही स्कूल छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं

शेष नारायण सिंह

दलितों को शिक्षित करने की दिशा में राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी को केंद्र सरकार ने स्वीकार कर लिया है. संविधान में व्यवस्था है कि दलित भारतीयों के लिए सकारात्मक हस्तक्षेप के ज़रिये समता मूलक समाज की स्थापना की जायेगी. उसके लिए १९५० में संविधान के लागू होने के साथ ही यह सुनिश्व्चित कर दिया गया था कि राजनीतिक नेतृत्व अगर दलितों के विकास के लिए कोई योजनायें बनाना चाहे तो उसमें किसी तरह की कानूनी अड़चन न आये. लेकिन संविधान लागू होने के ६० साल बाद भी अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को शिक्षा के क्षेत्र में बाकी लोगों के बराबर करने के लिए कोई प्रभावी क़दम नहीं उठाया गया है. सबको मालूम है कि सामाजिक परिवर्तन का सबसे बड़ा हथियार शिक्षा ही है. जिन समाजों में भी बराबरी का माहौल बना है उसमें दलित और शोषित वर्गों को शिक्षित करना सबसे बड़ा हथियार रहा है लेकिन भारत सरकार और मुख्य रूप से केंद्र की सत्ता में रही कांग्रेस सरकार ने दलितों को शिक्षा के क्षेत्र में ऊपर उठाने की दिशा में कोई राजनीतिक क़दम नहीं उठाया है. उनकी जो भी कोशिश रही है वह केवल खानापूर्ति की रही है.

ऐसा लगता है कि १९५० से अब तक कांग्रेस ने दलितों को वोट देने की मशीन से ज्यादा कुछ नहीं समझा. शायद इसीलिये दलितों के वैकल्पिक राजनीतिक नेतृत्व के विकास की आवश्यकता समझी गयी और कुछ हद तक यह काम संभव भी हुआ. दक्षिण में तो यह राजनीतिक नेतृत्व आज़ादी के करीब २० साल बाद ही प्रभावी होने लगा था लेकिन उत्तर में अभी यह बहुत कमज़ोर है. उत्तर प्रदेश में एक विकल्प उभर रहा है लेकिन उसमें भी शासक वर्गों की सामंती सोच के आधार पर ही दलितों के विकास की राजनीति की जा रही है क्योंकि नौकरशाही पर अभी निहित स्वार्थ ही हावी हैं. कई बार तो ऐसा लगता है कि राजनीतिक पार्टियां जब भी दलितों के विकास के लिए कोई काम करती हैं तो यह उम्मीद करती हैं कि दलितों के हित के बारे में सोचने वाली जमातें उनका एहसान मानें. कारण जो भी हों दलितों को शक्तिशाली बनाने के लिए जो सबसे ज़रूरी हथियार शिक्षा का है उस तक अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की पंहुच अभी सीमित है.

राइट की फाइट

अनिल एकलव्य

यह सह-संचार की दुनिया, जो एक इलैक्ट्रॉनिक दुनिया है, यहाँ, अगर आपकी पहुँच कंप्यूटर और इंटरनेट तक हो तो, छापने के ज़्यादा दाम नहीं लगते। यानी आपके पास कॉर्पोरेटी बैसाखी होना ज़रूरी नहीं है।

कुकुरमुत्ता भी गुलाब को ठेंगा दिखा सकता है।

जब सह-संचार शुरू किया था तो उम्मीद थी कि लोग साथ आएंगे (मतलब अपने-आप साथ आएंगे) और, जैसा कि (हसरत जयपुरी शायद?) कह गए हैं, कारवाँ बन जाएगा। पर शायद सह-संचार के संपादक के नाम से लोगों को कुछ प्लेग-व्लेग का डर जैसा है। या जो भी हो, (एक-आध को छोड़कर) कोई पास नहीं फटका। इलैक्ट्रॉनिक ढंग से भी नहीं फटका। और अपने बस का तो एक हद तक ही है। खैर।

तो ऐसे हालात के चलते एक तरह की उठाईगिरी का सहारा लेना पड़ा (जिसे कुछ लोगों ने दादागिरी समझ लिया - बाहर की दुनिया में उठाईगिरे छोटे-मोटे दादा भी होते हैं, शायद इसलिए, मगर बादशाहत?)। यानी लेख 'साभार' लेकर यहाँ डालने पड़े, क्योंकि उनके लेखक खुद तो भाव दे नहीं रहे थे।

लेकिन हमारे पास इस उठाईगिरी का नैतिक, राजनैतिक और तकनीकी गणित है। ये गणित है कॉपी करने का।

कंप्यूटर की दुनिया में एक शब्द है 'मिररिंग' (mirroring). क्योंकि कंप्यूटर वाला सारा डेटा इलैक्ट्रॉनों की अदृश्य अमूर्त सी दुनिया में रहता है, ठोस कागज़ों पर नहीं, और यह दुनिया बड़ी आसानी से एकदम गायब हो सकती है, इसलिए यह ज़रूरी समझा जाता है कि एक वेबसाइट का सारा डेटा अन्य वेबसाइटों पर लगातार कॉपी करके रखा जाए। साइट का 'मिरर' बना कर रखा जाए। ऐसा औपचारिक तौर पर भी किया जाता है और अनौपचारिक रूप से भी। कारण ढेर सारे हैं और आप अंदाज़ा लगा सकते हैं।

जापान की परमाणु सुरक्षा पर उठे सवाल, भारत को सजग रहना पड़ेगा

शेष नारायण सिंह

जापान में कहर बरपा हुए २ दिन से ज्यादा हो गए हैं.कुदरत ने मुसीबत का इतना बड़ा तूफ़ान खड़ा कर दिया है कि पता नहीं कितने वर्षों में यह दर्द कम होगा. मुसीबत का पैमाना यह है कि अभी तक यह नहीं पता चल पा रहा है कि इस प्रलय में कितने लोगों की जानें गयी हैं. जापान में आये भूकंप और सुनामी ने वहां के लोगों की ज़िंदगी को नरक से भी बदतर बना दिया है. लेकिन इस मुसीबत का जो सबसे बड़ा ख़तरा है उसकी गंभीरता का अंदाज़ लगना अब शुरू हो रहा है. जापान सरकार के एक बड़े अधिकारी ने बताया है कि शुक्रवार को आये भयानक भूकंप में जिन परमाणु बिजली घरों को नुकसान पंहुचा है उनमें से एक में पिघलन शुरू हो गयी है. यह बहुत ही चिंता की बात है. सरकारी प्रवक्ता का यह स्वीकार करना अपने आप में बहुत बड़ी बात है. इसके पहले वाले बिजली घर में भी परमाणु ख़तरा बहुत ही खतरनाक स्तर तक पंहुच चुका है. जापान सरकार के एक प्रवक्ता ने इस बात को स्वीकार भी किया था लेकिन अब अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के डर से वे बात को बदल रहे हैं. अब वे कह रहे हैं कि शुरू में तो ख़तरा बढ़ गया था लेकिन अब कानूनी रूप से स्वीकृत स्तर पर पंहुच गया है. जापान के मुख्य कैबिनेट सेक्रेटरी , युकिओ एडानो ने रविवार को बताया कि अब फुकुशीमा बिजली घर की समस्या का भी हल निकाल लिया गया है.इन परमाणु संयंत्रों की बीस किलोमीटर की सीमा में अब कोई भी आबादी नहीं है. करीब सत्रह लाख लोगों को इस इलाके से हटा लिया गया है. यह परमाणु संस्थान जापान की राजधानी टोक्यो से करीब २७० किलोमीटर दूर उत्तर की तरफ है. जापान की परेशानी पूरी इंसानियत की परेशानी है.करीब ५० मुल्कों ने जापान को हर तरह से मदद देने का प्रस्ताव भी किया है.अमरीका का सातवाँ बेडा उसी इलाके में ही है ,उसका इस्तेमाल भी बचाव और राहत के काम में किया जा रहा है. सच्ची बात यह है कि जापान को किसी तरह की आर्थिक सहायता की ज़रुरत नहीं है लेकिन इतनी बड़ी मुसीबत के बाद हर तरह की सहायता की ज़रुरत रहती है. ज़ाहिर है जापान इस मुसीबत से बाहर आ जाएगा.

एक राबिया के विरोध में पुलिस और पूरी व्यवस्था

रजनीश प्रसाद

[राबिया के विरोध में, राडिया के नहीं। वैसे वो व्यस्त भी तो होंगे देशद्रोहियों के खिलाफ़ लड़ाइयाँ लड़ने में। हिंसा को रोकने का सवाल है, जनतंत्र को बचाने का सवाल है। और बहुत से सवाल हैं इसी तरह के। फुर्सत कहाँ है।]

दिल्ली उच्च न्यायालय ने पुलिस, वकीलों और व्यापारियों के गठजोड़ से लगभग पांच वर्ष से लगातार बलात्कार की शिकार राबिया के मामले में पुलिस आयुक्त को कार्रवाई करने का निर्देश दिया है। राबिया के मामले में महिला आयोग, पुलिस के उच्चाधिकारियों, गृह मंत्रालय से सुनवाई नहीं किये जाने की स्थिति में राबिया ने उच्च न्यायालय को एक पत्र लिखा था और उसी पत्र के आधार पर पुलिस आयुक्त को कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया है। यह जानकारी जागृति महिला समिति की अध्यक्ष निर्मला शर्मा ने संवाददाता सम्मेलन में दी। इस मौके पर पीड़िता भी मौजूद थी।

संवाददाताओं के सामने अपनी दर्दनाक दास्तां बताते हुए राबिया ने कहा कि वह उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के निम्न मध्यवर्ग के परिवार की है। 12वीं कक्षा पास करने के बाद सन 2002 से 2004 तक कंप्यूटर ट्रैनिंग, सिलाई कढ़ाई, ब्यूटी पार्लर आदि की ट्रेनिंग लेती रही। जनवरी 2005 में राबिया फैशन डिजायनिंग का कोर्स करने का सपना लिये दिल्ली आयी और संस्थान में दाखिले के लिए गयी। लेकिन फैशन डिजायनिंग का सेशन जून/जुलाई से शुरू होना था। इसी बीच राबिया की नजर एक हिंदी अखबार के टेली कालर के जॉब के विज्ञापन पर पड़ी। इस जॉब के सिलसिले में उसे प्रीतमपुरा के टूईन टॉवर में साजन इंटर प्राइजेज में मिलना था। उसे प्रोपराइटर सुरेंद्र बिज उर्फ साहिल खत्री ने कोई भी नियुक्ति पत्र या करारनामा नहीं दिया। वहीं से 18-19 साल की राबिया के जीवन की बर्बादी शुरू हो गयी। दो माह काम करने पर प्रोपराइटर उर्फ मालिक ने उसे मात्र तीन हजार रूपये वेतन दिये। राबिया ने इतने कम वेतन की स्थिति में नौकरी छोड़ने को कहा तो प्रोपराइटर ने राबिया को रहने के लिए जगह का ऑफर दिया। राबिया 20 अप्रैल 2005 प्रोपराइटर द्वारा दिये गये फ्लोर सी-27, ओम अपार्टमेंट 33/77 पंजाबी बाग में अपने सामान के साथ शिफ्ट हो गयी। उस फ्लोर पर पहले से ही एक लड़की रह रही थी।

शर्म करो कि तुम्‍हारी मां ऐसी कहानियां लिखती हैं...

अविनाश

मार्च की तीसरी तारीख की शाम, जब मौसम बेहद खुश्‍क था और रह रह कर बूंदा बांदी हो रही थी, 72, लोदी स्‍टेट के सभागार में लोग भरे हुए थे। अंग्रेजी, फ्रेंच और हिंदुस्‍तानी रंगों वाले मिले जुले लोगों की तादाद नमिता गोखले और जय अर्जुन सिंह की बातचीत सुनने आयी थी। नमिता गोखले अंग्रेजी की मशहूर लिक्‍खाड़ हैं और सन 84 में उनका जलवा पारो : ड्रीम्‍स ऑफ पैशन. के साथ शुरू हुआ था। जबकि जय अर्जुन सिंह पत्रकार हैं और जाने भी दो यारों पर लिखी उनकी एक किताब को लोग इधर बड़े चाव से पढ़ रहे हैं।

जय ने नमिता से ढेर सारी बातें की और बातों के तमाम सिलसिले में लेखक की अपनी यात्रा थी, रचना प्रक्रिया थी, अध्‍यात्‍म और सेक्‍स था, साथ ही मिथकों के साथ एक लेखक की मुठभेड़ के ढेर सारे किस्‍से थे। नमिता ने अपनी अलग अलग किताबों से उठा कर कुछ टुकड़े भी सुनाये, जिनमें सुपर डेज़. के कुछ शानदार अंश थे, तो शकुंतला. के हिंदी अनुवाद की थोड़ी बानगी भी थी…

बनारस की वह पहली छवि मैं कभी भूल नहीं पायी : घाटों पर लपलपाती चिताओं की अग्नि, लहरों पर टूटती उनकी परछाइयां। उनके प्रकाश से धूमिल पड़ गया चंद्रमा। जिह्वा पर लपलपाती आकाश की ओर लपकती ज्‍वाला। चिताओं के प्रकाश और चरमराहट के पीछे अंधेरे में डूबा नगर। शकुंतला ने यहीं प्राण त्‍यागे थे, इस पवित्र नदी के तट पर। उस जन्‍म का स्‍मृति जाल मुझे मुक्‍त नहीं होने देता…

सुपर डेज़ में उनके मायानगरी वाले दिन थे, जिनमें ऋषि कपूर, नीतू सिंह और राजेश खन्‍ना का दिलचस्‍प जिक्र था।

जय अर्जुन सिंह ने अस्‍सी के दशक में पारो जैसी बिंदास किताब लिखने के बारे में जब नमिता गोखले से सवाल किया, तो उन्‍होंने कहा कि इस किताब के प्रकाशन के बाद का समय उनके और उनके परिवार के लिए बहुत मुश्किलों भरा था। किताब लिखते हुए उन्‍हें इस बात का ठीक ठीक अंदाजा नहीं था कि हिंदुस्‍तान इस तरह की किताब लिखने की क्‍या प्रतिक्रिया होगी। इसलिए बेबाकी में जो कहानी कह दी गयी, वो कह दी गयी।

आजकल न्याय भी बिकता है

प्रशांत भूषण से प्रशांत दुबे की बातचीत

देश में औसतन हर रोज एक नये घोटाले के इस दौर में अधिकांश भारतीय भ्रष्टाचार पर बात करते हैं लेकिन उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता और मानवाधिकार कार्यकर्ता प्रशांत भूषण ऐसे लोगों से अलग हैं. वे केवल बात करने में यकीन नहीं करते. यही कारण है कि वे पिछले दो दशक से भ्रष्टाचार के खिलाफ हरसंभव लड़ाई लड़ रहे हैं. उन्होंने न्यायपालिका के अंदर की गंदगी को सार्वजनिक करने का काम किया, आम जनता की वाहवाही बटोरी और न्यायपालिका की आंख की किरकिरी भी बने. भ्रष्टाचार में डूबी न्यायपालिका के एक वर्ग ने आंखें तरेरी और प्रशांत भूषण पर मुकदमे भी दर्ज कराये गये. ये और बात है कि प्रशांत भूषण इन मुकदमों के बाद और उत्साह से अपने काम में जुट गये. यहां पेश है हाल ही में उनसे की गई बातचीत के अंश.

 

क्या आज के दौर में आम आदमी को न्याय मिलने की उम्मीद आप करते हैं ?

देखिये, यह एक विचित्र दौर है जबकि विकास दर तो 9 प्रतिशत पर पहुंच गई है लेकिन 10 वर्षों में 2 लाख से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की है. विश्व के 10 सबसे अमीर लोगों में 4 हिन्दुस्तानी हैं लेकिन अर्जुन सेनगुप्ता कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक देश की 77 फीसदी जनता 20 रूपये प्रतिदिन से कम पर जीवन यापन कर रही है. विकास दर और गरीबी में सीधा-सीधा जुड़ाव है. यदि गरीबी इतनी है तो विकास दर बढ़ कैसे रही है? इसका सीधा जवाब यह है कि यह विकास दर इस देश के प्राकृतिक संसाधनों को बेच-बेचकर लाई जा रही है. देश का 1 ट्रिलियन डॉलर पैसा स्विस बैंकों में रखा है. prashant-bhushan

यह कहना मुश्किल है कि आज के इस दौर में आम आदमी को न्याय मिल ही जाये. आजकल न्याय भी बिकता है, जिसकी जेब में पैसा है, वह न्याय का हकदार है बाकी सभी तो न्याय की आस लगाये रहते हैं. यह अंकल जज का जमाना है. न्यायपालिका भी भ्रष्ट हो रही है, दीमक तो उसमें भी लग चुकी है. पूरी व्यवस्था पर, पूरा कब्जा इन कारपोरेट घरानों का है.

एनिवन कैन बी अ फेमिनिस्ट

गुंजेश

फ्रांस की जो स्थिति 1949 में थी, पश्चिमी समाज उन दिनों जिस आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन के दौर से गुज़र रहा था, वह शायद हमारा आज का भारतीय समाज है, उसका मध्यम वर्ग है, नगरों और महानगरों में बिखरी हुई स्त्रियाँ हैं, जो संक्रमण के दौर से गुज़र रहीं हैं”। (डॉ. प्रभा खेतान, स्त्री उपेक्षिता)

आठ मार्च अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है। अगर स्कूलों में जिस तरह से लेख लिखना सिखाया जाता है उस भाषा में लिखूँ तो इस दिन महिलाओं के उत्थान, उनकी सामाजिक स्थिति में बेहतरी के लिए किये जाने वाले कार्यों की सराहना की जाती है। कुछ जगहों पर कुछ विशेष कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। अखबारों में खास तौर से सफलता और चुनौतियों वाले लेख छापे जाते हैं। सामाजिक तौर पर स्थापित स्त्रियों पर रंगा-रंग फीचर भी इस दिन अखबारों के पन्नों पर विशेष रूप से पाये जाते हैं। इसकी शुरुआत हो चुकी है रविवार को एक प्रतिष्ठित अँग्रेजी अखबार ने अपने रविवार के विशेष सप्लिमेंट को आठ मार्च यानी अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के नज़र किया है। इसमें अखबार ने लोगों की राय जाननी चाहिए है कि ‘स्त्रीवाद’ की अब कितनी ज़रूरत रह गई है।

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)